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इनसे रोशन हमारी दिवाली

आनंद प्रकाश श्रीवास्तव | Nov 11, 2012, 00:03AM IST
इनसे रोशन हमारी दिवाली
दिवाली की रात आपने कभी यह सोचा है कि जान हथेली पर रखने वाले नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात पुलिसकर्मी, रेल इंजन के ड्राइवर, अग्निशमन कर्मी, नाइट डच्यूटी करने वाले डॉक्टर और बिजली विभाग के कर्मचारी रोशनी का यह त्योहार कैसे मनाते हैं? जब पूरा देश रोशनी और मिठाई के सागर में डूबा रहता है, ये लोग पूरी शिद्दत के साथ हर तरह की आपात स्थिति से निपटने के लिए कमर कसे रहते हैं। जाहिर है, मुसीबत बताकर नहीं आती। आग बुझाने वाले फायर ब्रिगेड महकमे की बात करें, तो दिवाली की डच्यूटी वहां अनिवार्य है। छुट्टी मिलने का सवाल नहीं। जब हम लोग पटाखे जलाने में मशगूल होते हैं, अस्पतालों में डॉक्टर इमरजेंसी के लिए तैनात होते हैं। पुलिसकर्मियों पर सुरक्षा का जिम्मा होता है और रेलगाड़ी दिवाली की रात भी नहीं थमती, सो उसे चलाने वाला भी चाहिए। नियमों के मुताबिक दिवाली पर डच्यूटी करने के बदले इन्हें बाद में छुट्टी तो मिलती है, लेकिन इसका फायदा क्या है..ये लोग बिना इस बात की परवाह किए देश के सबसे बड़े त्योहार पर अपना कामकाज संभालते हैं, ताकि दूसरे लोग आराम से दिवाली मना सकें। 
 
वीरेन्द्र सिंह, डिविजनल फायर ऑफिसर, दिल्ली 
 
वीरेन्द्र सिंह दिवाली डच्यूटी का चार्ट बना रहे हैं, जो बेहद आसान है। वजह जानते हैं? दिवाली पर उनके डिपार्टमेंट के किसी साथी को अवकाश नहीं मिलता। सिंह ने 23 बरस की नौकरी में हर दिवाली दफ्तर में या आग बुझाते हुए गुजारी है। उन्होंने बताया कि स्टाफ दिन में ही दिवाली पूजा कर लेता है, क्योंकि रात में कई जगह से आग लगने की खबरें आने लगती हैं। और यह सिलसिला अगली सुबह 4 बजे तक चलता है। सिंह ने बताया, ‘दिवाली की रात दिल्ली में छोटी-बड़ी आग लगने की करीब 350 घटनाएं होती हैं। हम सूचना मिलने के एक मिनट में अपने फायर स्टेशन से निकल जाते हैं।’ क्या दिवाली पर घर-परिवार की याद नहीं आती? उन्होंने जवाब दिया, ‘शुरुआत में दिवाली पर डच्यूटी करने पर घर की याद आई, लेकिन धीरे-धीरे अहसास हुआ कि त्योहार मनाने से ज्यादा जरूरी है लोगों की जान बचाना। घरवाले भी मेरे हालात जानते-समझते हैं।’
 
विनोद तिवारी, थाना प्रभारी, दंतेवाड़ा
 
विनोद तिवारी की दिवाली इस बार भी मोर्चे पर गुजरेगी। वह 30 साल से पुलिस विभाग में हैं और एक बार भी परिवार के साथ त्योहार मनाने का मौका नहीं मिला। इस बार और मुश्किल है, क्योंकि उनका परिवार दंतेवाड़ा से करीब 500 किलोमीटर दूर कवर्धा में है। तीन साल पहले की दिवाली वह कभी नहीं भूल सकते। तिवारी ने बताया, ‘हम थाने में पूजा की तैयारी कर रहे थे, जब खबर मिली कि नक्सलियों ने पास के एक गांव पर हल्ला बोल दिया है। हम घटनास्थल पर पहुंचे और मुठभेड़ शुरू हो गई। करीब ढाई घंटे में हमने चार नक्सली मार गिराए। थाने लौटकर रात 12 बजे पूजा-अर्चना की।’ विनोद को त्योहार से ज्यादा जरूरी डच्यूटी लगती है, इसलिए सबसे बड़े त्योहार पर परिवार से यह दूरी भी नहीं खलती। उन्होंने कहा, ‘दरअसल, पिता और बड़े भाई भी पुलिस की सेवा में थे। इसलिए बचपन में भी दिवाली पर कई मर्तबा पिता जी नहीं होते थे। कुछ यही मामला मेरे साथ है। पत्नी और बच्चे मेरी मजबूरी समझते हैं और मेरा पूरा साथ देते हैं।’
 
