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जवान मुल्क, बुजुर्ग नेता

विवेकशुक्ला और भरत | Aug 05, 2012, 09:36AM IST
 
 

भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, पर इसकी बागडोर विश्व के सबसे बुजुर्ग नेताओं के हाथों में है। यही नहीं, हमारी जनसंख्या की उम्र घटी है और हमारे नेताओं की उम्र बढ़ रही है। देश और नेताओं के बीच बढ़ते जनरेशन गैप, उसके अंजाम और सुधार के सुझावों पर विवेकशुक्ला और भरत शर्मा की रिपोर्ट।

पहली बार 1957 में जब 30 साल के प्रकाश सिंह बादल पंजाब विधानसभा में दाखिल हुए, तब देश की कमान पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथों में थी। 55 बरस बाद बादल 85 साल केहैं, लेकिन वे सियासत का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। 1921 में जन्मे और हाजीपुर, बिहार से चुने गए सांसद रामसुंदर दास 90 पार हैं, लेकिन नर्वस नहीं। वी एस अच्युतानंदन 1923 में पैदा हुए, 1967 में वे विधानसभा में पहुंचे और फिलहाल 88 साल की उम्र में केरल विधानसभा में विपक्ष केनेता हैं। देश में ऐसे बूढ़े नेताओं की पूरी फौज है। इसमें 78 केराष्ट्रपति, 79 केप्रधानमंत्री, 84 केमुख्यमंत्री और 85 केराज्यपाल हैं। 70 बरस की पकी उम्र में 68 लोकसभा सांसद, 25 केंद्रीय मंत्री, 19 राज्यपाल/उपराज्यपाल और 6 मुख्यमंत्री सत्तासीन हैं।

मसला यह है किजिस भारत का जिम्मा इन बूढ़े कंधों पर है, उसकी आबादी में आधे से ज्यादा लोगों की उम्र 25 साल से कम है। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिकरिसर्च (एनसीएईआर) केएक अध्ययन केमुताबिकसाल 2020 में भारतीयों की औसत उम्र 29 साल होगी। 2011 के अनुमान के मुताबिक भारत की आबादी में 65 साल से ज्यादा केसिर्फ 5.5 फीसदी लोग हैं। लेकिन आबादी केआंकड़ों से ठीक उलट, भारत केकैबिनेट मंत्रियों की औसत उम्र 65 साल, मुख्यमंत्रियों की 62 साल और अलग-अलग राज्यों में तैनात राज्यपालों की औसत उम्र 74 साल है। साफ है, नौजवान देश की दिशा तय करने वाला नेतृत्व बूढ़ा होता जा रहा है। सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज, दिल्ली केप्रोफेसर आशीष नंदी का कहना है, ‘सभी दलों केबुजुर्ग नेता, नए चेहरों को जगह देने केलिए तैयार नहीं हैं। नतीजतन, 70 पार केनेताओं का दबदबा कायम है। ऐसे हालात में युवाओं के उन सवालों को अहमियत नहीं मिल पाएगी, जो रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े हैं।’ प्रो. नंदी की बात से इत्तेफाक रखने वालों की कमी नहीं। सिटी बैंक, मुंबई में कार्यरत चार्टर्ड एकाउंटेंट अर्पित जैन कहते हैं, ‘अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के दूसरे देशों की तरह हमारे यहां भी यंग लीडर देश की कमान क्यों नहीं संभालते? मैं तो चाहता हूं किदेश में ऐसे युवा चेहरे नेतृत्व संभालें, जो यंगिस्तान से जुड़े मसलों को हल करने की पहल का माद्दा रखते हों।’

