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सूचना का संसार

dainikbhaskar.com | Dec 07, 2012, 16:56PM IST
सूचना का संसार


टीवी हो या फिर मोबाइल, कम्प्यूटर हो या फिर लैपटॉप इन सभी को आप अच्छी तरह से ऑपरेट कर सकते हैं। अब आपसे पूछा जाए कि ये सब किसके तहत आते हैं? कौन-सी तकनीक इनके पीछे काम करती है?..आई टी यानी इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी! बस, इतना ही। इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी के बारे में आइए कुछ और जानकारी बढ़ाते हैं।
 
इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी इंजीनियरिंग की वह शाखा जो संचार यानी कम्यूनिकेशन के माध्यम को और भी सुविधा सम्पन्न बनाए। इसके अंतर्गत टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट और टेलीफोन आदि आते हैं।
 
कुछ खास
 
अब आप सोच रहे होंगे कि इस शब्द का उद्भव आखिर कहां से हुआ? किसने इस शब्द को जन्म दिया। इसके पीछे बड़ी ही दिलचस्प कहानी है। वर्ष १९५८ की बात है, हुआ यह कि हार्वड बिजनेस रिव्यू नामक पत्रिका ने लैविट और व्हिसलर को न्यू टेक्नोलॉजी विषय पर एक लेख लिखने को कहा। उस लेख में ही न्यू टेक्नोलॉजी को इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी का नाम मिला।  
 
1980 तक आते-आते विश्व इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी के युग में प्रवेश कर चुका था। और इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी बेहतरीन इंजीनियरिंग का ही तो नतीजा था। इन्हीं की वजह से ही तो सूचनाओं का प्रचार-प्रसार इतना आसान हो गया था।
 
 
कैसी-कैसी तरंगें!
 
सूचनाओं का आना-जाना, बड़ा ही दिलचस्प है। वैसे, तरंगें दो तरह की होती हैं। मैकेनिकल वेव्स यानी यांत्रिक तरंगे और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स यानी विद्युत चुम्बकीय तरंगें। इन दोनों के जरिए ही ऊर्जा स्थानांतरित होती है। यांत्रिक तरंगें और विद्युत चुम्बकीय तरंगों में अंतर होता है। जहां यांत्रिक तरंगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन के लिए एक मार्ग की आवश्यकता होती है, वहीं विद्युत चुम्बकीय तरंगों को किसी प्रकार के मार्ग की आवश्यकता नहीं होती। ये हवा हो या फिर निर्वात, मिट्टी या फिर कोई कठोर धातु सभी से अपने संदेश को प्रवाहित कर सकती हैं। विद्युत चुम्बकीय तरंगों का ही एक रूप रेडियो तरंगें हैं। यही संचार की दुनिया में क्रांति ले कर आईं। 
 
 
तरंगों की कहानी
 
सूचनाएं कैसे यहां से वहां तक प्रेषित होती हैं?..यह सवाल आपके मन में जरूर आया होगा। हम बताते हैं। दरअसल, यह सब ऊर्जा तरंगों के माध्यम से होता है। इन्हें रेडियो तरंगें कहते हैं। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में सबसे ज्यादा वेवलेंथ यानी की तरंग दैध्र्य रेडियो तरंगों की होती हैं। यह किसी फुटबॉल मैदान से भी ज्यादा बड़ी हो सकती हैं और किसी फुटबॉल के आकार की भी। ये तरंगें आपके रेडियो पर कोई गाना भी शुरू करवा सकती हैं, तो टेलीविजन पर कहीं और का नजरा भी दिखा सकती हैं। मोबाइल पर बात भी करवाने में सक्षम हैं। 
 
ये तो हुई इन तरंगों के बारे में जानकारी। अब यह काम कैसे करती हैं, यह भी जानना जरूरी है। घर पर कई बार सुना होंगा, सिग्नल वीक है। इसलिए पिक्चर क्लीयर नहीं है। ये सिग्नल ही तो तरंगें हैं। 
 
जैसे टेलीविजन को ही लेते हैं। सबसे पहले टेलीविजन स्टेशन से रेडियो तरंगों को ब्रॉडकास्ट किया जाता है, जो आपके  टेलीविजन के एंटीना या फिर डिश (छतरी) तक आता है और फिर डिश से केबल द्वारा आपके टेलीविजन तक प्रेषित किया जाता है। 
 
कम्प्यूटर है जरूरी
 
आज हर जगह आपको कम्प्यूटर दिखाई दे जाएंगे। और इनके आने से सुविधाएं भी कुछ ज्यादा ही बढ़ गईं हैं। बैंक का एटीएम हो फिर आफिस में काम करने वाले कर्मचारी, सबको इनकी आदत है। इनकी वजह से ही विकास की रफ्तार इतनी बढ़ी है। इनके न रहने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सही है न।
 
पर आप जानते हैं पहला कम्प्यूटर कब बना था? द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यानी १९३९-१९४५ के बीच में किया गया था। इसका निर्माण कोलोसस ने अपने इंजीनियर दोस्त टॉमी फ्लॉवर्स के साथ मिलकर किया। इसके बाद मैनचेस्टर स्मॉल-स्केल एक्सपेरिमेंटल मशीन यानी एसएसईएम, पहली इलेक्ट्रो डिजिटल स्टोर्ड-प्रोग्राम कम्प्यूटर १९४८ में बनाया गया। हालांकि, इससे पहले कम्प्यूटर की अवधारणा कर ली गई थी। खगोलीय पिंडों की गणना के लिए पहले मैकेनिकल कैलकुलेटर का निर्माण १६४५ में हुआ। 
 
आई पैड
 
यह टैबलेट कम्प्यूटर है, जिसे एप्पल ने 2010 में बाजर में उतारा था। यह लैपटॉप और आई फोन का मिलाजुला रूप है। आप इसे बस टच करके  ऑपरेट कर सकते हैं। इसमें इंटरनेट ब्राउज करने के साथ फिल्में देख सकते हैं और गाने सुनने के अलावा गेम्स के भी मजे ले सकते हैं। आईपेड ने सबसे सफल टैबलेट कम्प्यूटर का हासिल किया। इन तरंगों ने कैसे आसान कर दिया है न सबकुछ।


 

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