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अधिकार पूरा जानकारी अधूरी

सुमन परमार | Dec 09, 2012, 00:10AM IST
अधिकार पूरा जानकारी अधूरी
हमारे कॉलम आरटीआई के हीरो के लिए मिल रही ढेरों चिट्ठियां बताती हैं कि सूचना के अधिकार के जरिए अपनी समस्याओं का हल ढूंढ रहे ऐसे लोग ज्यादा हैं, जो इससे जुड़ी बुनियादी बातें जानना चाहते हैं। अब भी आम लोगों से दूर दिख रही इस कानूनी ताकत की समीक्षा करती सुमन परमार की रिपोर्ट
 
ज  ब मुरैना, मध्य प्रदेश के जैनेन्द्र तुलसानी ने अपने दोनों बच्चों के पासपोर्ट रिन्यू कराने के लिए फॉर्म भरे, तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि पासपोर्ट दफ्तर में उनसे घूस मांगी जाएगी। रिश्वत न देने का फैसला कर चुके तुलसानी ने आरटीआई की मदद से फाइल की वास्तविक स्थिति मालूम की और 20 दिन में बगैर घूस दिए पासपोर्ट रिन्यू करवाया। हमें ऐसी कई मिसालें मिल जाएंगी। लेकिन रसरंग को अपने कॉलम ‘आरटीआई के हीरो’ के लिए मिली चिट्ठियों में आम लोग अक्सर पूछते हैं कि आरटीआई कानून के तहत सूचना पाने का तरीका क्या है? (देखें बॉक्स: ऐसे करें आवेदन)। अपने हक के लिए आरटीआई आवेदन दाखिल करने वाले कई लोगों को धमकियां मिलना भी आम बात है। आइए देखें, बीते सात साल में यह कानून आम लोगों की दिक्कतें किस हद तक दूर करने में सफल हुआ:
 
ऐसे मिला हक
 
दरअसल, हमारे देश में जहां सरकार और जनता के बीच एक लंबा फासला है, वहां सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई एक्ट) आश्चर्यजनक रूप से इस दूरी को पाटने का काम कर रहा है। एक आम आदमी, जिसका जीवन सरकारी तंत्र का अत्याचार सहते हुए बीता है, अब वह खड़ा होकर सरकारी अधिकारी से सवाल पूछ सकता है कि किस वजह से सरकारी दफ्तर में उसका काम नहीं हुआ? केंद्र और राज्य सरकार के दफ्तरों से उसे निर्धारित सेवाएं और सुविधाएं क्यों नहीं मिल रही हैं? राशन कार्ड, पैन कार्ड या पासपोर्ट जैसे बुनियादी दस्तावेज क्यों नहीं मिल रहे हैं? सरकारी स्कूल या विश्वविद्यालय में दाखिला न मिलने की क्या वजह है? जरूरत से ज्यादा फीस की मांग या ज्यादा वसूली गई फीस वापस न मिलने की क्या वजह है? सवाल पूछने के अलावा अब आम आदमी उन सरकारी कागजातों और रिकॉर्ड को देख-पढ़ सकता है, जो सीधे या परोक्ष रूप से उसके जीवन पर असर डाल रही हैं। इस कानून ने पहली बार लोगों को यह जानने का भी अधिकार दिया कि उनके मोहल्ले में स्ट्रीट लाइट क्यों नहीं है? सरकारी अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं ंहै? गली में सड़क क्यों नहीं बन रही? आरटीआई ने सरकारी महकमे को न केवल उसकी जिम्मेदारी का अहसास करवाया है, बल्कि उसे जनता के प्रति जवाबदेह भी बनाया है। सूचना के अधिकार का फायदा दूरदराज के हिस्सों में भी बढ़ रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय कहती हैं, ‘सूचना के अधिकार ने लोगों को वह ताकत दी है, जिसका इस्तेमाल वह पांच साल में एक बार नहीं, बल्कि हर दिन कर सकते हैं।’ 
 
