धारणाओं से बचना हमेशा मुश्किल होता है
N.raghuraman
| Jan 24, 2013, 10:56AM IST

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इस सोमवार को चीन में डैनियल क्रेग की फिल्म 'स्कायफॉल' रिलीज हुई, जिसे देखने के बाद अनेक चीनी दर्शक अपने ही सेंसर बोर्ड से खफा हो गए। जब आपको पता चलेगा कि उनके सरकारी सेंसर बोर्ड ने क्या किया तो आप भी आश्चर्यचकित रह जाएंगे। उन्होंने फिल्म से तमाम चीनी लोकेशन के दृश्यों और संवादों को हटा दिया। मिसाल के तौर पर एक दृश्य में चीन के एक क्षेत्र मकाऊ को वेश्यावृत्ति के अड्डे के रूप में दर्शाया गया है। इस दृश्य को फौरन हटा दिया। फिल्म में एक किरदार कहता है, 'मैं चीनी सुरक्षा एजेंट्स के हाथों यातना झेलने की बजाय पायरेटेड डीवीडी देखना ज्यादा पसंद करूंगा।' यह संवाद फिल्मों के पायरेटेड वर्जन आने की बात करता है, जो चीन में आसानी से उपलब्ध हैं। लिहाजा इसे हटा दिया गया। इसी तरह के कई अन्य दृश्यों को (जिनमें से कुछ शंघाई में फिल्माए गए थे) को फिल्म से हटा दिया गया, क्योंकि सेंसर बोर्ड के मुताबिक वे 'चीन की गलत छवि पेश कर रहे थे'। उन्होंने एक ऐसे दृश्य को भी हटा दिया, जिसमें एक हमलावर शंघाई की एक गगनचुंबी इमारत के सुरक्षा गार्ड को मार देता है क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके सुरक्षा गार्ड को इतनी आसानी से नहीं मारा जा सकता। यदि इन दृश्यों को 'स्कायफॉल' के विश्वव्यापी प्रदर्शन से पहले हटाया जाता, तो बात समझ में भी आती। लेकिन स्थानीय सेंसर बोर्ड ने ऐसा सिर्फ चीनी दर्शकों के लिए किया, जिन तक यह फिल्म वैश्विक रिलीज के दो महीने बाद पहुंच रही थी। इस सेंसरशिप से खफा चीनी लोगों ने सोशल मीडिया में खुलेआम यह कहना शुरू कर दिया कि वहां बहुत कम फिल्में इस तरह की काट-छांट से बच पाती हैं। सुधीर मिश्रा की पिछले शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म 'इनकार' की कहानी वर्क प्लेस और खासकर विज्ञापन इंडस्ट्री में यौन शोषण के इर्द-गिर्द घूमती है, जो विज्ञापन इंडस्ट्री के लिए कतई एक अच्छा विज्ञापन नहीं है। फिल्म में माया लूथरा (जिसका किरदार चित्रांगदा सिंह ने निभाया है) एक विज्ञापन एजेंसी की नेशनल क्रिएटिव डायरेक्टर है, जो अपने सीईओ राहुल वर्मा (अर्जुन रामपाल) पर यौन शोषण का आरोप लगाती है। इसके बारे में पूरी एडवरटाइजिंग बिरादरी का यही कहना है कि यह इंडस्ट्री लैंगिक समानता की इंडस्ट्री है, उत्पीडऩ की नहीं। तमाम एडवरटाइजिंग प्रोफेशनल्स ने एक सुर में यही कहा कि फिल्म में एडवरटाइजिंग बिरादरी के बारे में जानकारी और समझ का नितांत अभाव है और संभवत: यही कारण है कि यौन उत्पीडऩ को दर्शाने के लिए वर्कप्लेस के तौर पर एक एडवरटाइजिंग एजेंसी को चुना गया। फिल्मकार के नजरिए से देखें तो कार्यस्थल पर लोगों के बीच आपसी प्रेम संबंधों से लेकर यौन उत्पीडऩ जैसे मामलों से दर्शक आसानी से जुड़ जाते हैं, क्योंकि ऐसा तो तकरीबन हर जगह होता है। यह सिर्फ भारत जैसे किसी एक देश या एडवरटाइजिंग एजेंसी जैसे किसी एक कार्यस्थल तक सीमित नहीं है। कार्यस्थल पर अगर शक्ति-असंतुलन है तो इससे यौन उत्पीडऩ को हवा मिल सकती है। लेकिन यदि इंडस्ट्री में समानता पर जोर दिया जाता है (जैसा कि एड इंडस्ट्री दावा करती है) तो उत्पीडऩ की आशंका न के बराबर रह जाती है। लेकिन एक कहानी का ताना-बाना बुनने के लिए आपको एक कार्यस्थल चुनना होता है, जो तड़क-भड़क और दिखावे से भरपूर हो और जाहिर तौर पर एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री में बहुत अधिक तड़क-भड़क होती है। इसी तरह यदि किसी फिल्म के स्टोरी प्लॉट के लिए आपको कोई ऐसा देश चुनना पड़े, जहां पर खूब पायरेटेड डीवीडी बिकती हों, तो किसी के भी जेहन में चीन का ही नाम पहले आएगा। हालांकि कई और भी ऐसे देश हैं, जहां पायरेडेट डीवीडी का यह धंधा खूब होता है। आज चीन इकलौता देश नहीं है, जहां पायरेटेड उत्पाद बनाए जाते हैं। वास्तव में यह देश दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए कहीं बेहतर क्वालिटी की कम्युनिकेशन व फार्मा मशीनें बनाता है। इसी तरह यौन उत्पीडऩ को सिर्फ एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि देश में हर जगह (यहां तक कि स्कूल में भी) इस तरह की घटनाएं होती हैं। मगर क्या करें, धारणा तो धारणा है। |






