पानवालों से सीखें मंदी से निपटने के गुर
एन. रघुरामन | Dec 27, 2012, 11:50AM IST

जयपुर में 'हवा महल' के निकट पान-बीड़ी की दुकान चलाने वाले मनीष चौरसिया, मुंबई के चेंबूर में शारदा पान शॉप से जुड़े रंजन तिवारी तथा इंदौर यूनिवर्सिटी कैंपस के निकट स्थित पान की एक दुकान के मालिक प्रदीप शिंदे में एक बात कॉमन है। ये तीनों खुशहाल हैं और देश के अन्य पानवालों के मुकाबले कहीं ज्यादा पैसा कमाते हैं। वे देर रात तक अपनी दुकान खुली रखते हैं। इस साल की शुरुआत में गुटखा पाउच पर लगाए गए प्रतिबंध से इन्हें कोई मायूसी नहीं हुई और उन्होंने खुद को वक्त के मुताबिक बदलने का फैसला किया। पान की ये तीन दुकानें महज उदाहरण हैं और समग्र देश का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। लेकिन यदि हम ध्यान से देखें तो हमें अपने आसपास ऐसी सैकड़ों दुकानें उभरती नजर आएंगी।
इस साल अप्रैल से देशभर में या चुनिंदा राज्यों में गुटखा पर प्रतिबंध लगाने का फैसला कैंसर जैसे घातक रोग के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिहाज से उचित था। लेकिन हर कोई जानता था कि यह फैसला देशभर के पानवालों के लिए मंदी लाने वाला साबित होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि आप मानें या नहीं, मगर उनकी रोज की आमदनी में गुटखा की बिक्री का चालीस फीसदी हिस्सा होता था।तो क्या वे सड़कों पर उतर आए? नहीं, उन्होंने अपना एक संगठन बनाया और सरकार के निर्वाचित प्रतिनिधियों के समक्ष ज्ञापन प्रस्तुत किया? नहीं, उन्होंने विरोधस्वरूप कुछ नहीं किया। हां, उन्होंने खुद को जल्द ही इस बदलाव के मुताबिक ढाल जरूर लिया। अब सैकड़ों पानवालों ने मध्यरात्रि तक खुलने वाली किराने की दुकान का नया अवतार धारण कर लिया। इन दुकानों पर आपको टूथपेस्ट, टूथब्रश, मच्छर भगाने वाले उत्पाद, डायपर, शेविंग ब्लेड, डियोडरेंट्स, इंस्टेंट नूडल्स, बिस्कुट के अलावा शिशु-संबंधी कई ऐसे उत्पाद भी मिल सकते हैं, जिनकी युवा अभिभावकों को तड़के सुबह या देर रात को कभी भी जरूरत पड़ सकती है। इतना ही नहीं, इन दुकानों ने ओवर द काउंटर टैबलेट्स भी रखना शुरू कर दिया। ऐसी दवाएं जिनके लिए डॉक्टर के पर्चे की आवश्यकता नहीं होती, उन्हें ओटीसी टैबलेट्स कहा जाता है, जैसे कि सर्दी-खांसी या बुखार की टैबलेट्स।
अगर आप पान की दुकानों में रखे इन उत्पादों का बारीकी से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि ये ऐसे उत्पाद हैं, जिनकी आपको हमेशा इमरजेंसी में जरूरत पड़ती है या आपको अचानक तब इनकी याद आती है, जब तमाम दुकानें बंद होती हैं। दिन में इस्तेमाल होने वाला कोई उत्पाद इनकी दुकानों पर नहीं होता। वे दिन के घंटों के दौरान सामान्य पान की दुकानों के रूप में काम करते हैं और तड़के सुबह तथा देर रात के वक्त वे कॉलोनी में रहने वाले अनेक स्थानीय रहवासियों के लिए अस्थायी किराने की दुकान की तरह हो जाते हैं। ये दुकानें कॉलोनी के नजदीक ही स्थित होती हैं और देर तक खुली रहती हैं। इससे दो फायदे होते हैं। एक तो यह कि लोग उनकी पान की दुकान पर आने लगते हैं, जो पहले उनकी ओर देखते तक नहीं थे। इसके अलावा धीरे-धीरे लोग उन्हें महज पान की दुकान के बजाय एक सुविधाजनक स्टोर समझने लगते हैं, जिससे उन्हें एक नई पहचान मिलती है। पान की दुकानों के इस नए उभरते अवतार को अब एसी नील्सन ने भी नोटिस किया है, जिसने इस हफ्ते की शुरुआत में अपने हालिया सर्वे में कहा कि ये दुकानें बेबी प्रोडक्ट्स के लिए सबसे तेजी से बढ़ता क्षेत्र हैं।
दक्षिण मुंबई के आजाद मैदान और मरीन ड्राइव के पास स्थित कुछ पान की दुकानों ने ग्रीन टी बैग्स के अलावा गाजर तथा करेले का जूस भी बेचना शुरू कर दिया है। ये दुकानें सुबह छह बजे खुल जाती हैं। अब तो कई सुस्थापित उत्पादों के निर्माता भी अपने उत्पादों के लिए इन पान की दुकानों की ओर देखने लगे हैं। नील्सन स्टडी कहती है कि इन पान की दुकानों पर खरीदारी करने वाले ९६ फीसदी लोग समय की कमी या कुछ अन्य कारणों के चलते हमेशा छोटा-मोटा घरेलू सामान भी खरीद लेते हैं।
फंडा यह है कि...
इस दुनिया में एक ही चीज स्थायी है और वह है 'बदलाव'। जो लोग बदलाव के साथ तैरना जानते हैं, उन्हें बदलते बाजार में ज्यादा एक्सपोजर मिलता है। दूसरी ओर जो लोग बदलाव की धारा के खिलाफ तैरना चाहते हैं, वे इस जबरदस्त प्रतिस्पद्र्धा में थक जाते हैं। हम इन पानवालों से आधुनिक प्रबंधनके बारे में काफी कुछ सीख सकते हैं।
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