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दोहरी डिग्रियां हासिल करना स्नातकोत्तर से बेहतर है

एन. रघुरामन | Dec 19, 2012, 11:41AM IST
दोहरी डिग्रियां हासिल करना स्नातकोत्तर से बेहतर है
रायपुर में रहने वाले राशिद सिद्दीक ने ग्रेजुएट होने के लिहाज से बीटेक कर लिया। लेकिन इसका अंतिम सेमेस्टर करने के बाद वह कोई अच्छी नौकरी हासिल नहीं कर सका। ऐसे में राशिद के साथ-साथ उसके माता-पिता को भी यही लगा कि उसे मास्टर्स कोर्स कर लेना चाहिए, लिहाजा उसने यह भी कर लिया। लेकिन अच्छे अंकों के साथ मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बावजूद आज तीन साल बाद भी उसके पास कोई नौकरी नहीं है। 
 
उसे तकरीबन रोज ही रोजगार संबंधी कॉल आती है, लेकिन इनमें से कोई भी जॉब ऑफर में तब्दील नहीं हो पाती क्योंकि नियोक्ताओं का यही कहना होता है कि वह ओवर क्वालिफाइड है तथा कंपनी में उसकी उच्च शिक्षा के हिसाब से उसके लायक कोई नौकरी नहीं है। इस तरह की परेशानी झेलने वाला राशिद अकेला नहीं है। आईआईटी, मद्रास में मास्टर्स कोर्स करने वालों की प्लेसमेंट की दर वर्ष २०११ में ३६ फीसदी तक गिर गई। इतना ही नहीं, दिसंबर २०१२ में अब तक वहां से सिर्फ ३० फीसदी प्लेसमेंट हुआ है। गौरतलब है कि देशभर के विभिन्न आईआईटी संस्थानों में फिलहाल कैंपस रिक्रूटमेंट चल रहे हैं। 
 
वारंगल में स्थित एनआईटी से मास्टर्स कोर्स करने वाले ४८ फीसदी स्टूडेंट्स कैंपस प्लेसमेंट से बाहर जाकर अपने लिए रोजगार तलाश रहे हैं। जबकि वहां के ८० फीसदी अंडर ग्रेजुएट छात्रों को प्लेसमेंट मिल गया है। 
 
आईटी इकलौता ऐसा क्षेत्र है, जिसके पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों को नौकरियों के प्रस्ताव मिल रहे हैं। दरअसल आईटी कंपनियां अपना कुछ मुनाफा शोध व विकास कार्यक्रमों में लगा रही हैं, जिससे इस विधा से जुड़े छात्रों के लिए रोजगार के दरवाजे खुल रहे हैं। वर्ष २०१२ में मनिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी), बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटी), मेसरा तथा आईआईटी, बेंगलुरू और आईआईटी, मद्रास में पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों के कैंपस रिक्रूटमेंट में गिरावट नजर आई। एमआईटी में ही कुल ५०० पोस्ट ग्रेजुएट स्टूडेंट्स में सिर्फ १५० स्टूडेंट्स को इस साल नौकरी का प्रस्ताव मिला। अन्य पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेजों में भी कुछ ऐसा ही आलम है। 
 
इंडस्ट्री के नजरिए से देखें तो पोस्ट ग्रेजुएट स्टूडेंट्स दूसरों के मुकाबले उनके यहां थोड़ी ज्यादा परिपक्वता लाते हैं, मगर ज्ञान में नवीनता के हिसाब से कुछ लेकर नहीं आते। डेलॉइट, केपीएमजी और इंफोसिस जैसी कंपनियां अपने यहां ओवर क्वालिफाइड लोगों के बजाय कम शिक्षितों को रोजगार देना ज्यादा पसंद करती हैं। इस वजह से मझधार में फंसे एमटेक स्टूडेंट्स ऐसी नौकरियां तलाशने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जो वे कभी नहीं करना चाहते थे। 
 
एमटेक डिग्रीधारी ज्यादातर रिसर्च के क्षेत्र में जाना पसंद करते हैं, लेकिन भारतीय कंपनियों को इस सेक्टर में लोगों की जरूरत नहीं है क्योंकि उनकी रिसर्च के क्षेत्र में एक निश्चित फीसदी मुनाफा निवेश करने की क्षमता बहुत कम या न के बराबर है। कंपनियां एक क्षेत्र में मास्टर्स कोर्स करने वालों की बजाय दो अलग-अलग क्षेत्रों में डिग्री हासिल करने वालों को ज्यादा प्राथमिकता देती हैं। विभिन्न इंडस्ट्रीज से जुड़े एचआर प्रोफेशनल्स ने खुद इस बात को स्वीकार किया है। 
 
नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के रिकॉर्ड के मुताबिक वर्ष २००४ से २००९ के बीच तकरीबन छह करोड़ नई नौकरियों का सृजन हुआ, लेकिन इस दौरान नियमित कर्मियों की अपेक्षा अस्थायी कर्मियों की संख्या ज्यादा तेजी से बढ़ी। इसका मतलब है कि कंपनियां कई लोगों को अस्थायी नौकरियां देती हैं और बाद में उन्हें नौकरी से निकाल देती हैं या अपना कार्य-संचालन बंद कर देती हैं। 
 
किसी भी देश के लिए शिक्षित और रोजगार के लायक श्रमशक्ति एक संपदा की तरह होती है। लेकिन एनएसएसओ के उन आंकड़ों को देखकर डर लगता है, जो कहते हैं कि महज २.१ फीसदी ग्रेजुएट्स या ८७ लाख ग्रेजुएट्स हमारे देश की बड़ी श्रमशक्ति का निर्माण करते हैं। 
 
फंडा यह है कि... 
 
यदि आप अपने इच्छित पाठ्यक्रम की पढ़ाई पूरी करने के बाद तुरंत कोई नौकरी पाना चाहते हैं तो यह सुनिश्चित करें कि जिस इंडस्ट्री में आप कदम रखना चाहते हैं, वह अगले दस वर्षों तक कारोबार में मजबूती से टिकी रह सकती है। इसके अलावा आप जिस इंडस्ट्री में कदम रखन जा रहे हैं, वह आपकी एजुकेशन प्रोफाइल से मैच होनी चाहिए। 
 
raghu@dainikbhaskargroup.com 
 
 
 
 
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