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आत्मविश्वास ही है सफल लोगों का मूल मंत्र

N.Raghuraman | Dec 11, 2012, 13:10PM IST
 
 

अठारह वर्षीय रंगलाल चावड़ा सरकारी स्कूल में पढ़ता है। वह एक झोपड़ी में रहता है। जो कि १०० वर्ग फीट से भी छोटी है। उसकी ढंग की छत तक नहीं है। वह रोजाना मजदूरी कर सौ रुपए तक कमाता है और परिवार की मदद करता है। लेकिन वह हर हाल में खुद को शिक्षित करना चाहता है। 

वह और उसका परिवार यह जानता है कि जब वह कॉलेज जाएगा, तो उसका परिवार ३००० रुपए प्रतिमाह मिलने वाली आमदनी से भी वंचित हो जाएगा, लेकिन परिवार यह रिस्क लेने को तैयार है। सभी सदस्य चाहते हैं कि वह अपना ग्रेजुएशन पूरा करे। 

आमदनी कम होने पर परिवार ने कई रातें भूखे रहकर बिताईं। आखिरकार उसने अपना फाइनल ईयर पूरा कर लिया। उसे अपने धैर्य का प्रतिफल यह मिला कि उसे इस सप्ताहांत में फ्यूचर ग्रुप ऑफ पुणे से नौकरी के लिए ऑफर मिला है। 

१८ वर्षीय विमलेश यादव और वंदना जोशी सहपाठी हैं। विमलेश के पिता एक मजदूर हैं, वहीं वंदना के पिता गरीबों के लिए एक छोटी आटाचक्की चलाते हैं। वे टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हैं, जिसमेें ८० प्रतिशत शब्द हिंदी बोलचाल की भाषा के होते हैं और २० प्रतिशत इंग्लिश के सही शब्द। विमलेश कंप्यूटर साइंस से बीएससी कर रही है, जबकि वंदना ने बीसीए पूरा किया है। किसी जानकार के जरिये दोनों का चयन इस वर्ष पुणे में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर हो गया है और वे आगामी गर्मियों में इसे ज्वाइन कर रही हैं। 

मोनू लोवंशी के परिवार में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं है। उसके परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे उसके पिता हैं, जो चौथी कथा तक पढ़े हैं। उसकी आगे पढऩे की इच्छा को देखते हुए उसके परिवार ने उसे बारहवीं तक पढ़ाया, किंतु धीरे-धीरे उनमें यह डर बैठ गया कि अगर उसे ज्यादा पढ़ाया तो शादी होने में परेशानी होगी। लेकिन मोनू ने परिवारवालों की नहीं सुनी और विरोध किया। 

आज वह बीएससी बायो टेक्नोलॉजी के थर्ड ईयर में अध्ययनरत है। सेकंड ईयर में उसने विक्रम यूनीवर्सिटी उज्जैन से टॉप किया है। वह जल्द ही फार्मा इंडस्ट्री अथवा बायो टेक्नोलॉजी लैब जॉइन करने वाली है। शाहरुख कुरैशी बीसीए सेकंड ईयर का छात्र है। बारहवीं कक्षा में मात्र ५५ प्रतिशत अंक हासिल किए। इसके बाद वह गूगल एन्ड्रॉइड प्रोग्राम की ट्रेनिंग के लिए 'इंडियंस' नामक कंपनी के साथ बेंगलुरु गया। वे उसके बेहतरीन काम से प्रभावित हुए और उन्होंने छह माह के ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए उसे जनवरी २०१३ में बुलाया है। वह अपनी पढ़ाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये अथवा एक छोटा-सा ब्रेक लेकर जारी रख सकता है। उसके बेहतरीन भविष्य को देखते हुए कंपनी किसी भी कीमत पर उसे छोडऩा नहीं चाहती। 

बबीता पवार बीए सेकंड ईयर की छात्रा है। उसका कमर से नीचे का शरीर लकवाग्रस्त है। वह हाथ मशीन से गांववालों के लिए कपड़े सिलती है। वह वॉकर की मदद से बस द्वारा प्रतिदिन कॉलेज जाती है और टीचर बनना चाहती है। लगभग हर परीक्षा में उसने टॉप किया है। आप सोचेंगे, सफलता की इन कहानियों में आखिर नया क्या है? दरअसल ये सभी एक छोटे-से गांव खातेगांव से जुड़े हैं, जिनका आमदनी का जरिया कृषि व व्यापार है। 

खातेगांव मध्यप्रदेश के देवास जिले का एक छोटा-सा गांव है। जिसकी आबादी करीब १५००० है। यहां केवल एक सरकारी हायर सेकंडरी स्कूल, कुछ प्राइवेट स्कूल, एक सिनेमाघर है और कोई मॉल नहीं है। वहां के परिवार अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना नहीं चाहते, क्योंकि पढ़ी-लिखी लड़कियों को शादी के लिए शिक्षित लड़के नहीं मिल पाते। पढ़ाई करने की बच्चे की कितनी भी इच्छा क्यों न हो परिवार की यही कोशिश रहती है कि वे नहीं पढ़ें। लेकिन यदि आप इस गांव में जाएंगे तो बच्चों की पढऩे के प्रति ललक देखकर हैरत में पड़ जाएंगे। इस गांव के ७५० स्नातक छात्रों में ७० प्रतिशत लड़कियां हैं। 11 से अधिक छात्रों का जॉब के लिए चयन हो चुका है, लेकिन अभी ऑफर का इंतजार है। 

 

 

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