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पिज्जा की तरह है जिंदगी!

एन. रघुरामन | Jan 04, 2013, 11:08AM IST
पिज्जा की तरह है जिंदगी!
 
फंडा यह है कि...
 
 
 
जिंदगी पिज्जा की तरह है। पिज्जा एक चौकोर डिब्बे में आता है। जब आप इसे खोलते हैं तो यह गोल निकलता है। और जब आप इसे खाना शुरू करते हैं, तो यह त्रिकोणीय हो जाता है। पिज्जा की तरह जिंदगी दिखती अलग है और इसका जायका अलग होता है। 
 
raghu@dainikbhaskargroup.com 
 
राजस्थान के उदयपुर में रहने वाले जोएब अली साबुनवाला की छोटी बेटी है मुबीना। उसने वर्ष २००७ में बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में बायोलॉजी में ९९ अंक हासिल किए। उसके माता-पिता चाहते थे कि वह मेडिकल की पढ़ाई के लिए होने वाली अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करे। वे उसे किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाना चाहते थे, क्योंकि प्राइवेट कॉलेजों की महंगी फीस चुकाना उनके लिए संभव नहीं था। 
 
हालांकि मुबीना ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की, लेकिन समुचित मार्गदर्शन के अभाव में वह राजस्थान पीएमटी, सीपीएमटी व इसी तरह की अन्य प्रवेश परीक्षाओं में अच्छी रैंक हासिल नहीं कर सकी। मगर उसने हार नहीं मानी और उसके अभिभावकों ने उसे कोचिंग के लिए कोटा भेज दिया। एक साल की कोचिंग के बाद वह तमाम चिकित्सा सेवा प्रवेश परीक्षाओं में पुन: बैठी। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में अच्छे अंक हासिल नहीं कर सकी, क्योंकि परीक्षा के वक्त गुर्जर समुदाय के आंदोलन की वजह से पूरी परिवहन व्यवस्था गड़बड़ा गई और इसके चलते वह परीक्षा हॉल में तयशुदा वक्त से आधा घंटा देरी से पहुंच पाई थी। 
 
उसने राजस्थान पीएमटी में सामान्य वर्ग में ११७वीं रैंक हासिल की, लेकिन उसे किसी भी सरकारी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। उसने सीपीएमटी में २९८४वीं, मनिपाल में ३००वीं और वीआईटी में ४५०वीं रैंक हासिल की। उसके परिवार की उम्मीदें टूटने लगीं और उन्होंने उसका दाखिला एक स्थानीय कॉलेज में बायो-टेक्नोलॉजी विषय में करवा दिया। इसी बीच, उसे सीपीएमटी की दूसरी काउंसिलिंग के लिए बुलावा आ गया। उस काउंसिलिंग में उसे मुंबई के गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज (सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल) में एक सीट मिल गई। चूंकि उसके पिता जोएब ने खुद बॉम्बे यूनिवर्सिटी से बीकॉम की डिग्री हासिल की थी, लिहाजा उन्होंने ऊपरवाले की इस रहमत के लिए शुक्रिया अदा किया और मुबीना का दाखिला तुरंत उस कॉलेज में करवा दिया। हालांकि आगे सीटों की और उठापटक में उसके लिए असम की डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी से लेकर आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की कुछ यूनिवर्सिटीज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिले की गुंजाइश बनी। मगर उसके पिता जोएब के जेहन में १९७० के दशक के दौरान मुंबई में अपनी पढ़ाई के दिनों की यादें ताजा थीं, लिहाजा उन्होंने मुबीना को किसी अनजान जगह पर भेजने की बजाय मुंबई में ही पढ़ाना बेहतर समझा। 
 
जोएब अली और उसकी बीवी अपनी बेटी से रोज रात साढ़े नौ बजे के बाद फोन पर बात करते। इसी तरह एक दिन वे अपनी बेटी से फोन पर बतिया रहे थे, तभी उन्होंने कुछ पटाखे फूटने जैसी आवाजें सुनीं। उसी दौरान एक शख्स तेजी से हॉस्पिटल होस्टल के अंदर भागता हुआ आया और सभी लड़कियों से अपने कमरों के खिड़की-दरवाजे बंद करने के लिए कहने लगा क्योंकि बाहर आतंकी हमला हुआ था। यह २६/११ का दिन था और अजमल कसाब एंड कंपनी सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल के निकट स्थित छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर खुलेआम लोगों को अपनी गोलियों का निशाना बना रही थी। उदयपुर में बैठे मुबीना के फिक्रमंद अभिभावकों ने तुरंत अपना टीवी ऑन किया, जिस पर आतंकियों के इस बर्बर कृत्य की खबरें लाइव प्रसारित हो रही थीं। जब उन्होंने यह सुना कि आतंकी हॉस्पिटल में घुस गए हैं तो वे बेहद घबरा गए। 
 
चूंकि जोएब मुंबई के भूगोल के बारे में जानते थे और टीवी पर उस दिन इस महानगर के हर हिस्से को दिखाया जा रहा था, लिहाजा उनका तनाव लगातार बढ़ता जा रहा था। जोएब और उनकी बीवी तकरीबन ४८ घंटों तक टीवी से चिपके बैठे रहे, जब तक यह खबर नहीं आ गई कि रेलवे स्टेशन और उससे सटे इलाके पूरी तरह सुरक्षित हैं। अगले दिन हॉस्पिटल के तमाम स्टूडेंट्स से रक्तदान और घायलों का उपचार करने के लिए कहा गया। सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल में तकरीबन साठ से सत्तर घायलों को लाया गया था। घायलों की मदद करने वालों में मुबीना भी ए थी। उसने अपने बीडीएस कोर्स की पढ़ाई प्रथम श्रेणी के साथ पूरी की और फिलहाल उसकी इंटर्नशिप चल रही है, जो सितंबर २०१३ तक पूरी हो जाएगी। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को लेकर फिक्रमंद उसके अभिभावकों को उम्मीद है कि सितंबर तक उनकी बेटी आत्मनिर्भर होकर घर लौट आएगी।
 
