नि:स्वार्थ कर्म आपको दिला सकता है रोटी, कपड़ा और मकान
एन. रघुरामन | Nov 29, 2012, 11:11AM IST

सुबह-सुबह काम पर निकले किसी ऑटोरिक्शा चालक से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं, जिसकी अभी तक 'बोनी' न हुई हो? जाहिर तौर पर हर कोई यही चाहता है कि 'बोनी' अच्छी और शांतिपूर्वक हो जाए, ताकि उसका बाकी दिन भी कमाई के लिहाज से अच्छा गुजरे। उस दिन नारायण एम राव ने अपने ऑटोरिक्शा का इंजन स्टार्ट करते वक्त भी यही सोचा था। उसने बेंगलुरु के जया नगर में एलआईसी कॉलोनी के निकट एक बुजुर्ग सज्जन को ऑटो रिक्शा तलाशते हुए देखा। उन बुजुर्ग सज्जन का नाम था वेंकट राव और उनकी उम्र तकरीबन अस्सी साल थी। नारायण ने उन्हें देख अपना हाथ हिलाया, अपना ऑटो स्टार्ट किया और दूसरे ऑटो वालों के पहुंचने से पहले उनके पास पहुंच गया।
वह बुजुर्ग सज्जन उसके ऑटो में बैठ गए। इसके बाद नारायण ने अपना मीटर डाउन किया और उनसे उनके गंतव्य स्थल के बारे में पूछा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। वह बुजुर्ग सज्जन भूल गए थे कि उन्हें कहां जाना है। नारायण ने यह सोचते हुए कि संभवत: उन्हें कुछ देर बाद अपने गंतव्य के बारे में याद आ जाएगा, उनसे कहा कि वह सीधे रास्ते पर धीरे-धीरे ऑटो चलाएगा और जब उन्हें याद आ जाए तो वे उसे बता दें या फिर ऑटो रोकने के लिए कह दें। शुरुआत में पांच-दस मिनट तक तो नारायण को कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन बुजुर्ग सज्जन के मुख से एक भी बोल न फूटते देख वह भी धीरे-धीरे नर्वस होने लगा। नारायण ने उनके साथ की चीजों को देखा, लेकिन उनके पास पहचान पत्र या ऐसी कोई चीज नहीं थी, जिससे उनके घर का पता चल सके।
बुजुर्ग सज्जन का यही कहना था कि उनका घर आस-पास ही है, लेकिन उन्हें इसकी जगह याद नहीं आ रही है। आखिरकार चार घंटे तक सड़क पर ऑटो दौड़ाने के बाद नारायण उन्हें जया नगर और तिलक नगर स्थित दो पुलिस थानों में लेकर गया, ताकि वह उन्हें पुलिस की निगरानी में छोड़ सके। लेकिन पुलिसवालों ने उसे यह कहते हुए भगा दिया कि उनके पास करने को और भी कई काम हैं और वह बुजुर्ग सज्जन को उसी जगह पर छोड़ आए, जहां से ऑटो में बिठाया था या फिर किसी मानसिक चिकित्सालय में ले जाए। नारायण को उन बुजुर्ग सज्जन से सहानुभूति होने लगी और वह उन्हें अपने घर ले आया व खाना खिलाया। खाना खाने के बाद वह बुजुर्ग वहीं सो गए।
पहले दिन नारायण को लगा कि वह किसी लाचार शख्स की सेवा कर रहा है, लेकिन धीरे-धीरे वह उन्हें लेकर चिंतित रहने लगा क्योंकि वे अपना पता बिलकुल भी याद नहीं कर पा रहे थे। हालांकि उनके बर्ताव को देखकर यही लगता था कि वे किसी अमीर व शिक्षित परिवार से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन एकमात्र समस्या यह थी कि निवास का पता उनकी स्मृति से गायब था।
चौथे दिन स्थानीय अखबार 'विजय कर्नाटक' में एक खबर छपी कि वेंकट राव चार दिन से लापता हैं और उन्हें खोजकर लाने वाले व्यक्ति को उचित इनाम दिया जाएगा। त्यागराजा नगर में रहने वाले वेंकट राव के बेटे राघवेंद्र राव उन्हें खोजने के चक्कर में पिछले चार दिन से सोए नहीं थे। वेंकट तीन महीने से अल्झाइमर्स से पीडि़त थे और यह पहली बार था, जब वे किसी को बगैर बताए घर से बाहर निकले थे। कोई नहीं जानता था कि वे जया नगर आए थे। यह खबर पढऩे के बाद नारायण उन बुजुर्ग सज्जन को लेकर सीधे उनके पते पर पहुंचा और उनके बेटे को उन्हें सौंप दिया। उन्होंने सिर्फ एक-दूसरे का फोन नंबर लिया, ताकि किसी तरह की पुलिस इंक्वायरी होने पर मदद मिल सके। इसके अलावा नारायण ने उनसे कोई पैसा नहीं लिया। यह दो हफ्ते पहले की घटना है। बीते शनिवार नारायण राव को राघवेंद्र राव परिवार के रूप में एक स्थायी ग्राहक मिल गया। उसका काम राघवेंद्र राव के परिजनों और खासकर उन बुजुर्ग सज्जन को बेंगलुरु में रहने वाले उनके तमाम मित्रों या सगे-संबंधियों के घर तक लाने-ले जाना था। उसके लिए रोज का न्यूनतम मेहनताना भी तय कर दिया गया।
फंडा यह है कि...
'बोनी' में रुपए कमाना ही जरूरी नहीं है। 'नि:स्वार्थ कर्म' से भी 'बोनी' हो सकती है, जो आखिरकार आपके लिए स्थायी आय अर्जित करने का जरिया बन सकता है।
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