Home » Magazine » Aha! Zindagi » Future City

रोमांचित करेंगे ‘तब’ के शहर...

dainik bhaskar | Nov 15, 2012, 15:51PM IST
रोमांचित करेंगे ‘तब’ के शहर...
एक ऐसी जगह के बारे में सोचिए, जहां वाहन जमीन से कई मीटर ऊंचाई पर चल रहे हैं! जहां भी नजर घुमाओ, एक-दूसरे के ऊपर से गुजरती सड़कों का जाल दिखाई दे रहा है..  आप अपने रेजिडेंशियल टॉवर की 12वीं मंजिल पर रहते हैं और बालकनी के पास से सड़क निकलकर जा रही है, बाहर जाने के लिए नीचे जाने की जरूरत नहीं है, अपनी मंजिल पर ही बने पार्किग एरिया से आप कार निकालते हैं और सीधे सामने वाली सड़क पर आ जाते हैं!
 
 
किसी परिचित जगह पर कुछ साल बाद जाएं तो एकबारगी सिर चकराना लाजिमी है। कोई भी ऐसी जगह, जहां हमने लंबा वक्त बिताया हो या कोई ऐसा शहर या कस्बा, जिससे इतने समय तक वास्ता रहा हो कि वहां के गली-मोहल्लों से हम जान-पहचान बना पाए हों.. ऐसी किसी जगह से फिर से रू-ब-रू होते ही हमारी हैरानी से लबालब प्रतिक्रियाएं कुछ इस तरह की होती हैं — ‘अरे, कितना बदल गया सब कुछ.. लग रहा है किसी नई जगह आ गया हूं! यहां पर तो सिनेमा हॉल होता था, यह मल्टीप्लेक्स कब बना! और वहां.. वहां में दो बार सब्जी मंडी लगती थी न.. अब ये बीस मंजिला हाउसिंग सोसायटी..! तो फिर सब्जी मंडी कहां लगती है..? क्या! वो लगती ही नहीं.. ! ओह.. तो अब सब्जी की खरीदारी मेगास्टोर से हो जाती है.. वाकई, बड़ी तरक्की कर गई यह जगह तो..!!’ वगैरह, वगैरह..। कुल जमा बात यह कि वो परिचित जगह भी हमें नितांत अजनबी लगती है, मानो हमारे कदम वहां पहली बार पड़ रहे हों। 
 
यह तय है कि समय, हालात और जरूरत के मुताबिक परिवर्तन होने हैं, यह संसार का नियम है। लेकिन इन परिवर्तनों के साथ भी एक नियम जुड़ा है और वो यह कि जो परिवर्तन हमारी आंखों के सामने होते हैं, जिन्हें हम रोज-बरोज देखते हैं, वो हमें महसूस नहीं होते, क्योंकि हम हर गुजरते दिन उसे देखने के होते जाते हैं, लेकिन जब हम इन बदलावों को लंबी समयावधि के बाद देखें तो हमें अंतर साफ महसूस होता है, सब कुछ बदला नजर आता है। उस पर यह कि जेट की रतार से भाग रही इस दुनिया में हमें इस तरह से अचंभित होने के मौके भी जल्दीजल्दी मिल रहे हैं। पहले ऐसा दशकों बाद होता था, अब साल-छह महीने में होने लगा है। हम सोच भी नहीं पाते कि पूरा शहर अपना कलेवर बदल लेता है, उसकी हर रग नई ताल के साथ धड़कने लगती है, गांव अपना लबादा उतारकर नया आवरण ओढ़ लेता है, उसकी आबो-हवा नए अंदाज से बहती महसूस होती है और महानगर.. उनकी तो पूछिए मत.. चंद महीनों में ही वहां एक अलग दुनिया बसी हुई नजर आती है। ऐसे में जरा सोचकर देखें कि १क्क् साल बाद क्या होगा! कैसे होंगे हमारे शहर, क्या रूपरंग होगा हमारे महानगरों का? यकीनन हम जूल्स वर्न या एच.जी. वेल्स की तरह बेहद वैज्ञानिक कल्पनाओं पर आधारित गल्पकथाएं तो नहीं कह पाएंगे, लेकिन अपनी सोच की ‘टाइम मशीन’ पर बैठकर उड़ेंगे तो अलग ही नजरा हमारे सामने होगा और भविष्य की वीथिकाओं में ‘द इनविजिबल मैन’ की तरह तफरीह करने का रोमांच यकीनन चेहरे पर मुस्कुराहट बनकर तैर जाएगा।
 
