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ईटिंग आउट मां का विकल्प नहीं लेकिन रिश्तों को मजबूती देने का समय है

N.Raghuraman | Dec 10, 2012, 09:44AM IST
ईटिंग आउट मां का विकल्प नहीं लेकिन रिश्तों को मजबूती देने का समय है







एक ह?ते के लिए मैं लंदन में मेरी सिस्टर-इन-लॉ के घर गया था। मैं वहां पहुंचा ही था कि बुरी खबर आई- भारत में उसके पैरेंट्स की तबीयत बिगड़ गई है। मुझे उसके 7 और 12 साल के बेटों की जि?मेदारी सौंपी गई। उन्हें कोई तकलीफ नहीं होगी, मेरे इस आश्वासन पर वे रवाना हुए। 

छोटा बच्चा निराश हो गया था। लेकिन उसका ज्यादा अनुभवी बड़ा भाई हालात समझता था। उसने छोटी अवधि के लिए दूर जाने पर पैरेंट्स को कभी मिस नहीं किया था। उसके ग्रैंड पैरेंट्स बहुत ही कोमल ह्दय हैं और उसे बहुत प्यार करते हैं। जब भी मां घर पर नहीं होती तो उसके पिता उसे बाहर ले जाते। पसंदीदा कार्टून शो देखने को मिलते। उसने चुपके से छोटे भाई को कोहनी मारी और दोनों कमरे से बाहर निकल गए। स्पष्ट है कि बड़े भाई ने पैरेंट्स के बिना जिंदगी की खूबसूरत तस्वीर बना ली थी। भले ही पैरेंट्स की अपने बारे में बनाई तस्वीर को क्षति पहुंची हो, लेकिन क्या करे लड़के, लड़के ही होते हैं। 

बड़ा भाई पूछ रहा था, 'आप कब निकल रही हो, माँ?' मेरा भी ध्यान इस पर गया। इसमें ऐसा कोई संकेत नहीं था कि बच्चे को पैरेंट्स द्वारा पीछे छोड़कर जाने से घबराहट हो रही है। माँ हैरान थी। उसके हाव-भाव देखकर, मैंने उनका बचाव किया, 'भारत में आपके पैरेंट्स आपको देखकर खुश होंगे, होंगे न?' 

उनकी मां उन्हें रोज फोन करती थी। चूंकि पैरेंट्स की सेहत सुधर रही थी, उसने यात्रा अवधि दो दिन कम की और घर लौट आई। वापसी की ?लाइट में उसने सोचा होगा कि वह बच्चों पर नाराज नहीं होगी। डांटेगी नहीं। भले ही कमरे का सामान बिखरा हुआ हो। दोनों की हालत बहुत बुरी ही क्यों न हो। 

लेकिन जैसे ही उसने घर में प्रवेश किया, वह चकाचक दिखा। बिस्तर अपनी जगह था। टेबल पर कोई गंदगी नहीं थी। किचन चमचमा रहा था। उसने कहा, 'जब मैं होती हूं तब भी घर इतना साफ नहीं रहता। मैं बहुत प्रभावित हुई। यह सब सच में बहुत ही अच्छा है।' 

बड़े भाई ने कहा, 'हर रोज घर ऐसे ही साफ-सुथरा रहा।' उसने माँ के फुलाए खुशनुमा अहसास के गु?बारे को भी फोड़ दिया। छोटा भाई धीरे से अपने कमरे से बाहर आया और पूछ बैठा, 'आप आज क्यों आ गई?' आखिर में बोल पड़ा, 'अंकल हमें लंच के लिए बाहर ले जा रहे थे!' 

ओह, तो इसने उसे निराश किया। कुछ पल के लिए मैंने भी उसकी माँ के चेहरे पर आहत होने की भावना को अनुभव किया- अनचाहे जैसा अहसास। मैंने उससे उसके छोटे से दिमाग की ओर से सबकुछ देखने को कहा: सभी लंच के लिए बाहर जाने को लेकर उत्साहित थे। पैरेंट्स ने दो दिन पहले आकर उनकी योजना को धराशायी कर दिया। उन्हें लग रहा होगा कि अब उनका लंच घर पर ही होगा। कितना बोरिंग है! 

मैंने सुझाव दिया कि वह खुद ही बाहर जाने की पेशकश करे क्योंकि वह ?लाइट में दस घंटे के सफर से थक चुकी है। माहौल थोड़ा हल्का हुआ। बच्चा अपनी माँ के पास दौड़कर गया। उसे गले लगा लिया। सात साल के बच्चे ने कहा, 'आप लौट आए, इससे मुझे बहुत खुशी हुई।' मैं जानता हूं कि वह दिल से बोल रहा था। 

फिर मैंने उससे पूछा, 'क्या निर्धारित कार्यक्रम से दो दिन पहले आपके लौटने पर आपके पैरेंट्स भी ऐसा ही नहीं सोचा होगा? आपने अपने बच्चों को उन पर तरजीह दी। इसी तरह का अहसास आपको हुआ जब बच्चे ने बाहर जाकर खाना खाने को माँ पर तवज्जो दी।' 

वह समझ गई। डाइनिंग टेबल पर दोनों बच्चे मुझे अकेला छोड़कर अपने पैरेंट्स से जाकर चिपक गए। मैंने धीरे से अपने फोन, फेसबुक और मेल पर काम करना शुरू कर दिया। क्योंकि बाहर खाना खाना हमेशा से ही एक परिवार के लिए रिश्तों को मजबूती देने का समय होता है। मैंने यह भी महसूस किया कि यह माँ के हाथ से बने खाने की जगह नहीं ले सकता। 

 

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