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जिंदगी को अपने हिसाब से जीते हुए कभी भी कर सकते हैं नई शुरुआत

n.raghuraman | Jan 07, 2013, 14:36PM IST
 
 

 
वह पूर्वी भारत में हिंदुस्तान मोटर्स के एक कर्मचारी थे। उन्हें कार के छोटे-छोटे कलपुर्जो को देखने के लिए हमेशा एक आवर्धक लैंस की जरूरत पड़ती थी, इससे ज्यादा की नहीं, लेकिन छप्पन साल की उम्र में जब वह अपने रिटायरमेंट से महज दो साल दूर थे, पहली बार एक ऐसी चीज के संपर्क में आए, जिसे दूरबीन कहा जाता है। हालांकि वह इसके बारे में पहले से जानते थे, लेकिन उन्हें कभी इसे इस्तेमाल करने का मौका नहीं मिला था।
 
पंछियों को निहारने की बात उन्हें पहले कभी समझ में नहीं आती थी। उन्होंने अनमने भाव से इस दूरबीन को लिया और खिड़की से बाहर झांकते हुए पंछियों की दुनिया का दीदार करने लगे। जो शख्स अपने आवर्धक लैंस से देखी गई हर चीज को छू सकता था, उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह दूर आसमान में चहकते पंछियों को बगैर छुए इतने करीब से दीदार कर सकता है। आज दस साल बाद राधानाथ पोले पंछियों के दीदार के लिहाज से कलकत्ता बर्डिग कम्युनिटी के सबसे विश्वसनीय एकल-व्यक्ति संसाधन हैं।  
 
उनके कदम शॉप फ्लोर पर कभी एक जगह रुकते नहीं थे और उन्होंने दूरबीन के रूप में अपने नए साथी के मिलने के बाद भी अपनी लगातार चलने की इस आदत को बरकरार रखा। हुगली के रघुनाथपुर में रहने वाले राधानाथ रोज सुबह चार घंटे तक टहलते हुए मैदानों की छानबीन करते और जलीय निकायों पर नजर रखते हैं। वह हावड़ा जिले के बोशीपोता और जॉयपुर बिल में अकसर जाते रहते हैं। वह विधुर हैं और उनका एक बेटा है। वह अकसर बेलुर और दानकुनी जैसे स्टेशनों पर जाते रहते हैं, जहां उन्हें येलो-ब्रेस्टेड बंटिंग जैसी दुर्लभ चिड़िया भी कभीकभार दिख जाती है। वह इनकी तस्वीरें ई-मेल पर अपने दोस्तों के साथ साझा भी करते हैं। किसी दुर्लभ पक्षी के दीदार पाना आसान नहीं होता। यह किसी बेहद मुश्किल एग्जाम को महीनों और कभी-कभार सालों की कोशिश के बाद क्लियर कर लेने जैसा है। रोज की इस मेहनत के ऐसे पुरस्कार का ज्यादातर लोगों की नजर में भले की कोई मायने न हों, लेकिन पक्षीप्रेमियों के लिए तो यह किसी खजाने को खोज लेने जैसा है। 
 
इस तरह के पंछियों का आना कभीकभार ही देखा जाता है, जो हमारे पर्यावरण व जलवायु बारे में बहुत-कुछ कहता है। इनका दीदार न सिर्फ हमारी आंखों को काफी सुकून देता है, वरन यह इस बात का भी संकेत है कि हम किस तरह अपनी प्रकृति को सहेज रहे हैं। 
 
राधानाथ पोले पंछियों के व्यवहार का रिकॉर्ड रखने के मामले में इतने गंभीर हैं कि एक बार तो वह दो महीने तक एक पेड़ के पास यह देखने के लिए रोज जाते रहे कि किस तरह बाबुई (दर्जिन) चिड़िया अपना घोंसला बनाती है और इसमें अपने बच्चों को रखती है। उनके सहकर्मी व संगी-साथी भी उनके इस काम की बेहद सराहना करते हैं। इतना ही नहीं, उन्हें पेड़-पौधों का भी अच्छा ज्ञान है। उनके लिए बर्ड वॉचिंग दूसरे कॅरियर के समान है। दोपहर के वक्त वह अकसर प्रकृति संबंधी किताबों से चिपके रहते हैं। वहीं उनकी शाम अपनी मां व बेटे के लिए खाना पकाने में गुजरती है। 
 
हालांकि इन सालों में उनकी बढ़ती उम्र ने बर्ड-वॉचिंग संबंधी गतिविधियों को थोड़ा सीमित कर दिया है। पहले वह कभी भी अकेले ही घूमने निकल पड़ते थे। वह अभी अलग-अलग जगहों पर जाते हैं, लेकिन लोगों के साथ समूह में। वह अपनी शर्तो पर ही जिंदगी जीते हैं।
 
फंडा यह है कि..
 
आप उम्र के किसी भी पड़ाव में किसी भी नए क्षेत्र में अपना दूसरा कॅरियर शुरू कर सकते हैं। इस तरह आपके लिए अपनी शर्तो पर जिंदगी जीने की राह भी प्रशस्त होगी।
 

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