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भलाई करने के लिए धन की जरूरत नहीं होती

N. Raghuraman | Feb 23, 2013, 10:13AM IST
भलाई करने के लिए धन की जरूरत नहीं होती







संता वहते कृष्णा माई- यह मराठी भाषा का एक पुराना भक्ति गीत है जिसे गायक-संगीतकार सुधीर फड़के की सुमधुर आवाज ने अमर बना दिया है। इस गीत में स्थिरता और शांति की प्रतीक कृष्णा नदी की वंदना की गई है। यह इंसान को सुख और दुख को एकसमान भाव से स्वीकार करने के साथ शांति फैलाने का आह्वान करता है। 35 साल की उम्र में शायद ही कोई इस गीत को अपना रिंग टोन बनाना पसंद करे, लेकिन संदीप कुमार सालुंखे ने ऐसा ही किया है और यह उनके चरित्र की खासियत का परिचायक है। सालुंखे कमजोर परिवार से ताल्लुक रखने वाले बच्चों के बीच रहकर उन्हें जागरूक बनाते हैं और उन्हें जीवन को पॉजिटिव नजरिये से देखने की प्रेरणा देते हैं। और जीवन की तमाम मुश्किलों से पार पाने तथा शांति हासिल करने के लिए उनके पास एक ही दवा है- शिक्षा। संदीप फिलहाल पुणे में आयकर उपायुक्त हैं। 

महाराष्ट्र के जलगांव जिले के शिरूद गांव में एक कमरे के घर में पले-बढ़े इस 35 वर्षीय युवक ने न केवल कई लोगों के जीवन को बेहतर बनाया है, बल्कि उनसे प्रेरित होकर हर साल कम से कम 600 लोग अपने जीवन का नजरिया बदल लेते हैं। उन्होंने इसकी शुरुआत अपने बारे में 15 पेज के एक पैम्फलेट से की। इसमें उन्होंने लिखा था, मैं आप जैसों में से एक हूं और आज यहां तक पहुंचा हूं। दस दिन के अंदर छात्र इस पैम्फलेट की प्रतियां आसपास के गांवों मे बांटने लगे। उनके पास दूरदराज के इलाकों से भी बड़ी संख्या में प्रस्ताव आने लगे। शिक्षा की क्रांति शुरू हो चुकी थी और इसका तेजी से विस्तार भी होने लगा था। बच्चे जिनकी जिंदगी अब तक घर से पान की दुकान और वापस घर लौटने तक सीमित थी, उनके पास आकर समय बिताने लगे। सबसे पहले उन्होंने अपने गांव के 40 बच्चों को पढ़ाया। इनमें से चौदह पुलिस कॉन्स्टेबल बन गए। पांच सौ की आबादी वाले गांव के लिए यह बहुत बड़ी बात थी। जब उनका तबादला 250 किलोमीटर दूर नासिक हो गया तो उन्होंने इस अभियान को जारी रखने के लिए एक टीम तैयार की। टीम के सदस्य एक-एक कर बच्चों को पढ़ाते और उनके पढ़ाने का तरीका भी अक्सर अलग होता था। उनकी टेली कॉन्फ्रेंसिंग का तरीका भी अनोखा था। इसके लिए मोबाइल को एम्प्लीफायर से जोड़ा जाता और फिर इसके जरिये सालुंखे उन्हें पढ़ाते थे। हर रविवार ऐसा होता और छात्र या शिक्षक कभी भी यह मौका चूकते नहीं थे। 

अपनी कोशिशों से सालुंखे ने बच्चों में पढऩे की ललक पैदा कर दी और पूरे जिले मे बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। यदि इनमें से हरेक सालुंखे की तरह संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफल नहीं भी होता, फिर भी कुछ बच्चे कम से कम पुलिस कॉन्स्टेबल बनने की उम्मीद तो कर ही सकते थे। बंधुआ मजदूरी करने वाला दीपक पाटिल हर दिन अंधेरी सड़कों पर 25 किलोमीटर साइकिल चलाकर सालुंखे के पास आता था। आज वह अमरावती में पुलिस सब इंस्पेक्टर है। नए छात्रों के साथ पहली मीटिंग में सालुंखे उन्हें अपना उदाहरण देते हैं। वह उन्हें बताते हैं कि जब वे नवीं कक्षा के छात्र थे तो कैसे उन्होंने अपने घर से पैसे चुराए थे और फिर कैसे गलती का अहसास होने के बाद उन्होंने दोबारा कभी ऐसा नहीं किया। वे बताते हैं कि वे भी कई बार हीन भावना के शिकार हो जाते थे, लेकिन इसे कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे अपनी कामयाबी के बारे में दूसरों को बताना चाहते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि कोई न कोई उनसे प्रेरित जरूर होगा। आश्चर्य की बात तो यह है कि वे कम से कम सात ऐसे बच्चों को पढ़ाई के लिए तैयार करने में कामयाब रहे हैं, जो आत्महत्या करने की तैयारी में थे। यह स्वीकारोक्ति खुद उन छात्रों की है। समाज के हर तबके के बच्चे उनके छात्रों में शामिल हैं और सालुंखे गर्व से फूले नहीं समाते जब वे उनका आभार जताते हैं। 

फंडा यह है कि... raghu@dainikbhaskargroup.com 

समाज का भला करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि आप कोई संत, उद्योगपति या अमीर हों। समाज की जरूरत समझकर आप उसे पूरा करने के लिए हरसंभव प्रयास कर सकते हैं। सालुंखे ने यह समझ लिया कि उनके समाज, उनके गांव को शिक्षा की जरूरत है और दूसरों का जीवन बेहतर बनाने के लिए उन्होंने शिक्षा को ही जरिया बना लिया। भोजन देने के बजाय वे उन्हें भोजन कमाने के योग्य बना रहे हैं जो कहीं बेहतर तरीका है। 

 

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