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कौन-सी चीज मकान को घर बनाती है?

एन. रघुरामन | Dec 06, 2012, 10:40AM IST
कौन-सी चीज मकान को घर बनाती है?

 


यदि आप मकान को घर बनाना चाहते हैं तो ईंट-गारे से बनी इस इमारत में अपनी भावनाओं का भी थोड़ा निवेश करें। भवन की दीवारों को स्मृतियों की अदृश्य तस्वीरों से सजाएं। फिर देखिए, भवन खुले दिल से आपको अपनाएगा। जब आप उस भवन से बाहर जाने लगेंगे, तो परिचितों की तरह नहीं वरन करीबी दोस्तों की तरह जुदा होंगे। इसी तरह कोई मकान, घर बनता है। 
 
raghu@dainikbhaskargroup.com 
 
इस सवाल का जवाब देना किसी ऐसे शख्स के लिए मुश्किल है, जिसने अपने जीवन में शुरुआती बीस साल तक गर्मियों की तमाम छुट्टियां एक ऐसे भवन में गुजारी हों, जो १०० से ज्यादा वर्षों तक घर बना रहा। 
 
तमिलनाडु के उमयलपुरम में मेरी पुश्तैनी जगह पर हमारा एक घर था, जिसका आकार रहवासियों की संख्या बढऩे के साथ-साथ बढ़ता गया- बगैर किसी निश्चित योजना के, बिलकुल बेतरतीब तरीके से। परिवार को जब जरूरत होती, एक नया कमरा बनवा दिया जाता। जिस तरह पेड़ की जड़ें फैलती हैं, उसी तरह हमारा यह मकान भी जहां जगह मिली, उसी ओर बढ़ता गया। हालांकि यह बहुत सुंदर नहीं दिखता था। इसकी मिट्टी से बनी दीवारें एक मीटर तक चौड़ी थीं। इनका प्लास्टर कई जगह अधूरा था, जिसकी वजह से इनमें लगे पत्थर किसी पुराने घाव के दाग-धब्बों की तरह नजर आते।
 
 
उन धब्बों को ढंकने के लिए मेरे दादाजी हर साल स्वतंत्र रूप से बंटने वाले कैलेंडर ले आते और इन दीवारों पर टांग देते। इन कैलेंडरों को सजाने का कोई निश्चित क्रम नहीं होता, जिसके चलते वहां हमेशा दिलचस्प चित्र-संयोजन तैयार हो जाता- भगवान गणेश के बगल में अभिनेत्री वैजयंती माला और नेहरूजी व महात्मा गांधी के बाजू में हेमा मालिनी। 
 
हमारे इस घर में हर चीज के लिए जगह थी। पुराने बर्तन, बेंत से बना चरमराता सोफा (जिसे डालडा के खाली पीपों के सहारे स्थिर किया गया था), पुरानी पत्रिकाओं का ढेर, एक पुराना ट्रांजिस्टर रेडियो, जो काम नहीं करता था, लेकिन एक जगह पर पूरी शान से जमा हुआ था, आम की पत्तियों से बनाए गए पिछले साल के तोरण, जो दरवाजे पर सूखी व मुरझाई अवस्था में लटकते रहते, पुराने टिन के डिब्बों का बनाया गया पिरामिड, कोई नहीं जानता था कि उनके भीतर क्या है, लेकिन वे सभी चीजें वहां जमा थीं। यह भवन बड़े दिल वाला और क्षमाशील था! आप इसकी दीवारों पर जहां चाहे कील ठोक सकते थे, अपनी मर्जी के मुताबिक जहां चाहे लिख या आकृतियां उकेर सकते थे और भूली-बिसरी चीजों की खोज में कोना-कोना छान सकते थे। यह मकान सिर्फ हम लोगों का ही घर नहीं था, बल्कि इसमें कई अन्य तरह के प्राणी भी बसते थे। यह सिर्फ एक भवन नहीं था। यह एक इकोसिस्टम था! इसमें एक नन्ही गिलहरी थी, जो दिनभर 'अतिथि कक्ष' के अंदर-बाहर फुदकती, घर के बाहर लगे नारियल के पेड़ पर चढ़ती-उतरती, बिस्तर के इर्द-गिर्द चक्कर काटती रहती। यहां मानसून के मौसम में मेंढकों की टर्र-टर्र का समवेत आलाप सुनाई देता। घर में छोटी-छोटी काली चींटियों की कतार अक्सर नजर आ जाती। मकड़ी अपने द्वारा बुने गए महीन जाले के बीचोंबीच बैठ न जाने किसका इंतजार करती रहती। चमगादड़ या कीट-पतंगे न जाने कहां-से आ जाते। सर्दियों की एक शाम तो हमें वहां कुंडली मारकर बैठे एक नागराज के भी दर्शन हुए थे। 
 
 
 
कोई भी इन बिन बुलाए अतिथियों से परेशान नहीं होता। ये सब घर में हमारे साथ रहते। हमने साथ-साथ रहना सीख लिया था। मैंने कई बार बरसात की रातों में मेंढक को अपने बिस्तर पर बैठा पाया है। लेकिन मुझे इस घर की एक बात जो सबसे ज्यादा याद आती है, वह है छत पर लगे मेंगलोर टाइल्स के बीच से छनकर आती रोशनी। यह रोशनी नरम, थोड़ा पीलापन लिए होती। सूर्य की यह रोशनी एक स्तंभ के रूप में अंदर आती, जिसमें धूल के छोटे-छोटे कण लगातार नाचते रहते। मैं इस रोशनी के स्तंभ को अपने हाथ में पकडऩे की कोशिश में लगा रहता। ऐसा करने में मुझे खूब मजा आता। आगे चलकर जब मैंने 'स्वर्ग की सीढ़ी' से जुड़ा एक गीत सुना तो मेरे दिमाग में तुरंत उस रोशनी के स्तंभ की छवि कौंध गई। 
 
 
 
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