प्रमोद कुमार, ट्रेन ड्राइवर, नॉर्दर्न रेलवे, दिल्ली
 
भारतीय रेल में पिछले 12 साल से कार्यरत प्रमोद ने तीन बार दिवाली पर डच्यूटी की है। जब कभी ऐसा हुआ, उन्हें दिवाली का अहसास कुछ ज्यादा हुआ। हालांकि, उन्हें इसका मलाल नहीं। उनका कहना है, ‘जब नौकरी करते हैं तो हमें पता होता है कि रोजगार के साथ-साथ मेरा काम जनता की सेवा करना भी है।’ कई बार पूजा करने के वक्त को लेकर उन्हें अजीबोगरीब प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा है। उन्होंने बताया, ‘एक बार दिवाली के दिन छह बजे शाम से मेरी डच्यूटी लगी थी। मैं जब अपने घर में चार बजे ही पूजा करने लगा, तो पड़ोसियों को बड़ा अटपटा लगा।’ प्रमोद के अनुसार रेलवे में किसकी डच्यूटी कब लगेगी, कुछ पता नहीं रहता और उनकी डच्यूटी भी 16 घंटे की होती है। प्रमोद को सबसे बुरा तब लगता है जब किसी निर्जन जगह पर उनकी ट्रेन खड़ी हो जाती है और दीयों और रोशनी के त्योहार में बाहर घना अंधकार होता है।जीतेंद्र कुमार 
 
 
विनायक नरवड़े, टेस्टिंग ऑपरेटर, बिजली विभाग, इंदौर
 
दिवाली की रात जब हर कोना रोशन होता है, विनायक नरवड़े की पूरी कोशिश होती है कि शहर में कहीं भी बिजली न जाए। 35 साल से मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्रीय विद्युत वितरण लिमिटेड से जुड़े विनायक के लिए दिवाली सबसे खास है। इस दिन वह 4 बजे से रात के 12 बजे या फिर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे की शिफ्ट में रहते हैं। विनायक ने बताया, ‘हम यह सुनिशिचत करते हैं कि जहां भी किसी ट्रांसफार्मर में गड़बड़ हो या किसी जगह बिजली का तार टूटने के कारण आपूर्ति ठप हो, वहां इंजीनियर और लाइनमैन घटनास्थल के लिए तुरंत रवाना हो जाएं।’ वह कंट्रोल रूम में रहते हैं और शहर में जहां भी बिजली जाती है, सबसे पहले उन्हें खबर मिलती है। घर की दिवाली मिस करते होंगे? वह कहते हैं, ‘सवाल उठता है कि मैं घर में लक्ष्मी पूजा करूं या ऑफिस में पूरी मुस्तैदी से काम करूं,  जिससे मुझे लक्ष्मी मिलती है। मुझे दूसरा विकल्प पसंद है।’
 
डॉ. मोनिका वधावन, गाइनोकोलॉजिस्ट, फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा
 
दिवाली के मौके पर हम-आप भले त्योहार मनाने में मशगूल हों, लेकिन नाइट डच्यूटी में जुटे अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए यह बिलकुल अलग अनुभव है। डॉ. मोनिका ऐसे ही कुछ डॉक्टरों में से एक हैं। वह किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ में थी। शादी के बाद पहली दिवाली का मौका था, लेकिन उनकी नाइट डच्यूटी लगा दी गई। उन्होंने बताया, ‘पहले तो मैं थोड़ा उदास हुई, लेकिन फिर लगा कि यह तो हमारे प्रोफेशन की डिमांड है। मैंने सोचा कि मरीजों की सेवा भी तो ईश्वर की पूजा की तरह है। थोड़ी देर में साथी डॉक्टर और नर्सेज कहीं से पटाखे और मिठाई ले आए। हमने वहीं दिवाली मनाई।’ उसके बाद कई बार ऐसा मौका आया, जब अस्पताल में ही दिवाली मनी। दो साल पहले एक गर्भवती महिला ने दिवाली के रोज बच्चे को जन्म दिया, जो पिछले नौ महीने से डॉ. मोनिका की देखरेख में थीं। उनकी डच्यूटी नहीं थी, लेकिन महिला के आग्रह पर डच्यूटी न होने के बावजूद दिवाली की रात वह अस्पताल पहुंचीं और डिलिवरी करवाई।
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