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इंसान के लिए कोई सीमा नहीं होती

n.raghuraman | Dec 05, 2012, 13:05PM IST
इंसान के लिए कोई सीमा नहीं होती
एक साधारण प्रयोग करें। कुछ मक्खियों को लें और उन्हें एक जार में बंद कर दें। कुछ समय बाद जार से ढक्कन हटाएं। आप पाएंगे कि एक-दो को छोड़कर बाकी सभी मक्खियां जार की दीवार से ही चिपकी बैठी हैं। उनका शरीर और दिमाग यह बात मान चुका होता है कि वे कैद में हैं और यहां से निकल नहीं सकतीं।

इसी तरह एक्वेरियम में काम करने वाले लोग आपको बताएंगे कि आप मछलियों को जल के भीतर एक दायरे में बांध सकते हैं। आप एक बड़े-से कांच के टैंक में कुछ मछलियों को डालें और टैंक के बीच-बीच में पारदर्शी कांच के कुछ पार्टिशनों को डाल दें। कुछ समय बाद इन कांच के पार्टिशनों को हटा दें। आप पाएंगे कि मछलियां तैरते हुए उस छोर तक जाती हैं, जहां पहले पार्टिशन था और लौट आती हैं। उनके दिमाग में यह बात बैठ चुकी होती है कि उनका दायरा वहीं तक है।

इस तरह के तमाम प्रयोग प्राणिमात्र की समझ की प्रक्रिया के लिहाज से एक बेहद अहम तथ्य की ओर इशारा करते हैं। दरअसल किसी चीज के बारे में हमें जैसे शुरुआती अनुभव होते हैं और हम उनकी जैसी व्याख्या करते हैं, उसी के आधार पर हमारा तंत्रिका तंत्र कार्य करने लगता है और धीरे-धीरे यह प्रक्रिया धारणा के रूप में तब्दील हो जाती है। कोई भी बात जो हमारी शुरुआती व्याख्या को मजबूत नहीं करती, वह तंत्रिका तंत्र में भी नहीं जाती। लिहाजा यदि आप किसी चीज के बारे में यह मानकर चलते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता, तो आपका तंत्रिका तंत्र भी इसे स्वीकार नहीं करेगा। वेदों में कहा गया है कि इंसानी शरीर किसी समय या दायरे में कैद कोई जमी हुई मूरत नहीं है। नि:शक्त लोगों के लिए संचालित दुनिया के पहले उपचारात्मक थिएटर 'एबिलिटी अनलिमिटेड' के आर्टिस्टिक डायरेक्टर सैयद सलाउद्दीन इस वेदोक्ति पर पूरी तरह भरोसा करते हैं। उनके छात्र/छात्राओं में एक चीज समान है। ये सभी नि:शक्त हैं (जिनमें में कुछ सुन नहीं सकते) तथा 'कुछ ऐसा करने' के लिए कृतसंकल्प हैं, जिसके बारे में दुनिया मानती है कि ये ऐसा कर ही नहीं सकते। ये छात्र/छात्राएं दरअसल ११ नर्तक/नर्तकियां हैं। इनमें चार लड़कियां और सात लड़के हैं, जो एक सूफी डांस से शुरुआत करते हैं, भगवतगीता के किरदारों में ढल जाते हैं और मंच पर घूमते हुए एक जीवंत संरचना तैयार करते हैं। ये व्हीलचेयर पर बैठ साठ मिनट तक अपनी बेजोड़ प्रस्तुति से आपको बांधे रखते हैं।

डांस गुरु पाशा तीन दशक से इस दिशा में काम कर रहे हैं। वह उपचारकों और चिकित्सकों के परिवार से हैं और मानते हैं कि संगीत, नृत्य और योग इस तरह के नि:शक्त लोगों के उपचार में चमत्कारिक रूप से मददगार साबित हो सकते हैं। उनके मुताबिक नृत्य लोगों के शारीरिक व मानसिक अवरोधों को खोल देता है और इंसानी शरीर की माइक्रोकॉस्मिक कोशिकाओं पर काम करता है।

अपने शिष्यों के लिए इस तरह का अनूठा भरतनाट्यम कोरियोग्राफ करने की खातिर खुद पाशा को १५ वर्षों तक घंटों व्हीलचेयर पर रहना पड़ा। वह कहते हैं कि यह दुनिया का इकलौता संस्थान है, जहां पर आप व्हीलचेयर तक सीमित रहने वाले नर्तकों को भरतनाट्यम की प्रस्तुति देते देखते हैं। झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे विभिन्न प्रदेशों से आने वाले उनके ये छात्र/छात्राएं अलग-अलग पृष्ठभूमि से जुड़े हैं।

वे दिल्ली में एक आश्रम में रुकते हैं, जहां उन्हें मुफ्त शिक्षा भी दी जाती है। यह आश्रम पाशा परिवार द्वारा चलाया जाता है। हरेक शो के बाद इन नर्तकों को दर्शकों की भरपूर सराहना मिलती है। वे मानते हैं कि यदि उनकी प्रस्तुति दर्शकों के दिलों तक नहीं पहुंचती, तो उनका उद्देश्य पूरा नहीं होता। वे अमेरिका, वेनिस, मिलान के अलावा 'सत्यमेव जयते' जैसे टीवी शो में भी प्रस्तुति दे चुके हैं।
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