देर है कहीं-कहीं
 
जिन तमाम मुद्दों पर बहस के बाद इस कानून को लागू किया गया था, आज उससे कहीं ज्यादा बहस उसके लागू होने के बाद हो रही है। उत्तर प्रदेश में इस कानून का इस्तेमाल करने वाले 90 प्रतिशत लोगों को शुरुआती चरण में सूचना नहीं मिलने से राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। अरुणा कहती हैं, ‘एक जनसूचना अधिकारी (पीआईओ) के पास महीने में मुश्किल से दस याचिका आती होंगी। सीधे जनता से जुड़े मामलों में संख्या ज्यादा हो सकती है। पर, उनका निपटारा करने की जगह राज्य आयोग पर डाल दिया जाता है। वहां भी सुनने वाला कोई नहीं है।’ आरटीआई पर काम कर रहे एक एनजीओ का दावा है कि केन्द्रीय सूचना आयोग में 20,00क् मामले लंबित हैं। उत्तर प्रदेश में 40,000 और महाराष्ट्र में 24,000 मामलों पर सुनवाई बाकी है।
 
धमकियां भी आम हैं
 
आरटीआई कार्यकर्ताओं को सूचना न देना, उन्हें धमकाने और उनकी हत्या होने जैसी घटनाओं ने कई बड़े सवाल खड़े किए हैं। जानलेवा हमले, धमकियां, अपहरण जैसी घटनाएं आम हैं। सूचना आयोग कि क्या सकारात्मक भूमिका हो सकती है? मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिo्र बताते हैं, ‘सूचना मांगने वाले व्यक्ति की पहचान छिपाना इस कानून के खिलाफ है। ऐसे में राज्यों की पुलिस को मुस्तैदी से काम करना चाहिए, क्योंकि समाज में हर व्यक्ति की सुरक्षा की गारंटी उनकी है।’ अच्छी बात यह है कि हाल ही में पंजाब और हरियाणा सरकार ने एक कानून पारित किया है। इसमें सूचना मांगने वाले व्यक्ति की शिकायत पर उसे पुलिस सुरक्षा देने का प्रावधान है। साथ ही केंद्र सरकार भी इनकी सुरक्षा के लिए कानून लाने वाली है। पूर्व सूचना आयुक्त ओ.पी. केजरीवाल का कहना है, ‘अधिकतर राज्यों में तो इन्फॉर्मेशन कमिश्नर के पद खाली हैं, जिन्हें भरा नहीं जा रहा। साथ ही लोगों की तरफ से आने वाले आवेदन भी बढ़ते जा रहे हैं।’ लेकिन, कई राज्यों में आरटीआई कानून के बेजा इस्तेमाल हुआ है। सत्यानंद कहते हैं, ‘लोगों ने इस कानून का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए करना शुरू कर दिया है। इससे सरकारी महकमे में काम करने वाले लोगों का समय और पैसा, दोनों ही बर्बाद होता है।’
 
सरकार की नीयत पर संदेह
 
सूचना के अधिकार ने समाज को सशक्त बनाने और भ्रष्टाचार के कई मामलों को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई है। लेकिन, जनता को मिली यह ताकत राजनैतिक दलों की आखों की किरकिरी साबित हुई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों अपने भाषण में इस कानून की तारीफ कम और आलोचना ज्यादा की। एक तरफ राजनैतिक दलों का मानना है कि इस अधिकार का दुरुपयोग हो रहा है, सरकारी और राजनीतिक महकमे के लोगों को परेशान किया जा रहा हैं। दूसरी ओर, आरटीआई कार्यकर्ता इसे साजिश मान रहे हैं। केजरीवाल का कहना है, ‘सरकार तो किसी भी तरह से जनता से यह अधिकार छीनना चाहती है। सूचना के अधिकार को बचाने के लिए हमारी लड़ाई जारी है। जनता ने इस अधिकार को पाने के लिए संघर्ष किया था और अब इस अधिकार को बचाने के लिए उसे फिर संघर्ष करना पड़ेगा।’
 
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