चलिए, चलते हैं 50 साल आगे
 
कुछ साल पहले ‘लवस्टोरी 2050’ नामक एक फिल्म आई थी, जिसमें आधा कथानक वर्ष 2050 का था। समयकाल के हिसाब से मुंबई महानगर की जो तसवीर उसमें दिखाई गई थी, वह अचंभित कर देने वाली थी। इसमें उड़ने वाली कारें थीं, कांच की 200 मंजिला इमारतें थीं, होलोग्रास वाले विज्ञापन थे, और रोबोट भी। यह एक साइंस फंतासी फिल्म थी। फिल्म में जो था, उसमें से कितना कुछ सच होने की गुंजाइश है, इस बारे में यही कहा जा सकता है कि जिस तेजी से विज्ञान तरक्की कर रहा है और आए दिन नई तकनीक सामने आ रही है उसे देखकर वो तो छोड़िए, उससे भी आगे सोचा जा सकता है। ..और हम तो यहां और 10क् साल आगे की बात कर रहे हैं, लेकिन फंतासी के जादुई गलीचे पर उड़ने के बजाय हम यहां अपनी कल्पनाओं को आकार आज की जमीनी हकीकत के आधार पर देंगे।
 
जमीन से कई सौ मीटर ऊपर सांस लेंगे शहर
 
एक ऐसी जगह के बारे में सोचिए, जहां वाहन जमीन से कई मीटर ऊंचाई पर चल रहे हैं! जहां भी नÊार घुमाओ, एकदूसरे के ऊपर से गुजरती सड़कों का जाल दिखाई दे रहा है.. मानो किसी दैत्याकार शरीर में धमनियां और शिराएं फर्राटे भर रहे हों! आप अपने रेजिडेंशियल टॉवर की 12वीं मंजिल पर रहते हैं और आपकी बालकनी के पास से सड़क निकलकर जा रही है, बाहर जाने के लिए आपको नीचे जाने की जरूरत नहीं है, अपनी मंजिल पर ही बने पार्किग एरिया से आप कार निकालते हैं और सीधे सामने वाली सड़क पर आ जाते हैं! एक इमारत से दूसरी इमारत में जाने के लिए स्काईवॉक हैं और आपको हर बार ग्राउंड पर जाने की जरूरत नहीं है! ज्यादा दूरी तय करने के लिए ऐसी लिट्स हैं, जो जमीन के समानांतर चलती हैं।
 
आज जिस रतार से यातायात के साधन बेहतर होते जा रहे हैं और शहरों में लाईओवर, मेट्रो ट्रेन, स्काई बस जैसे कॉन्सेप्ट तेजी से वास्तविकता का जामा पहन रहे हैं, उसे देखते हुए 50 साल बाद के शहरों की ऐसी कल्पना करना मुश्किल नहीं है। आबादी बढ़ने के साथ हर शहर के इन्फ्रॉस्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ता जाना तय है। जमीन हमारे पास कम होती जा रही है। ऐसे में एक ही समाधान हमारे सामने बचेगा.. आसमान का रुख करना और जमीन के नीचे जाना। कोलकाता में जमीन के नीचे मेट्रो ट्रेन 28 साल से चल रही है। दिल्ली की मेट्रो जमीन के अंदर भी है और जमीन से ऊपर भी। मुंबई में अजगर की भांति लहराते मेट्रो के ट्रैक आकार ले रहे हैं। चेन्नई, बंेगलुरु, हैदराबाद जैसे शहरों में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है। चंडीगढ़ जैसा योजनाबद्ध शहर जहां महानगरों की बनिस्बत आबादी और यातायात का दबाव कहीं कम है, वहां भी स्काई बस की परिकल्पनाएं मूर्त रूप लेने को तैयार बैठी हैं।
 
