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बुजुर्ग हमारी संपत्ति हैं, बोझ नहीं

एन. रघुरामन | Feb 20, 2013, 13:21PM IST
बुजुर्ग हमारी संपत्ति हैं, बोझ नहीं
कहानी 1 : इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू की सेवानिवृत्त रिसर्च स्कॉलर लक्ष्मी गुप्ता अपनी सहेली (रूममेट) से शिकायत कर रही थीं, देखो बच्चे कितने गैरजिम्मेदार तरीके से व्यवहार करते हैं। मैंने उससे कहा था कि घर पहुंचते ही मुझे फोन कर बता दे, लेकिन उसे यहां से निकले तीन घंटा हो चुका है और यहां से घर का रास्ता मुश्किल से 45 मिनट का है। वह अपने 52 वर्षीय बेटे के बारे में बात कर रही थीं, जो एक बड़ी म्यूजिक कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट है और कुछ घंटे पहले उससे मिलने आया था। काफी देर बाद जब फोन आया तो वह एक 9 साल की बच्ची की तरह दौड़ पड़ीं। वहीं दूसरी ओर से उनका बेटा बार-बार माफी मांग रहा था, मैं संगीत के क्षेत्र में शोध से संबंधित एक बहस में उलझ गया था और सुरक्षित घर पहुंच गया हूं। हालांकि, हो सकता है मैं अगले महीने आपसे मिलने नहीं आ पाऊं, लेकिन अगले दो महीनों में आपका हाल-चाल लेने जरूर आउंगा। इतना कहकर उसने फोन रख दिया। लक्ष्मी ने मुस्कराते हुए राहत की सांस ली और फिर से वृद्धाश्रम की प्रार्थना सभा की तैयारियों में जुट गई। वे इसी वृद्धाश्रम में रहती हैं और प्रार्थना सभा में उनके उर्दू के शेरों को सभी बड़े चाव से सुनते हैं। उनकी गजल और शेर सैकड़ों वृद्धजनों के दिलों को सुकून पहुंचाते हैं, जिनके बच्चे आसपास ही रहते हैं। लेकिन उनके घरों में इतनी जगह नहीं है कि वे उन्हें अपने साथ रख सकें। 
 
'क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता...' 
 
कहानी 2 : यह कई गजलों में से एक है... 
 
आप शाम को किसी पार्टी में जा रहे हैं और पार्टी में मौजूद लोगों को प्रभावित करने के लिए कोई गजल या शेर अथवा किसी कवि की आत्मकथा की कुछ पंक्तियां गाकर सुनाना चाहते हैं। आपने घर में इसे याद करने की भरपूर कोशिश की, लेकिन पार्टी में पहुंचते ही गजल का आधा हिस्सा आप भूल गए। चिंता की कोई बात नहीं। स्मार्टफोन का उपयोग करने वाले लोग भूली हुई गजल के कुछ शब्दों को सर्च ऑप्शन में डालकर पूरी गजल ढूंढ़ सकते हैं। ये उर्दू, देवनागरी और रोमन लिपियों में उपलब्ध हैं और इन्हें ईमेल और प्रिंट करने के अलावा रिफरेंस के लिए भी रखा जा सकता है ताकि पार्टी में इसकी मदद से आप पूरी गजल गा सकें। आप इसके लिए ह्म्द्गद्मद्धह्लड्ड.शह्म्द्द पर लॉग इन कर सकते हैं, जहां मिर्जा गालिब और फिराक गोरखपुरी से लेकर लखनऊ, कानपुर, लाहौर और कराची जैसे शहरों के आधुनिक गजल गायकों की रचनाएं भी उपलब्ध हैं। इस वेबसाइट पर 2500 से ज्यादा गजल, 200 से ज्यादा कवियों की कविताएं, 3000 से ज्यादा चौपाइयां, हाइपर लिंक के साथ 11 ई-बुक्स तथा ऑनलाइन डिक्शनरी भी उपलब्ध है, जिसमें 40000 से ज्यादा शब्द हैं। आप बेगम अख्तर और फरीदा खानम की रचनाएं सुन नहीं पा रहे तो इस वेबसाइट की मदद लीजिए। हर गजल की रिकॉर्डिंग उन पेशेवर लोगों द्वारा की जाती है, जो रेडियो स्टेशन के लिए रेडियो जॉकी को उर्दू शब्दों के उच्चारण का प्रशिक्षण देते हैं। वे रिकॉर्डिंग से पहले गजल के तलफ्फुज और लहजे की जांच करते हैं। वेबसाइट के प्रमोटर संजीव सराफ ने रिफरेंस के लिए पुरानी दिल्ली के उर्दू बाजार तथा दरियागंज में रविवार को लगने वाले बुक मार्केट से किताबें खरीदीं। विद्वानों के साथ प्रोफेसरों और शायरों के एक दस सदस्यीय पैनल ने साइट पर प्रकाशित हर जानकारी की सत्यता को परखा। सप्ताह के सातों दिन एक रिसर्च टीम 800 साल पुरानी गजलों की परंपरा की हर रचना को खंगालने के काम में लगी है और इसके अधिकांश सदस्य बूढ़े हैं। 
 
फंडा यह है कि... 
 
बुजुर्ग हमारी संपत्ति हैं या जिम्मेदारी, इसका फैसला खुद हमें ही लेना होगा। यदि नई पीढ़ी इन अनुभवी लोगों को अकेले में जीने-मरने के लिए छोड़ती है तो यह उसकी निरी मूर्खता है। जब हम छोटे थे तो ये हमारी संपत्ति थे, फिर बड़े होने पर वे हमारे लिए भार कैसे बन सकते हैं? 
 
 
 
 
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