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कोई भी चीज खुद नहीं मिटती, हम उसे मिटाते हैं

एन. रघुरामन | Jan 17, 2013, 12:34PM IST
जब आप किसी सभागार में मौजूद लोगों को 'अभंग, भगवान विठोबा, पंढरपुर और सोलापुर' जैसे शब्द बोलते हुए सुनें तो आपके दिमाग में क्या आएगा? आप ठीक समझे- महाराष्ट्र। लेकिन जब आप इन शब्दों को तमिलनाडु के कर्नाटक शैली के संगीतप्रेमियों के बीच सुनें और वह भी चेन्नई में, जहां पर यह अपने शुद्धतम रूप में मौजूद है और जहां हिंदी पट्टी के प्रति खास लगाव नहीं है, तो आपका माथा जरूर ठनकेगा। 
 
पिछले दिनों पोंगल पर्व के अवसर पर आयोजित एक संगीत समारोह में इस तरह के शब्दों को सुनकर मैं भी अचंभित रह गया। यद्यपि मरदानाल्लुर सद्गुरु स्वामी ने तीन सदी पूर्व मराठी अभंग गायन से तमिलों का पहला परिचय कराया था, मगर मौजूदा तमिल बुजुर्गों के बीच इसकी लोकप्रियता को देख मैं अचंभित रह गया। श्रोताओं से खचाखच भरा सभागार बता रहा था कि ३०० साल पुरानी संस्कृति यूं ही किसी को इतना नहीं लुभा सकती। निश्चित तौर पर कोई तो ऐसा था, जो इन कट्टर तमिलों के लिए मराठी को आसान बना रहा था। ...और आखिरकार उस शख्स से मेरी मुलाकात हो गई। यह शख्स थे ५६ वर्षीय तुकाराम गणपति, जिनका मूल नाम गणपति मूर्ति है। वह अपने संगीत कार्यक्रमों में भगवान विठोबा के स्तुति-गीत 'अभंग' मराठी में गाते हैं और उनका आशय लोगों को तमिल में समझाते हैं। इस तरह उनकी प्रस्तुतियां इतनी लोकप्रिय हो गईं कि अब वहां के हरेक संगीत सत्र का नियमित हिस्सा बन गई हैं। तमिलनाडु में तिरुनेलवेलि के निकट कडयानाल्लुर नामक एक छोटे-से कस्बे में जन्मे गणपति ने १२ वर्ष की उम्र में संत तुकाराम समेत अन्य मध्यकालीन मराठी संतों के भक्तिगीतों को सुना। उनके माता-पिता मीनाक्षी अम्मल और वैद्यनाथ अय्यर भी अच्छे भजन गायक थे और उन्होंने गणपति की ललक को देखते हुए २३ साल की उम्र में उन्हें दो साल के लिए पंढरपुर में अभंग सीखने के लिए भेज दिया। 
 
इसी दौरान गणपति की मुलाकात बाबा महाराज सातरकर से हुई, जिनसे उन्हें काफी कुछ सीखने को मिला। वहां से वापसी से पूर्व वह अभंग की सैकड़ों कैसेट्स के अलावा एक अंग्रेजी-मराठी शब्दकोश खरीदना नहीं भूले, ताकि इस भाषा के बारे में और ज्यादा सीख सकें। दो दशक से ज्यादा समय तक महाराष्ट्र में रहे और मराठी भाषा के जानकार विजय वेंकटचलम ने कैसेट में गाए गए अभंग कीर्तनों को उनके लिए अनूदित किया। तमिलनाडु में नामा संकीर्तन (सत्संग) नामक भजन गायन की एक समृद्ध परंपरा है। धीरे-धीरे गणपति के भक्तिसंगीत कार्यक्रमों की ओर लोग आकर्षित होने लगे। वह अभंग कीर्तनों की कुछ तमिल पद्यों के साथ तुलना करते हुए श्रोताओं को इनके बीच का फर्क और बारीकियां समझाते। 
 
वर्ष २००२ में उनकी इन अनूठी मिश्रित रचनाओं को अमेरिका में रहने वाले कुछ लोगों ने सुना, जिसके बाद उन्हें पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के महाराष्ट्र छात्र संघ द्वारा एक कॉन्सर्ट के लिए आमंत्रित किया गया। यह उनका पहला अमेरिकी दौरा था, जहां पर उन्होंने फ्लोरिडा, लॉस एंजिल्स, मियामी और न्यूजर्सी समेत ४८ जगहों पर अपनी प्रस्तुतियां दीं। आज ऐसा एक भी दक्षिण भारतीय शहर नहीं है, जहां उन्हें सुना न जाता हो। वह ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव समेत अन्य संतों की रचनाएं गाकर सुनाते हैं और अपने १५०० से ज्यादा शिष्यों को अभंग गायन का प्रशिक्षण दे रहे हैं। अभंग गायन की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसे तुकाराम गणपति जैसे कई लोग न सिर्फ जीवित रखे हुए हैं, वरन मौजूदा पीढ़ी के बीच इसे लोकप्रिय भी बना रहे हैं। 
 
फंडा यह है कि... 
 
कुछ भी पुराना नहीं होता और न ही खुद मरता है। यदि हम किसी प्राचीन परंपरा या आदत को नया जीवन देना चाहते हैं तो हमें सिर्फ यह करना होगा कि हम उसे अपनी मौजूदा आदतों में शामिल कर उनका अभ्यास करें और उन्हें दूसरों के लिहाज से आसान बनाएं, ताकि वे भी इसे अपना सकें। 
 
raghu@dainikbhaskargroup.com 
 
 
 
 
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