जहां तक रिहायशी इमारतों का सवाल है, वो भी अब आकाश को चूमने के लिए बेताब दिख रही हैं। महानगरों में तो ऊंचे टावर का चलन दो दशक पहले शुरू हो गया था, लेकिन अब छोटे शहरों ने भी इस तरफ कदम बढ़ा लिए हैं। उपलब्धता कम होने और मांग बढ़ने से जमीन महंगी होती जा रही है तो अब हर छोटे से छोटे भूखंड का अधिकतम इस्तेमाल होने लगा है। कम एरिया में ज्यादासेज्यादा घर बन रहे हैं। खाली जगहें कंक्रीट के जंगलों में दुबककर रह गई हैं। महानगरों में तो पुरानी छोटी इमारतों को तोड़कर टावर बन रहे हैं। पुराने सिनेमाघरों को गिराकर उनकी जगह मॉलकममल्टीप्लेक्स बनाए जा रहे हैं। छोटे शहर भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। वहां पुराने हाट-बाजारों की जगह शॉपिंग प्लाजा आकार ले रहे हैं। शहरों के भीतर की खाली जगहों पर कस्बेनुमा आवासीय इलाके उगते जा रहे हैं, जो एक तरह से आत्मनिर्भर हैं, क्योंकि उनमें बैंक, स्कूल, बाजार सब कुछ हैं। सारा नजारा कुछ ही साल में बदल गया है। 50 साल बाद क्या होगा, इसका अनुमान लगाना बेहद आसान है। अभी शहरों में उपनगर और मोहल्ले होते हैं, तब शहरों के भीतर शहर होंगे। या यूं कहें कि न्यूयॉर्क शहर की तरह भारत में भी कई ऐसे महानगर होंगे, जो शहरों से मिलकर बने होंगे। इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। दिल्ली महानगर में गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा व गाजियाबाद को शामिल करके देखा जाता है। वहीं, बृहद मुंबई में कितने ही इलाके ऐसे हैं, जो ठाणो और नवी मुंबई जिलों में पड़ते हैं।  
 
जिस रतार से शहर रूप बदल रहे हैं, उसे देखकर कह सकते हैं कि आने वाले वक्त में भारतीय महानगरों की स्काईलाइन मैनहट्टन, टोक्यो या दुबई से अलग नहीं होगी। दुबई में मौजूद दुनिया की सबसे ऊंची इमारत ‘बुर्ज खलीफा’ 830 मीटर ऊंची है और इसके 163 तल हैं। इसमें ऑफिस हैं, होटल हैं और रिहायशी अपार्टमेंट भी। यह इमारत भविष्य की दुनिया की झलक है। 50 साल बाद भारतीय शहरों की शक्ल यकीनन इस झलक से मिलती-जुलती होगी। 
 
विश्वस्तरीय नए शहर भी होंगे हमारे आसपास
 
इधर, हमारे देश में कुछ समय से रियल एस्टेट कंपनियों के ऐसे विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं, जिनमें 21वीं सदी के विश्वस्तरीय शहर बसाने की बात कही जा रही है। ..और बड़ी बात यह कि लोग ऐसे प्रोजक्ट्स में बढ़चढ़कर निवेश भी कर रहे हैं, लेकिन ये शहर महानगरों की सीमाओं के बाहर उन इलाकों में हैं, जो फिलहाल ग्रामीण हैं, जंगलों में हैं, झीलों के किनारे या फिर हाईवे पर हैं। ऐसे शहरों को पूरी तरह बसाने की समयसीमा भी ज्यादा दूर नहीं है.. यही कोई आज से सात-आठ साल बाद तक। ऐसे संभावित शहरों की रूप-रेखा देश के कोने-कोने में बन रही है.. आप चाहे दिल्ली से आगरा के बीच यमुना एक्सप्रेसवे पर देख लें, ग्रेटर नोयडा के और गुड़गांव में सोहना रोड पर स्थित ग्रामीण इलाकों पर नजर दौड़ा लें, मुंबई-पुणो एक्सप्रेस तथा मुंबई-गोवा हाईवे पर बन रहे टाउनशिप्स के बारे में जानकारी ले लें, या फिर महाराष्ट्र की सहयाद्रि पहाड़ियों के भीतरी इलाकों में एबी वैली और लवासा सिटी जैसी बड़ी परियोजनाओं का उदाहरण ले लें — हर जगह भविष्य के बेमिसाल शहरों के बीजांकुर फूट चुके हैं। कल्याण के बाहर कोंकण रेलवे के साथ-साथ कई लाख एकड़ में पलावा सिटी की बात की जा रही है, जिसमें आवासीय इमारतों के अलावा, मेट्रो रेल, शॉपिंग मॉल्स, खेल के मैदान, होटल, स्कूल, क्लब हाउस, पार्क इत्यादि सब होंगे। 
 
