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मैं हूं पैनेराम

 
Source: अर्चना सिंह   |   Last Updated 20:37(02/01/12)
 
 
 
 
मेरा नाम पैनेराम है। हिमाचल प्रदेश में रहता हूं। हिमाचल बारह जिलों में बंटा हुआ है। हर जिले की अपनी संस्कृति, रहन-सहन और खानपान है। मैं हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव में अपने माता-पिता और बहनों ‘कश्मीरो’ और ‘व्यासा’ के साथ रहता हूं।

हमारे घरों की छतंे स्लेट और लकड़ी से बनाई जाती है। छतें ढलवां होती हंै और फर्श कच्चे, जिन पर गोबर और मिट्टी को मिला कर लिपाई की जाती है। अब अधिकतर घरों में पक्के फर्श भी बन गए हैं। हमारे गांव बहुत सुन्दर होते हैं। चारों ओर चीड़ के पेड़ों की वजह से हरियाली रहती है। हम अपने घर पहाड़ियों पर बनाते हैं। जब रात घरों में रोशनी की जाती है तो लगता है कि पहाड़ियों पर जुगनू चमक रहे हैं। ऊंचे से ऊंचे मकानों में भी बिजली होती है।

एक और खास बात, यहां गर्मी कम पड़ती है। इसलिए कूलर और पंखें तीन से चार महीने ही चलते हैं। हम तीनों भाई-बहन स्कूल जाते हैं। मेरी बहनें सलवार-कमीÊा और मैं कमीÊा-पैंट पहन कर जाता हूं। सर्दियों में मां के हाथ की बनी जर्सी-कोटी, बूट-Êाराबा और ‘टोपू’ पहन कर जाता हूं। मेरी बहनें सलवार कमीÊा के साथ काटी और ‘पट्टू’ ओढ़कर जाती हैं। मां हमें नाश्ते में छल्ली (मक्के) की रोटी और लस्सी देती है। कभी-कभी छल्ली की रोटी को दूध में मीड़ (मैश) करके भी खाते हैं। मां हम सबको इसका चूरमा भी देती हैं। चूरमा छल्ली की रोटी, घी और शक्कर से बनता है। मां हम लोगों को पराठा और रोटी के संग कभी-कभी अचार भी देती हैं।

मेरा जन्मदिन हो या फिर कोई त्योहार इन मौकों पर मां बबरू, एंकले, मदरा, महा की दाल और ‘मीठा’ बनाती है। मीठा चीनी की चाशनी में गुलदाना और ड्राइफ्रूट्स डालकर बनाया जाता है। कभी-कभी कद्दू का मीठा भी बनाती है। खट्टी दाल, चने का खट्टा कढू और चावल, राजमा हमारे यहां अक्सर बनते हैं। कभी-कभी मां अरबी वाली खट्टी कढ़ी भी बनाती हंै। सर्दियों में छल्ली की रोटी और घी शक्कर हम लोग बड़े चाव से खाते हैं।

पहाड़ों में अब तो सड़के बन गई हैं और इससे बसें भी खूब चलने लगी हैं। इसके बावजूद भी हमलोग पगडंडी और पहाड़ियां उतर कर ही स्कूल जाते हैं, इससे हमारा समय बचता है, क्योंकि बस लम्बे रास्ते से होकर जाती है। हम स्कूल जाते समय अपने साथ दूध का डोलू भी अपने साथ ले जाते हैं। जो लोग हमसे दूध लेते हैं उनके दूध के डोलू को अपने साथ स्कूल जाते वक़्त ले जाते हैं। स्कूल से आते वक़्त वही डोलू वापस ले आते हैं। कभी मां को कुछ सामान बाÊार से मंगवाना होता है, तो वो भी हम से कह देती हैं और हम लोग स्कूल से आते वक़्त खरीद लाते हैं। पहाड़ों पर चढ़ना-उतरना थकावट भरा काम है।

जब आप लोगों की गर्मियों की छुट्टियां पड़ती हैं तब भी हमारा स्कूल खुला रहता है। हम सबकी छुट्टियां जुलाई और अगस्त में पड़ती हैं। हमारे यहां के खद्दू (छोटी नदियां) थोड़ी सी बरसात में ही भर जाती हैं। हमें इन्हें पार करके स्कूल जाना होता है। वर्षा ऋतु में हम लोगों की छुट्टियां होती हैं। क्योंकि स्कूल जाते समय उन नदियों में बच्चों के डूबने की आशंका बनी रहती है। हालांकि, पुल अब काफी स्थानों पर बन गए हैं, फिर भी छुट्टियां जुलाई में ही होती हैं। इन छुट्टियों में अपनी बहनों कश्मीरा, व्यासा और अपने दोस्तों चैतु, मंहतु, कपूरा, कुंती के साथ ‘पीपल का पत्ता’ और ‘ऊंच-नीच का पापड़ा’ खेलता हूं। हॉकी और क्रिकेट भी खेलता हूं। कभी हम जामुन और सेब तोड़ने चल पड़ते हैं तो कभी खद्दू (छोटी नदी) में नहाने निकल जाते हैं। खद्दू में नहाना बहुत अच्छा लगता है, पर कई बच्चे इसमें डूब गए हैं इसलिए माता-पिता यहां आने नहीं देते। पर हम सब तो छुप-छुपाकर आ ही जाते हैं।

अब तक छल्ली की बिजाई हो चुकी होती है और हमारी छुट्टियां भी हो जाती है तो हम सभी बच्चे अपने-अपने खेतों में भी काम करने निकल जाते हैं। हम सब अपने पिता जी के साथ ढीलों (मिट्टी के ढेले) तोड़ने में मदद करते हैं। मेरी दोनों बहनें मां के साथ घर का काम करवाने के साथ जंगल से लकड़ियां और जानवरों के लिए घास भी लाती हैं। हम कंडोलू लेकर अक्सर हैंडपंप से पानी भी लाते हैं। जब मैं अपने पिता के साथ खेत पर काम करने जाता हूं, तो मेरी बहनें चाय और लस्सी लेकर खेत पर आती हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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