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समस्या का डटकर सामना करें

एन. रघुरामन | Nov 23, 2012, 13:02PM IST
समस्या का डटकर सामना करें

 



















 

 

वही लोग सफल होते हैं, जो समस्या को सुलझाने का बीड़ा उठाते हैं। समस्याओं से दूर भागते हुए आप कभी सफलता के शिखर पर नहीं पहुंच सकते। जब आप समस्या को सीधे सामने से देखते हुए इससे भिड़ जाते हैं, तो आपके लिए समाधान पाने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। 

raghu@dainikbhaskargroup.com 



ग्रामीण क्षेत्रों की ओर जाते हुए आपको मार्ग में बड़े-बड़े पोल्ट्री फॉर्म नजर आ सकते हैं। इन्हें देखकर आप सोचेंगे कि यह भी बढिय़ा धंधा है। देश में तकरीबन ७५ फीसदी मुर्गीपालन केंद्र ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं, जिनमें पारंपरिक इलेक्ट्रिक इंक्युबेटरों का इस्तेमाल होता है और जिन्हें रोज तकरीबन छह से आठ घंटे पावरकट का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अंडों में से चूजे निकलने की दर ५० फीसदी से भी कम होती है। 

यदि कोई आपको इस तरह की जानकारी दे तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? हो सकता है कि आप यह जानकर सरकार को उसकी अक्षमता के लिए कोसने लगें। यह भी हो सकता है कि आप पोल्ट्री जैसे नाजुक उद्योग के प्रति एक नकारात्मक राय कायम कर लें। 

स्वप्निल कोकते को भी यह जानकारी अपने पिता के एक मित्र से मिली, जिनका पोल्ट्री का कारोबार है। पिता के यह मित्र विद्युत आपूर्ति की इस गड़बड़ व्यवस्था को जमकर कोसते हुए पोल्ट्री कारोबार को खतरे में धकेलने के लिए सरकार को दोषी ठहरा रहे थे। 

मुंबई के माटुंगा में इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी में पॉलीमर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे २३ वर्षीय स्वप्निल कोकते को उनकी बातों में एक अवसर नजर आया। इसके बाद उसने एक इलेक्ट्रिसिटी-फ्री एग इंक्युबेटर (ईएफईआई) डिजाइन करने का फैसला किया, जिसे बार-बार पावरकट की परेशानी झेलने वाले भारतीय किसान आसानी से इस्तेमाल कर सकें। वह आखिरकार ऐसा इंक्युबेटर बनाने में कामयाब रहा, जिसे जल्द ही उसने पेटेंट रजिस्ट्रेशन के लिए भेज दिया। बिजली से चलने वाले इंक्युबेटर के मुकाबले यह इंक्युबेटर सस्ता पड़ता है, जिसमें २१ दिनों के लिए महज ५०० रुपए का खर्चा आता है। 

स्वप्निल को इस बात का कतई अहसास नहीं था कि अपने इस आविष्कार के लिए उसे ग्रीन इकोनॉमी के अध्ययन के लिए जर्मनी जाने वाले ५० यूएन प्रतिनिधियों में चुन लिया जाएगा। 

वर्ष १९९८ से लेकर अब तक पिछले १४ सालों में दुनियाभर के महज ६०० युवा प्रोफेशनल्स को इस कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है, जो 'लीक से हटकर आइडियाज' लेकर आए। यह बेयर युवा पर्यावरण दूत कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की साझेदारी में चलाया जा रहा है। बेयर मटेरियल साइंस मैनेजमेंट बोर्ड के चेयरमैन पैट्रिक थॉमस इस कार्यक्रम का जिम्मा संभाल रहे हैं। यह कार्यक्रम एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तैयार करने के लिए शुरू किया गया है, जहां पर लोग पर्यावरण संरक्षण से जुड़े रचनात्मक विचारों को एक-दूसरे से साझा कर सकें। इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए इस साल भारत से दो युवाओं को चुना गया है। इनमें से एक देश की राजधानी नई दिल्ली से है और दूसरा देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई से। इस बार दुनिया के १९ देशों से कुल ५० प्रतिभागी चुने गए हैं। 

स्वप्निल कोकते के अलावा इस कार्यक्रम के लिए चुना गया दूसरा भारतीय युवक है २१ वर्षीय गौरव माहेश्वरी, जो फिलहाल आईआईटी, दिल्ली से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। उसने गंदे पानी के शुद्धीकरण के लिए एक विकेंद्रीकृत उपचार प्रणाली तैयार की है, जिसमें फाइकोरेमेडिएशन का इस्तेमाल होता है। यह पानी के एल्गी उपचार की ऐसी व्यवस्था है, जिससे इसकी गुणवत्ता सुधरती है। इसमें अंतिम तौर पर प्राप्त होने वाले बायोमास उत्पादों को उर्वरकों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। गौरव ने उत्तर प्रदेश के निकट स्थित अपनी पारिवारिक जमीन में पानी की समस्या के निदान के लिए इसे ईजाद किया। जलवायु परिवर्तन तथा ऊर्जा संकट से निपटने के लिए पेश किए गए इन दोनों छात्रों के इन अनुकरणीय रचनात्मक नुस्खों ने इन्हें दुनिया के नक्शे पर ला दिया। 


मैनेजमेंट फंडा 

 

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