धरती की सुरक्षा से जुड़े हैं प्रोडक्ट और मुनाफा
एन. रघुरामन | Feb 16, 2013, 10:41AM IST

जब पृथ्वी पर किसी बीमारी का प्रादुर्भाव होता है तो मानव शरीर में इसके कुछ लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यह एक शाश्वत सत्य है। यदि इस पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाए तो यह महामारी बन जाती है और फिर इंसानों को इससे उबरने में लंबा अरसा लग जाता है। ठीक इसी तरह जब मानव जाति लोभ में आकर नदियों को प्रदूषित करने या वृक्षों को काटने का काम करती है, तो प्रकृति किसी न किसी रूप में इसके नतीजों का संकेत जरूर करती है। ग्लोबल वॉर्मिंग इसी तरह का एक संकेत है। लेकिन प्रकृति ने उसके दुरुपयोग को लेकर इससे भी बड़ा संकेत हमें दिया है, जिस पर हम कोई तवज्जो नहीं दे रहे। हम में से कम ही लोगों को पता होगा कि भारत पेंसिल स्लॉट्स की वैश्विक मांग के 35 प्रतिशत हिस्से को पूरा करता है। स्लॉट का मतलब पेंसिल लीड के ऊपर लगे लकड़ी के आवरण से है। केरल के छोटे-से जिले कोल्लम में इसकी 170 फैक्टरियां हैं। वे पेंसिल स्लॉट बनाने के लिए वाट्टा नामक नरम लकड़ी के पेड़ का इस्तेमाल करती हैं। हालांकि पिछले कुछ सालों में इस पेड़ से मिलने वाली लकड़ी में काफी कमी आ गई है। भारत द्वारा मुहैया कराए जाने वाले पेंसिल स्लॉट्स से दुनिया भर की पेंसिल उत्पादक कंपनियां हर महीने 30 करोड़ पेंसिल बनाती हैं। एक स्लॉट 185 मिमी लंबा, 77 मिमी चौड़ा और 5.5 मिमी मोटा होता है। एक्सपोर्ट के एक लोड में 300 पैकेट होते हैं, जिनमें 900 स्लॉट होते हैं। केरल में पेंसिल स्लॉट का उत्पादन करने वाली कंपनियां 2000 लोगों को सीधे रोजगार उपलब्ध कराती हैं, जबकि 2000 लोग अप्रत्यक्ष रूप से इनके लिए काम करते हैं। पूरी दुनिया में कम से कम 30 देश पेंसिल स्लॉट के लिए भारत पर निर्भर हैं। इस साल 20 जनवरी को 170 में से करीब 100 कंपनियों ने आर्थिक परेशानियों के चलते अपना कामकाज बंद करने का फैसला कर लिया। उन्होंने पेंसिल बनाने वाली वैश्विक कंपनियों की उपेक्षा को अपनी खराब आर्थिक हालत के लिए जिम्मेदार बताया।
लोग परिणामों की चिंता किए बगैर अंधाधुंध तरीके से पेड़ों की कटाई कर रहे हैं। जब पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए प्रावधान किए जाते हैं, तो लोग इससे बचने का रास्ता निकाल लेते हैं। इसके कई उदाहरण हैं। पेड़ों को लगाने की जिम्मेदारी पुणे के नजदीक स्थित पिंपरी चिंचवाड़ म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की है, लेकिन निगम का कहना है कि उसके अधिकार क्षेत्र में पेड़ों को लगाने के लिए जगह नहीं बची है। इससे भी खराब बात यह है कि सड़कों की सुंदरता बढ़ाने के लिए फुटपाथ पर जो पटरियां बिछाई गई हैं, वे वहां लगे पेड़ों की जड़ों के इतनी करीब हैं कि इससे उनका विकास प्रभावित हो रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि नगर निगम यदि हरियाली को बढ़ा नहीं सकता तो कम से कम लगे हुए पेड़ों की रक्षा करे, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। उनका यह भी कहना है कि नगर निगम शहर की अलग-अलग परियोजनाओं के लिए काम कर रहे ठेकेदारों पर नजर रखने में भी असफल है और ठेकेदार हरियाली को सुरक्षित रखने संबंधी आधिकारिक मापदंडों का पालन नहीं कर रहे हैं। सीमेंट-कांक्रीट तथा पटरियों में मौजूद कैल्शियम पेड़ों की छाल को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे उनकी उम्र कम हो जाती है। पेड़ के तनों के आसपास पर्याप्त जगह नहीं होने से पानी उसकी जड़ तक नहीं पहुंच पाता। जगह की कमी के चलते पेड़ों को पर्याप्त मात्रा में हवा नहीं मिलती और फुटपाथ में भी दरारें पड़ जाती हैं।
ग्रेटर चेन्नई क्षेत्र मे पेड़ों की गिनती का काम भी बीच में अटका है, क्योंकि कई लोग सर्वे करने वालों, जिनमें अधिकतर कॉलेज छात्र हैं, को अंदर आने ही नहीं देते। अगस्त 2011 में राज्य के शहरी विकास विभाग द्वारा शुरू किया गया यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम 20 प्रतिशत इलाके तक भी नहीं पहुंच पाया और अब तक केवल 85000 पेड़ों की ही गिनती हो पाई है। संस्थाओं के असहयोग और सर्वे करने वाले छात्रों के उत्साह में कमी के चलते यह शुरुआत आगे ही नहीं बढ़ पा रही। मुंबई और पुणे में भी इसी तरह के सर्वे की शुरुआत हुई थी, लेकिन विस्तृत डाटा बैंक अब तक तैयार नहीं हो पाया है। कई लोगों का मानना है कि सर्वे के पूरा नहीं होने का कारण ही यही है कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई सामने आने से बची रहे।
फंडा यह है कि...
उद्ोगों को यह समझना होगा कि उन्हें मुनाफा तभी होगा, जब उनके उत्पादों की बिक्री होगी। उत्पाद तभी बिकेंगे, जब लोग उन्हें खरीदेंगे। और लोगों का अस्तित्व तभी बना रहेगा जब कि पृथ्वी सुरक्षित रहेगी। पृथ्वी को खत्म करने की कीमत पर लंबे समय तक लाभ कमाने की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती।
मैनेजमेंट फंडा