पुराने शहरों में नया विकास करने के मुकाबले ऐसे शहरों में सहूलियत यह है कि इनमें जगह की कोई कमी नहीं है, क्योंकि सारा काम शून्य से शुरू होना है तो इन्हें आने वाले समय और जरूरतों के हिसाब से योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया जा रहा है। ये शहर छोटे-बड़े गांवों की कीमत पर बन रहे हैं और जिन लोगों की जमीन ली जा रही है, उन्हें इन शहरों में घर दिए जा रहे हैं। ऐसे में हम 50 साल आगे देखें तो बेखटके कह सकेंगे कि कितने ही गांव अपना अस्तित्व खोकर शहरों में बदल गए हैं और उनमें रहने वाले लोग बिना कहीं गए शहरी हो गए हैं। 
 
आबादी भी छोड़ेगी अपनी गहरी छाप
 
भारत के शहरों की शक्ल पर तकनीक, विकास और जुनून का जितना असर नजर आएगा, कमोबेश उतना ही असर आबादी का भी होगा। यह सवाल सामने हमेशा रहेगा कि जिस रतार से नित नए रंग हमारे शहरों में भरे जा रहे हैं, क्या वो उस शहर की आबादी के लिए काफी हैं? पिछले साल आबादी पर आई यूनाइटेड नेशन्स की एक रिपोर्ट में अनुमान है कि वर्ष 2025 में हम आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ देंगे और आज से 50 साल बाद, यानी वर्ष 2060 तक भारत की आबादी 172 करोड़ तक जा पहुंचेगी। इसके बाद यह कम होनी शुरू हो जाएगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तब तक भारत के 54 फीसदी लोग शहरों में रह रहे होंगे, यानी भारत.. जिसके बारे में कहा जाता है कि वह गांवों में बसता है, वह 50 साल बाद शहरों में बसने लगेगा। तय है कि बढ़ी हुई आबादी की जरूरतें पूरी करने के लिए उसी अनुपात एवं रतार से मूलभूत सुखसाधन भी बढ़ाए जाएंगे। इसका असर विकास पर होगा। जरूरतें किसी भी तरह के विकास का प्रेरक बल हैं। विश्व के विकसित देशों को देखें तो वहां का विकास लोगों की जरूरतों को पूरा करने की धुन का परिणाम है, लेकिन जो मूल अंतर हमें अपने यहां देखने को मिलता है, वो यह है कि हम आज की जरूरत के हिसाब से विकास करते हैं, जबकि विकसित देशों में विकास 2530 साल बाद की जरूरतों के मुताबिक किया जा रहा है। नतीजा यह होता है कि जब तक विकास का अगला चरण पूरा होता है, तब तक शहर की जरूरतें बढ़ जाती हैं। तो क्या हम 50 साल बाद ऐसे शहरों में होंगे, जहां हर तरह की सहूलियतें तो होंगी, लेकिन उनका पूरी तरह से आनंद लेने के लिए हमारे पास स्पेस नहीं होगा। स्काईवॉक होंगे, लाईओवर होंगे, मेट्रो रेल का जाल होगा, कई सौ मंजिला इमारतें होंगी, लेकिन इनका हर कोना लोगों से भरा होगा। हालांकि इससे महानगरों की ओर पलायन कम होगा।
आपके विचार
 
अपने विचार पोस्ट करने के लिए लॉग इन करें

लॉग इन करे:
या
अपने बारे में बताएं
 
 

दिखाया जायेगा

 
 

दिखाया जायेगा

 
कोड:
10 + 6

 
विज्ञापन

बड़ी खबरें

रोचक खबरें

विज्ञापन

बॉलीवुड

जीवन मंत्र

स्पोर्ट्स

जोक्स

पसंदीदा खबरें

फोटो फीचर

 
Email Print Comment