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इस नए साल में लें कुछ नए संकल्प

एन. रघुरामन | Jan 03, 2013, 11:16AM IST
इस नए साल में लें कुछ नए संकल्प
इस साल का पहला दिन था। मैं दक्षिण मुंबई रोड के एक व्यस्त चौराहे से गुजर रहा था, जहां उस वक्त काफी भीड़भाड़ थी। तभी सीएसटी के निकट एक संकरे से पाथवे पर मेरे आगे चल रही एक युवती ने हैंडबैग में से अपना स्मार्टफोन निकाला। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह मेरे लिए नितांत अप्रत्याशित था। वह अपना स्मार्टफोन हाथ में लिए सड़क किनारे बाजू में जाकर खड़ी हो गई और मैसेज वगैरह चेक करने लगी। 
 
मुंबई जैसे महानगर के लिहाज से यह एक गौरतलब बात थी, क्योंकि यहां हजारों लोग रोज चलते हुए अपनी आंखों को इस तरह स्मार्टफोन पर टिकाए रहते हैं, मानो उसमें कोई गहरा सच छिपा हो। ये लोग इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि ट्रेन के कंपार्टमेंट में सफर के दौरान फोन को बाहर निकालना जोखिमभरा हो सकता है। हर दिन ऐसे हजारों मुंबईकर सड़क किनारे फुटपाथ पर इतना धीमे-धीमे चलते रहते हैं, मानो वे एक जगह खड़े होकर कदमताल कर रहे हों। 
 
इसी तरह किसी लिफ्ट में प्रवेश करते समय या सब-वे की सीढिय़ों पर ऊपर की ओर जाते समय तो ये रेंगते हुए से लगते हैं। ये लोग पूरी तरह खुद में खोए रहते हैं और इन्हें इस बात की जरा भी परवाह नहीं होती कि अपनी इस सुस्ती से वे इस तेज-रफ्तार वाले शहर में अपने पीछे चलने वाले लोगों को किस कदर बेचैन करते हैं। 
 
बहरहाल, सड़क किनारे उस युवती के सामने से गुजरते समय मैंने इस समझदारी के लिए उसका शुक्रिया अदा किया। इस पर वह मुस्कराई और कहा कि वह तो सिर्फ वही कर रही है, जो सही है। 
 
इसके एक दिन पहले मध्य प्रदेश के रतलाम शहर से मुंबई आते समय ट्रेन की फस्र्ट क्लास बोगी में सुबह तकरीबन चार बजे मेरी कुछ लोगों की बातचीत सुनकर अचानक नींद खुल गई। मैंने देखा कि दो युवक अपनी-अपनी बीवियों से सेलफोन पर ऊंची आवाज में बात कर रहे थे। एक युवक अपनी बीवी को बता रहा था कि वह किस तरह बोरिवली स्टेशन पर उसे लेने आ सकती है और उसकी बोगी इंजन से कितने पीछे लगी है। वहीं दूसरा युवक सेलफोन पर अपनी बीवी से नाश्ते के मेन्यू के बारे में चर्चा कर रहा था। उन दोनों को इस बात का भान नहीं था कि नीचे की बथ्र्स पर दो मुसाफिर और भी सो रहे हैं। 
 
वास्तव में मुंबईकर अपने घरों के बाहर चलते समय खुद में इतने खोए रहते हैं कि उन्हें किसी कचरे के डिब्बे के नजदीक से गुजरने से पहले अपने हाथ में पकड़े खाली कॉफी कप या पुराने अखबार का भान ही नहीं रहता। आप कह सकते हैं कि क्या उन्हें अपना कचरा फुटपाथ पर या ट्रैक पर यूं ही फेंकते हुए मामूली वेतन पर काम करने वाले नगरीय निकाय के कर्मियों की दिक्कतों को और बढ़ाना चाहिए, जो फेंके जाने के बाद इन्हें इकट्ठा कर ठिकाने लगाते हैं। लेकिन यह तो हमारे देश में एक आम नजारा है, चाहे आप अमीरों की किसी कॉलोनी में क्यों न चले जाएं। 
 
मैं हमेशा सोचता हूं कि क्या सड़क किनारे अपनी च्युइंगम या पान की पीक थूकना वाकई जरूरी है? हमें जेब्रा क्रॉसिंग के नजदीक आते हुए जोर-जोर से हॉर्न बजाने में मजा आता है, भले ही वहां चलने वाले लोग हड़बड़ा जाएं। जोर-जोर से हॉर्न बजाना सड़क पर से लोगों के कानों पर जुल्म ढाना और ट्रैफिक नियम-कायदों के हिसाब से चलने वाले पैदलयात्रियों का बेवजह गुस्सा बढ़ाना है। बाइक पर चलते हुए हमें एकमार्गी सड़क पर उल्टी दिशा में चलना या रेड सिग्नल की अनदेखी करना कितना अच्छा लगता है। 
 
 
 
फंडा यह है कि... 
 
जिंदगी छोटी-छोटी चीजों से मिलकर बनती है। हमारे इस तरह के छोटे-मोटे, अनजान सामाजिक व्यवहारों से मिलकर ही समाज का बेहतरीन व्यवहार बनता है। क्या इस साल हम इस तरह के छोटे-मोटे व्यवहारों को अपनाने का संकल्प नहीं ले सकते? इस साल इन्हें अपने जीवन में अमल में लाने के लिए अभी भी ३६३ दिन बाकी हैं। 
 
raghu@dainikbhaskargroup.com 
 
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