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विरोध जताने का हो सकता है अंदाज अपना-अपना

n.raghuraman | Dec 07, 2012, 14:42PM IST
विरोध जताने का हो सकता है अंदाज अपना-अपना
वर्ष १९७९ में असम में आई बाढ़ ने बड़ी संख्या में सर्पों को सैंडबार (नदी के मुहाने पर जमी रेत) पर लाकर पटक दिया। गर्मियों की शुरुआत में जादव ‘मोलाइ’ पयेंग नामक एक १६ वर्षीय किशोर ने कुछ मृत सर्पों को देखा, जो बाढ़ की भेंट चढ़ गए थे। ये सर्प इस वजह से मारे गए, क्योंकि इन्हें कोई ऐसा पेड़ नहीं मिला, जिसकी आड़ में ये अपनी जान बचा सकते। यह देखकर उस किशोरवय युवक ने सैंडबार पर पेड़ उगाने का संकल्प लिया। हालांकि यह कोई आसान काम नहीं था, क्योंकि रेतीला बंजर इलाका १३९६ एकड़ में फैला था। उसे लगा कि यह ईश्वर निर्मित अन्य प्रजातियों पर प्रकृति का प्रकोप है। उसने वन विभाग से इस सैंडबार में वृक्ष उगाने की गुहार लगाई। वन विभाग ने उससे कहा कि वहां कुछ नहीं उग सकता और यदि वह चाहे तो बांस उगाने की कोशिश जरूर कर सकता है। कोई उसकी मदद के लिए तैयार नहीं था, लिहाजा उसने अपने बलबूते ऐसा करने का जिम्मा उठाया। तीस साल बाद इस बंजर सैंडबार पर हरा-भरा जंगल लहलहा रहा है, जिसमें हजारों किस्म के पेड़ों के साथ तरह-तरह के परिंदे, हिरण, बंदर, गैंडे, हाथी और यहां तक कि बाघों का भी बसेरा है। इस जंगल को इसके सृजनकर्ता के निकनेम के आधार पर उचित ही ‘मोलाई वुड्स’ नाम दिया गया है। पयेंग की उम्र अब ४७ साल हो चुकी है। 
 
पयेंग ने एकाकी जीवन को स्वीकार कर किशोरावस्था से ही इस रेतीले इलाके में रहना शुरू कर दिया। उन्होंने यहां पर कई तरह के पौधे लगाए, जिनकी देखरेख में वह दिनभर लगे रहते। वह अपनी बीवी और तीन बच्चों के साथ अब भी उसी वन्य प्रदेश में रहते हैं। यहां उन्होंने अपनी एक छोटी-सी कुटिया बना रखी है। ‘मोलाइ वुड्स’ संभवत: नदी के बीचोंबीच बना दुनिया का सबसे बड़ा जंगल है। पयेंग ने अपना जीवन इस जंगल की देखरेख व विकास के लिए समर्पित कर दिया है। आज जंगलों के शिकारी वन्य संपदा से भरपूर इस जंगल पर कब्जा करने की कोशिश में लगे हैं। उनसे पयेंग का यही कहना है कि इससे पहले उन्हें उनकी लाश से गुजरना होगा। वन अधिकारी इस वन के साथ-साथ पयेंग और उनके परिवार की भी रक्षा कर रहे हैं। यदि आपको लगता है कि इस तरह की चीजें सिर्फ भारत में हो सकती हैं, तो इस यूरोपीय गाथा पर भी गौर करें। ऑस्ट्रेलियाई मूल के ३४ वर्षीय स्टीव वीन लंदन में रहते हैं। वह पिछले तीन साल से फूल समेत अन्य छोटी-मोटी वस्तुओं का इस्तेमाल करते हुए शहर की सड़कों पर बने गड्ढों का कायाकल्प कर रहे हैं। इस ‘गुरिल्ला गार्डनर’ ने न सिर्फ अपने शहर में कई जगह ऐसे छोटे-मोटे गार्डन तैयार किए, बल्कि कई और जगहों पर भी ऐसा किया है। वहां गुरिल्ला बागबानी का चलन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। स्टीव कहते हैं कि उनका प्रोजेक्ट बदसूरत चीजों को खूबसूरत चीजों में बदलने की थीम पर टिका है। पूर्वी लंदन में सड़कों पर काफी गड्ढे हैं, जिसे देखकर उन्होंने यह कदम उठाया। स्टीव पिछले हफ्ते इटली में थे, जहां पर मिलान डिजाइन वीक चल रहा था। वहां पर उन्होंने सड़क के बीच में बने २० से ३० सेंटीमीटर चौड़े गड्ढों में छोटे-मोटे पौधे रोपित किए, जिन्हें काफी पसंद किया गया। वह कहते हैं, ‘यह देखकर अच्छा लगता है कि मेरे छोटे-से उपवन कितना व्यापक प्रभाव छोड़ सकते हैं। कई बार तो मेरे उपवन को देखने के लिए चालीस-पचास लोग तक इक_ा हो जाते हैं। मुझे उनकी प्रतिक्रियाएं देखकर बहुत मजा आता है।’आज म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन इस गुरिल्ला गार्डनर से इतना घबराने लगा है कि उसे भनक लगने से पहले ही सड़क पर बनने वाले गड्ढों को दुरुस्त कर दिया जाता है। आज स्टीव को पूरे यूरोप में बुलाया जाता है, ताकि स्थानीय नगरीय निकाय पर उनकी मुहिम का प्रभाव पड़ सके। 
 
फंडा यह है कि- कई बार विरोध का नया आइडिया आपके जीने का एक तरीका बन सकता है। आप नए अंदाज में विरोध जताकर व्यापक असर डाल सकते हैं। गुरिल्ला बागबानी या गुरिल्ला वन्यीकरण ऐसी ही एक नई पद्धति है, जो संबंधित सरकारी निकायों पर असर डालने के लिहाज से काफी प्रभावी रही है। 

 

 

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