इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति महान नहीं!
एन. रघुरामन
| Dec 12, 2012, 10:58AM IST

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लंदन के अखबार 'डेली मिरर' ने सोमवार को खबर दी कि ब्रिटेन में स्कूली बच्चों को पढऩे के लिए पब में जाना पड़ सकता है। ब्रिटिश शिक्षा मंत्री माइकल गोव की कटौती योजना की वजह से कौंसिल के पास स्कूलों की जगह कम हो गई है। मंत्रियों ने 30 करोड़ पाउंड के स्कूल बिल्डिंग प्रोग्राम को रद्द कर दिया है। इसके बाद कई जगहों को स्कूल में त?दील करने की योजना बन रही है। सूची में ईस्ट लंदन स्थित बार्किंग का हैरो पब भी शामिल है। बार्किंग और डेगेनहम कौंसिल के उपनेता रॉकी गिल का आरोप है कि स्कूल बिल्डिंग प्रोग्राम पर कुल्हाड़ी चलाने के फैसले में सरकार ने दूरदृष्टि नहीं दिखाई। स्कूलों के लिए जगह का मुद्दा उनके लिए बेहद नाजुक है। उनके देश में कुछ कौंसिल (हमारे देश में इन्हें जिला कहा जाता है) बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। लेकिन वे सरकार को कोसकर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठे। वे अब पुराने वेयरहाउस, बेकार पड़ी कोर्ट की इमारत, मंदी की वजह से बंद हुए वूलवथ्र्स और कॉमेट जैसे स्टोर्स की खाली दुकानों का इस्तेमाल अस्थायी स्कूलों के लिए कर रहे हैं। इनमें से एक कौंसिल बार्किंग तो स्प्लिट शि?ट सिस्टम पर विचार कर रही है। जिसमें बच्चों को सिर्फ आधा दिन या ह?ते में तीन दिन पढ़ाया जाएगा। शिक्षा मंत्री के फैसले के बाद पूरे देश के प्राइमरी स्कूलों में क्षमता से ज्यादा बच्चों की सं?या करीब 35 हजार हो गई है। कई अन्य इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इनमें लंदन का अंदरूनी हिस्सा, बर्मिंघम, मैनचेस्टर और लीड्स शामिल है। हजारों बच्चों को अस्थायी क्लासरूम में पढ़ाया जा रहा है। इनमें मैनचेस्टर में 260 और ब्रेंट (नॉर्थ-वेस्ट लंदन) में 490 शामिल है। कौंसिल बच्चों को फुटबॉल स्टेडियम, बिंगो हॉल्स या अनुपयोगी चर्च में पढ़ाने का सोच रही है। ऑक्सफोर्डशायर में प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के आसपास रहने वाले प्रत्येक आठ में से एक बच्चे के परिवार को स्कूल के पहले विकल्प को ठुकरा दिया। जब हमारे देश के अंदरूनी हिस्सों में जाते हैं तो वहां सफलतापूर्वक चल रहे टूरिंग वीडियो पार्लर के बिजनेस को देखते हैं। लेकिन इन जगहों पर स्कूल नहीं मिलता। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि परिवहन का साधन नहीं है। यदि साधन है तो उस पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं है। विड?बना है कि हमारे देश में सिनेमा थिएटर कुछ गांवों में स्कूलों से पहले पहुंच जाते हैं। इसका कारण यह है कि लोग खुद को शिक्षित करने से पहले मनोरंजन पर पैसा खर्च करने को तैयार हो जाते हैं। क्या हम लंदन के उदाहरणों से सबक नहीं ले सकते? कई स्तरों पर तो वहां थिएटरों को भी सुबह सात से 11 बजे तक क्लासरूम में त?दील करने पर विचार चल रहा है। क्या हम प्राइमरी और सेकंडरी में चार भिन्न कक्षाओं को चार घंटे या आठ भिन्न कक्षाओं को ह?ते में तीन दिन पढ़ा सकते हैं? यह बहस का विषय है। कई मंत्री इस बात की चर्चा करते थे कि बसों को क्लासरूम की तरह चलाया जाए। जो सुदूर गांवों और रिहायशी इलाकों में जाकर बच्चों को पढ़ाए। मोबाइल क्लासरूम के जरिए ग्रामीण बच्चों को आकर्षित किया जाए। लेकिन यह चर्चाएं सिर्फ शुरुआती स्तर पर ही रहीं। याद रखिए जो लोग रेलवे प्लेटफार्म पर बच्चों को पढ़ाते हैं। उन्हें परिवार का कमाऊ सदस्य बनाते हैं। वे किसी भी अन्य व्यक्ति से ज्यादा महान हैं। फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी स्ट्रीट लाइट में पढ़कर बड़े हुए हैं। फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति महान नहीं है। सिर्फ चुनौतियां महान होती हैं जिन्हें साधारण लोगों को ऊंचा उठकर पार करनी होती हैं। इसे पार करने के बाद वे हमारी नजरों में महान बन जाते हैं। |