राजनीतिक दल मानने को तैयार नहीं

दरअसल, बहुमत की ताकत के बूते लोकतांत्रिकभारत का नेतृत्व कर रहे बुजुर्गवार नेता राजनीति की चौसर केमंझे हुए खिलाड़ी हैं। राजनीतिकपटल पर इनकेखिलाफ कोई कुछ नहीं बोल पाता, जो स्वाभाविकभी है। मध्य प्रदेश की मंदसौर लोकसभा सीट से कांग्रेस की 39 वर्षीय युवा सांसद मीनाक्षी नटराजन कहती हैं, ‘देश के नौजवानों के सपने सिर्फ युवा नेतृत्व से ही पूरे नहीं हो सकते। अनुभव की अनदेखी नहीं की जा सकती।’ कुछ इसी तरह की बात भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी भी कहते हैं। उनकेमुताबिक, ‘जो लोग समाजसेवा केजरिए राजनीति में आते हैं, जमीनी स्तर पर काम करते हैं, संघर्ष करकेआते हैं, उनकी उम्र हो जाती है।’ माकपा नेता वृंदा करात की राय भी नटराजन और नकवी से अलग नहीं है। वृंदा कहती हैं, ‘यह जरूरी तो नहीं है कि सिर्फ युवा ही देश हित के बारे में बेहतर तरीकेसे सोच सकते हैं। हम अपने बुजुर्ग और अनुभवी नेताओं का लाभ लेते रहेंगे। हमारी पार्टी में युवाओं को भी सरकार और संगठन में पर्याप्त अवसर मिलते हैं।’ वैसे माकपा नेता ज्योति बसु ने 86 साल की उम्र में स्वास्थ्य संबंधी कारणों से जब कुर्सी छोड़ी, तब तक वे लगातार 23 साल मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का रिकॉर्ड बना चुके थे। जाहिर है, उम्रदराज नेताओं केअनुयायी या पार्टी के जूनियर उनकी प्रासंगिकता केमुद्दे पर अपने हाथ नहीं जलाना चाहते।


तमाम राजनीतिकमतभेदों केबावजूद सभी पार्टियां अपने बुजुर्ग नेताओं के स्थान पर नए और ज्यादा ऊर्जावान नेताओं को अहमियत नहीं दे पातीं। पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा करीब 80 बरस केहोने केबावजूद सियासत का मैदान छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। संसद से लेकर किसी समारोह तक में जाकर ऊंघने लगते हैं, पर रिटायर नहीं होना चाहते। 84 बरस के भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने राजनीति में रहते हुए सब कुछ हासिल कर लिया है, पर ‘7, रेस कोर्स’ में रहने की चाहत के चलते वे राजनीति में जमे हुए हैं। 87 साल के एम. करुणानिधि अब भी डीएमकेका नेतृत्व छोड़ने केलिए राजी नहीं हैं। उनकेबेटों के बीच नेतृत्व कब्जाने को लेकर चल रहा संघर्ष अब ठंडा पड़ गया है, क्योंकि करुणानिधि अपने पद से चिपके हुए हैं। सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च के प्रेसिडेंट प्रताप भानू मेहता कहते हैं, ‘इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता कि हमारे यहां तेजतर्रार नेताओं को पार्टी संगठन और सरकार में अहम पद मिलें। लेकिन, मैं अपने मौजूदा युवा नेताओं केप्रदर्शन से संतुष्ट नहीं हूं। उनकेपास देश केविभिन्न मसलों को लेकर विजन का अभाव ही दिखता है।’ उत्तर प्रदेश का मौजूदा युवा नेतृत्व मेहता के कथन की पुष्टि करता है। अखिलेश यादव से लोगों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन बतौर मुख्यमंत्री उनका अब तक का प्रदर्शन निराशाजनकरहा है। कांग्रेसी नेताओं के बारे में मेहता कहते हैं, ‘1970 के दशककेयुवा कांग्रेसी नेता ज्यादा मैच्योर थे। मुझे कांग्रेस केदो युवा नेता, चंद्रशेखर और अशोक मेहता का खासतौर पर ख्याल आता है। क्या आपको इस दौर में उनकेकद केयुवा नेता दिख रहे हैं?’


राहुल गांधी या अखिलेश यादव ही नहीं, बल्कि वरुण गांधी, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुप्रिया सुले, नवीन जिंदल, अगाथा संगमा जैसे कई नामचीन नेताओं को नेतृत्व केलिए विरासत में कुर्सी मिली है। समाजशास्त्री और काउंसिल फॉर सोशल स्टडीज केफेलो मनोरंजन मोहंती कहते हैं, ‘हमारे सियासी दलों केखाने केऔर दिखाने केदांत अलग होते हैं। ये सभी नौजवानों को आगे लाने का वादा तो करते हैं, पर अपने बेटे, बेटी, बहू वगैरह को ही युवा मानते हैं।’ मुलायम सिंह यादव अपने भाई, पुत्र, भतीजे केबाद बहू डिंपल को भी सांसद बनवाने में सफल हो गए हैं। युवाओं को आगे लाने केनाम पर भूपेंद्र हुड्डा केपुत्र दीपेंद्र हुड्डा, बादल की बहू हरसिमरत कौर, स्व. बंसीलाल की पोती श्रृति चौधरी, शीला दीक्षित केबेटे संदीप दीक्षित जैसे नेता, राजे-रजवाड़ों के वंशवाद या परिवारवाद की शैली में पोस्ट और पावर पा रहे हैं।