राजस्थान के उदयपुर में रहने वाले जोएब अली साबुनवाला की छोटी बेटी है मुबीना। उसने वर्ष २००७ में बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में बायोलॉजी में ९९ अंक हासिल किए। उसके माता-पिता चाहते थे कि वह मेडिकल की पढ़ाई के लिए होने वाली अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करे। वे उसे किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाना चाहते थे, क्योंकि प्राइवेट कॉलेजों की महंगी फीस चुकाना उनके लिए संभव नहीं था। 
 
हालांकि मुबीना ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की, लेकिन समुचित मार्गदर्शन के अभाव में वह राजस्थान पीएमटी, सीपीएमटी व इसी तरह की अन्य प्रवेश परीक्षाओं में अच्छी रैंक हासिल नहीं कर सकी। मगर उसने हार नहीं मानी और उसके अभिभावकों ने उसे कोचिंग के लिए कोटा भेज दिया। एक साल की कोचिंग के बाद वह तमाम चिकित्सा सेवा प्रवेश परीक्षाओं में पुन: बैठी। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में अच्छे अंक हासिल नहीं कर सकी, क्योंकि परीक्षा के वक्त गुर्जर समुदाय के आंदोलन की वजह से पूरी परिवहन व्यवस्था गड़बड़ा गई और इसके चलते वह परीक्षा हॉल में तयशुदा वक्त से आधा घंटा देरी से पहुंच पाई थी। 
 
उसने राजस्थान पीएमटी में सामान्य वर्ग में ११७वीं रैंक हासिल की, लेकिन उसे किसी भी सरकारी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। उसने सीपीएमटी में २९८४वीं, मनिपाल में ३००वीं और वीआईटी में ४५०वीं रैंक हासिल की। उसके परिवार की उम्मीदें टूटने लगीं और उन्होंने उसका दाखिला एक स्थानीय कॉलेज में बायो-टेक्नोलॉजी विषय में करवा दिया। इसी बीच, उसे सीपीएमटी की दूसरी काउंसिलिंग के लिए बुलावा आ गया। उस काउंसिलिंग में उसे मुंबई के गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज (सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल) में एक सीट मिल गई। चूंकि उसके पिता जोएब ने खुद बॉम्बे यूनिवर्सिटी से बीकॉम की डिग्री हासिल की थी, लिहाजा उन्होंने ऊपरवाले की इस रहमत के लिए शुक्रिया अदा किया और मुबीना का दाखिला तुरंत उस कॉलेज में करवा दिया। हालांकि आगे सीटों की और उठापटक में उसके लिए असम की डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी से लेकर आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की कुछ यूनिवर्सिटीज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिले की गुंजाइश बनी। मगर उसके पिता जोएब के जेहन में १९७० के दशक के दौरान मुंबई में अपनी पढ़ाई के दिनों की यादें ताजा थीं, लिहाजा उन्होंने मुबीना को किसी अनजान जगह पर भेजने की बजाय मुंबई में ही पढ़ाना बेहतर समझा। 
 
जोएब अली और उसकी बीवी अपनी बेटी से रोज रात साढ़े नौ बजे के बाद फोन पर बात करते। इसी तरह एक दिन वे अपनी बेटी से फोन पर बतिया रहे थे, तभी उन्होंने कुछ पटाखे फूटने जैसी आवाजें सुनीं। उसी दौरान एक शख्स तेजी से हॉस्पिटल होस्टल के अंदर भागता हुआ आया और सभी लड़कियों से अपने कमरों के खिड़की-दरवाजे बंद करने के लिए कहने लगा क्योंकि बाहर आतंकी हमला हुआ था। यह २६/११ का दिन था और अजमल कसाब एंड कंपनी सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल के निकट स्थित छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर खुलेआम लोगों को अपनी गोलियों का निशाना बना रही थी। उदयपुर में बैठे मुबीना के फिक्रमंद अभिभावकों ने तुरंत अपना टीवी ऑन किया, जिस पर आतंकियों के इस बर्बर कृत्य की खबरें लाइव प्रसारित हो रही थीं। जब उन्होंने यह सुना कि आतंकी हॉस्पिटल में घुस गए हैं तो वे बेहद घबरा गए। 
 
चूंकि जोएब मुंबई के भूगोल के बारे में जानते थे और टीवी पर उस दिन इस महानगर के हर हिस्से को दिखाया जा रहा था, लिहाजा उनका तनाव लगातार बढ़ता जा रहा था। जोएब और उनकी बीवी तकरीबन ४८ घंटों तक टीवी से चिपके बैठे रहे, जब तक यह खबर नहीं आ गई कि रेलवे स्टेशन और उससे सटे इलाके पूरी तरह सुरक्षित हैं। अगले दिन हॉस्पिटल के तमाम स्टूडेंट्स से रक्तदान और घायलों का उपचार करने के लिए कहा गया। सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल में तकरीबन साठ से सत्तर घायलों को लाया गया था। घायलों की मदद करने वालों में मुबीना भी एक थी। उसने अपने बीडीएस कोर्स की पढ़ाई प्रथम श्रेणी के साथ पूरी की और फिलहाल उसकी इंटर्नशिप चल रही है, जो सितंबर २०१३ तक पूरी हो जाएगी। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को लेकर फिक्रमंद उसके अभिभावकों को उम्मीद है कि सितंबर तक उनकी बेटी आत्मनिर्भर होकर घर लौट आएगी।
 
 
 
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