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मिशन के साथ किया बिजनेस मुनाफे के अलावा कुछ और भी देता है

एन. रघुरामन | Jan 09, 2013, 12:37PM IST
मिशन के साथ किया बिजनेस मुनाफे के अलावा कुछ और भी देता है
प्रदीप लोखंडे एक गरीब परिवार में पैदा हुए। उनके पिता महाराष्ट्र में पुणे के निकट वाइ गांव में चपरासी थे। प्राइवेट छात्र के रूप में ग्रेजुएशन करने के बाद प्रदीप कुछ ऐसा बनने के लिए निकल पड़े, जिस पर दूसरों को रश्क हो सकता है। आज प्रदीप लोखंडे महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड, उप्र, मप्र व छत्तीसगढ़ के अनेक गांवों में जाना-पहचाना नाम हैं। वह एक मिशन लेकर चल रहे हैं। उनका लक्ष्य अपने पुणे-स्थित ग्रामीण उपभोक्ता संस्थान 'रूरल रिलेशंस' के जरिए तकरीबन २८,000 गांवों के स्कूलों में यूज्ड कंप्यूटरों की व्यवस्था करना है।
 
जब उनके दिमाग में एक रूरल मार्केटिंग डाटाबेस तैयार करने का आइडिया आया तो वह अपनी मार्केटिंग जॉब तथा अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान को छोड़ते हुए ४,००० गांवों में उनकी स्थानीय अर्थव्यवस्था के बारे में अहम जानकारियां जुटाने निकल पड़े। वर्ष १९९६ में उन्हें टाटा-टी तथा पारले कंफैक्शनरीज के रूप में अपने इस डाटाबेस के पहले ग्राहक मिले। 
 
आज उनके डाटाबेस के प्रतिष्ठित ग्राहकों में हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड, प्रॉक्टर एंड गैंबल, मैरिको, एशियन पेंट्स, टेल्को और डीएसपी मेरिल लिंच जैसी कंपनियां शामिल हैं। वह गर्व से कहते हैं-'मैं संदेश प्रसारित करने में उनकी मदद करता हूं, जिसके लिए मुझे पैसे मिलते हैं। मैं इस पैसे का इस्तेमाल इस काम (ग्रामीण स्कूलों का कंप्यूटरीकरण) को आगे बढ़ाने में करता हूं। मैं एक ऐसा बिजनेसमैन हूं, जो ग्रामीण बाजारों की अप्रयुक्त संभावनाओं से आसक्त है।' 
 
गांवों में जाते हुए लोखंडे ने महसूस किया कि वहां के छात्रों ने कंप्यूटर को सिर्फ टीवी पर देखा है और नए गैजेट्स को उनके संपर्क में लाने से उनका आत्मविश्वास बढ़ सकता है। उन्होंने वर्ष १९९८ में कुछ प्रतिष्ठित लोगों से निवेदन किया कि वे यूज्ड कंप्यूटरों को ग्रामीण स्कूलों की खातिर दान कर दें। लेकिन कहीं से भी प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने खुद यूज्ड कंप्यूटरों को जुटाने और उन्हें इन स्कूलों को मुहैया कराने का जिम्मा उठाया। इसके ज्यादातर खर्चे वह खुद वहन करते। ग्रामीण छात्रों की आंखों में कंप्यूटर को पहली बार देखने पर जो चमक नजर आई, उससे उन्हें अपना यह प्रयास सार्थक लगा। वर्ष २००० में पुणे के निकट मंदारदेव गांव के स्कूल में यूज्ड कंप्यूटर लगाने से शुरू हुआ उनका यह अभियान २२५ स्कूलों तक पहुंच चुका है और ४७०० अन्य स्कूल कंप्यूटर दानदाताओं का इंतजार कर रहे हैं। 
 
यूज्ड कंप्यूटरों को स्कूलों में लगाने के पीछे एक कारण तो यह है कि ये सस्ते पड़ते हैं। इसके अलावा ये महज दिखावटी चीजों के रूप में बेकार नहीं पड़े रहते। ग्रामीण स्कूलों में कंप्यूटर पहुंचने के बाद गांव की कई लड़कियों को छह महीने में ही कंप्यूटर के एडवांस्ड फंक्शंस को इस्तेमाल करते देखा गया, जबकि पहले उन्हें इस पर अपना नाम टाइप करने में ही पसीने छूट जाते थे। 
 
लोखंडे का यह उत्साह दूसरों को भी प्रेरणा दे रहा है। मसलन उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि अमेरिका में रहने वाले एक पूर्व आईआईटी छात्र ने ऐसे ग्रामीण स्कूल को कंप्यूटर दान किया, जहां-से उसके दिवंगत पिता ने शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने २,000-१०,000 आबादी वाले तकरीबन २८,000 उभरते ग्रामीण बाजारों की पहचान की है, जहां साप्ताहिक हाट के दौरान सैकड़ों अन्य लोग भी आकर संवाद करते हैं। दूसरी ओर कॉर्पोरेट डोनर भी लोखंडे की इस संस्था के ३५,000 ग्रामीण स्कूलों द्वारा तैयार डाटाबेस से लाभान्वित होते हैं, जहां पर वे कुकीज और चाय के पैकेट्स जैसे अपने उत्पाद बेच सकते हैं। 
 
फंडा यह है कि... 
 
यदि आपके बिजनेस के साथ एक मिशन भी जुड़ा हो तो समझिए सोने पर सुहागा है। इससे आप मुनाफा तो कमाएंगे ही, साथ ही साथ आपकी विश्वसनीयता बढ़ेगी और समाज में आपका अच्छा नाम भी होगा।? 
 
raghu@dainikbhaskargroup.com 
 
 
 
 
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