वयोवृद्ध होना कुशल नेतृत्व की शर्त नहीं है। फिर भी युवा नेतृत्व की एकतरफा वकालत बेमानी है। भारतीय राजनीति में तन से बुजुर्ग, लेकिन मन से जवान कई मिल जाएंगे, जिनकेकाम में उम्र कभी आड़े नहीं आई। देश-विदेश की कई भाषाओं केजानकार, आर्थिक सुधारों के प्रणोता और भारत को परमाणु शक्ति बनने की राह दिखाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव 70 बरस की उम्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे, लेकिन उनका कार्यकाल उपलब्धियों से भरा रहा। महज युवा होना कामयाब लीडरशिप की गारंटी नहीं है। 1985 में 40 की उम्र में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और राष्ट्र को 21वीं सदी केसुनहरे सपने दिखाए। शुरुआत अच्छी रही, लेकिन बोफोर्स केमुद्दे पर 1989 में उनकी पार्टी की करारी हार हुई। 1985 में असम केछात्र आंदोलन के बूते प्रफुल्ल कुमार महंत 31 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी टीम का प्रदर्शन विवादास्पद रहा। हालांकि मंहत आज भी असम में कद्दावर राजनीतिज्ञ और विधानसभा में विपक्ष केनेता हैं, जहां 64 साल केमुख्यमंत्री तरुण गोगाई और 84 साल केराज्यपाल जानकी वल्लभ पटनायक कुर्सी संभाले हुए हैं। 1985 केयुवा और आज के दौर केवयोवृद्ध मुख्यमंत्री असम की बुनियादी समस्याएं दूर नहीं कर सके। असम तब भी जल रहा था और आज भी जल रहा है।

युवा नेतृत्व की मिसाल हैं कई मुल्क


डेविड केमरुन 45 साल के हैं और ब्रिटेन केप्रधानमंत्री हैं। उनसे पहले टोनी ब्लेयर सिर्फ 43 साल की उम्र में ब्रिटेन केप्रधानमंत्री बन गए थे। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री 50-50 साल के हैं। 1992 में बिल क्लिंटन 46 साल की उम्र में राष्ट्रपति केरूप में व्हाइट हाऊस की सीढ़ियां चढ़ चुकेथे। 47 साल केबराकओबामा को अमेरिकी जनता ने जॉन मैक्नन की तुलना में इसलिए पसंद किया क्योंकि वे कम उम्र केथे। वहीं 51 साल पहले जब जॉन कैनेडी को राष्ट्रपति बनाया गया था, तब उनकी उम्र 43 साल थी। लेकिन हमारे देश केशीर्ष नेताओं की सोच 88 बरस के जिम्बाब्वे केराष्ट्राध्यक्ष रॉबर्ट मुगाबे और इजराइल केप्रधानमंत्री शिमोन पेरेज केअलावा 80 बरस के क्यूबा केराष्ट्रपति राउल कास्त्रो और केन्या केप्रधानमंत्री मवई किम्बिकी के समान नजर आती है। हमारे नेता नेल्सन मंडेला का अनुसरण कर सकते हैं, जिन्होंने स्वेच्छा से दक्षिण अफ्रीका केराष्ट्रपति का पद छोड़ दिया था। वे चाहते तो जीवनभर अपने देश केराष्ट्रपति बने रह सकते थे। अमेरिका के13वें संविधान संशोधन में राष्ट्रपति और गवर्नरों केलिए पद पर बने रहने की सीमा तय कर दी गई। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा और यूरोप केबहुत से देशों में हारे हुए नेता अगले चुनावों में सक्रिय नहीं रहते।


पार्टी की लीडरशिप राजनीतिकदलों का अंदरूनी मामला है, लेकिन क्या सार्वजनिकसेवा से जुड़े पदों केलिए उम्र की सीमा का कोई बंधन नहीं होना चाहिए? नटराजन, करात और नकवी, सांसदों और विधायकों केलिए उम्र की समय सीमा तय करने को गलत मानते हैं, लेकिन यह सवाल 2004 में सचिन पायलट उठा चुकेहैं। प्रो. मोहंती मानते हैं, ‘उम्र को बंधन केरूप में नहीं, अनुशासन केरूप में पार्टियां खुद अपनाएं। फेयरवेल पार्टी देने की तारीख तो तय होनी ही चाहिए।’ क्या आप भी अपने उम्रदराज नेता को फेयरवेल देना चाहेंगे?
 
 
 

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