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हमारे ग्रह की सलामती से जुड़ा है हमारा मुनाफा

एन. रघुरामन | Dec 29, 2012, 10:00AM IST
हमारे ग्रह की सलामती से जुड़ा है हमारा मुनाफा
हमें यह समझना होगा इंसानी नस्ल का टिका रहना पूरी तरह इस धरती के टिके रहने पर निर्भर है। हमारा यह ग्रह है तो इंसान हैं और इंसान हैं तो उत्पाद हैं और उत्पाद हैं तो मुनाफा है। 
 
raghu@dainikbhaskargroup.com 
 
कुछ समय पहले मैंने इसी कॉलम में असम के जाधव मोलाई पयेंग के बारे में लिखा था, जिसने एक नदी के मुहाने पर स्थित १३६९ एकड़ रेतीली जमीन को तीस वर्षों की अथक मेहनत से सघन जंगल में तब्दील कर दिया और इस जंगल की सुरक्षा के लिए राज्य सरकार ने अपनी फोर्स तैनात की। इस पर मुझे कई पाठकों की प्रतिक्रियाएं मिलीं, जिनका कहना था कि ऐसा करना जंगलों व दूरस्थ जगहों पर तो संभव है, लेकिन आबादी वाले क्षेत्रों में संभव नहीं। 
 
बहरहाल, ऐसा कहने वाले लोगों के लिए यहां एक स्टोरी पेश है- राजेश नाइक ने मैंगलोर में दो एकड़ जमीन पर ५० फीट गहरी एक झील का निर्माण किया है। इससे न सिर्फ उनकी अपनी जमीन में सुधार आया, बल्कि वहां के पूरे इलाके का जलस्तर सुधर गया। इस तरह से उन्होंने १०० एकड़ की बंजर जमीन को ग्रीन बेल्ट में तब्दील कर दिया। बीएससी ग्रेजुएट और ओड्डोर फाम्र्स के मालिक राजेश ने गाजीमत पोस्ट पर एक्सपोर्ट प्रमोशन इंडस्ट्रियल पार्क के ठीक सामने स्थित विशाल भूखंड का कायाकल्प कर दिया। यदि सरकार सहायता करे तो राजेश ऐसा देश के हर गांव में करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कुछ गायों के साथ अपना डेयरी फार्म शुरू किया था। लेकिन अब उनके पास तकरीबन २०० गायें हैं, जो रोजाना ८०० से १००० लीटर दूध देती हैं। ओड्डोर फाम्र्स संभवत: दक्षिण कर्नाटक में दूध के सबसे बड़े सप्लायर्स में से एक है। इसके अलावा तटीय क्षेत्र में स्थित सबसे बड़े फार्मों में भी इसकी गिनती होती है। इसके १० एकड़ एरिया में सुपारी के वृक्ष लगे हैं और नारियल का वृक्षारोपण क्षेत्र २०-२५ एकड़ तक है। इसके अलावा वहां आम, काजू समेत अन्य फलों व सब्जियों के वृक्ष भी लगे हैं। हालांकि जो बात इसे दूसरे फार्मों से अलग करती है, वह है इसकी आत्म-निर्भरता। इस फार्म की मिट्टी काफी उपजाऊ है, क्योंकि इसमें नियमित तौर पर सड़ी हुई पत्तियों और गोबर से मिलकर बनी खाद का इस्तेमाल किया जाता है। इस फार्म की सबसे अच्छी बात यह है कि यह अपने यहां बायोगैस के जरिए ६० किलोवाट तक बिजली पैदा करता है। धुलाई का पानी, गौमूत्र व गाय के गोबर को सीधे एक टैंक में पहुंचाया जाता है। फर्मेंटेशन के बाद इससे मीथेन गैस निकलती है। इस गैस का शोधन के बाद डीजल की जगह इस्तेमाल किया जाता है। कर्नाटक राज्य में इतने व्यापक पैमाने पर इस तरह मीथेन गैस उत्पादन का यह पहला मामला है। 
 
बायोगैस का रोज तकरीबन १० घंटे इस्तेमाल होता है और खाना बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है। यहां से थोड़ी दूर बेंगलुरू में वैनगार्ड बिजनेस स्कूल के ६० से ज्यादा स्टूडेंट्स शहर को दोबारा हरा-भरा बनाने के लिए एक अभियान चला रहे हैं। उन्होंने अपनी इस पहल को 'रीस्टोर ग्रीन' नाम दिया है, जिसका मकसद है ठोस, सकारात्मक कदम उठाते हुए यह सुनिश्चित करना कि शहर को अपनी हरियाली वापस मिल सके। ये भावी मैनेजमेंट गुरु व उद्यमी पर्यावरण में सकारात्मक बदलाव लाने के प्रति कृत-संकल्प हैं और उनका मकसद विभिन्न वर्गों के लोगों को पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरों के बारे में जागरूक करना और उन्हें पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और संवेदनशील बनाना है। धीरे-धीरे विभिन्न वर्गों से जुड़े लोग यह समझने लगे हैं कि इस धरती पर यदि मानवता को बरकरार रखना है तो हमें एक जिम्मेदार समाज तैयार करना होगा, जो ऊर्जा संरक्षण के महत्व को समझता हो। इसके लिए इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती कि इन मूल्यों को हमारे युवाओं के मन में बैठाया जाए और उनके जरिए अलग-अलग उम्र वर्ग के लोगों तक पहुंचाया जाए। यदि कोई अकेला शख्स या लोगों का समूह बंजर जमीन को हरे-भरे मैदान में बदल सकता है तो सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं। आखिर उनके पास तमाम तरह के संसाधन व अधिकार हैं। 
 
 
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