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उम्मीदों का उजाला....

कमलेश माहेश्वरी | Jul 12, 2012, 15:09PM IST
 
 

एचसीएल यानी हिंदुस्तान कम्प्यूटर्स लिमिटेड एक ऐसी इंडियन मल्टीनेशनल कंपनी है, जो अपनी ब्रांड टैगलाइन की तरह वाकई दिलों को छू रही है। तमिलनाडु के प्राचीन शहर नेल्लई के नडार परिवार से निकले होनहार युवा शिव नडार ने 1976 में मात्र एक लाख 87 हजार रुपयों के निवेश के साथ एक कमरे से एचसीएल शुरू की थी। करीब 40 साल में पद्म विभूषित शिव नडार ने पहली पीढ़ी का संघर्ष कर पक्की नींव बना दी, और अब उनकी बेटी रोशनी उस पर भविष्य की संरचनाओं को आकार दे रही हैं।


पिता के संघर्ष से सबक लेकर अपनी पढ़ाई और पसंद को कारोबार में लगाकर रोशनी ने परिवार के आईटी कारोबार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया है। हालांकि पूरे समूह में महत्वपूर्ण ऑपरेशंस अनुभवी प्रोफेशनल्स संभाल रहे हैं, लेकिन साथ ही साथ नई पीढ़ी भी पैर जमा रही है। नए आइडियाज पर काम करते हुए उन्होंने बोरियत भरे पोर्टफोलियो में नई ऊर्जा भर दी है। मंदी के दौर में टीम को प्रोत्साहित करते हुए एकजुट रखना और सीमित संसाधनों में अति महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स को सफल बनाना समय की मांग है, इसीलिए रोशनी एजुकेशन और आईटी, दोनों ही क्ष़ेत्रों में सक्रियता से जुटी हुई हैं। शिव नडार की इकलौती संतान होने के नाते एचसीएल से जुड़े तमाम रणनीतिक फैसलों में रोशनी की भूमिका अहम है। एचसीएल ब्रांड को एक इंडियन ब्रांड के रूप में बढ़ाने के लिए विजन और रणनीति बनाने में भी रोशनी का योगदान बढ़ रहा है। एचसीएल के ट्रेजरी ऑपरेशंस, ब्रांड बिल्डिंग और सामाजिक उपक्रमों का कामकाज देख रही रोशनी कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में ड्राइविंग फोर्स बनकर उभरी हैं। रोशनी को कारोबारी मैदान में उतरे अभी मात्र तीन वर्ष हुए हैं पर जिस गति से वे बढ़ रही हैं उसे देखकर हैरत होती है। पढ़ाई और पिता की सीख ने उनके अंदर ऐसा विश्वास जगाया कि आज वे खुद बड़ी जिम्मेदारी के साथ हजारों बच्चों के उजले भविष्य को संवारने में जुटी हैं।



करिअर की उलझनों में मददगार सीख


एक टीवी इंटरव्यू में रोशनी ने अपनी पढ़ाई और करिअर के बारे में बताया। उन्हीं के शदों में, उन्हीं की कहानीदस वर्ष पहले स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं आगे पढ़ाई के लिए एक विदेशी यूनिवर्सिटी में एप्लीकेशन भेज रही थी। तब मेरे दिमाग में भी उसी तरह की तमाम उलझनें थीं, जो हर नए छात्र को होती हैं। मैं सोच रही थी कि आगे की पढ़ाई इकॉनॉमिक्स में करूंगी। तभी एक दिन अपने माता-पिता से बातचीत के दौरान मैंने अपने सजेक्ट को लेकर कहा कि मैं समझ नहीं पा रही हूं कि इकॉनॉमिक्स लेकर आगे क्या करूंगी? यह सुनने के बाद उनकी तुरंत प्रतिक्रिया थी, क्या तुम जानती हो कि एक विदेशी यूनिवर्सिटी में तुम क्यों पढ़ने जा रही हो? जवाब भी उन्हीं का था, पहला कारण यह है कि वहां कुछ अच्छा पढ़ने के विकल्प बहुत से हैं और फिर यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम अपनी पसंद से सबसे अच्छा क्या चुनती हो। उन्होंने यह भी कहा तुम जो भी चुनो ऐसा चुनो कि उससे आगे कुछ कर सको अन्यथा चार साल का यह समय बेकार चला जाए।

इसके बाद मेरी उलझन काफी हद तक दूर हो गई। इकॉनॉमिक्स को भूलकर मैंने अपनी पसंद के मीडिया स्कूल, अमेरिका के इलीनॉइस स्थित नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से रेडियो, टेलीविजन एंड फिल्म में पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान मैं भारत लौटी और समर इंटर्नशिप के दौरान सीएनबीसी में काम किया। बाद में अमेरिका में सीएनएन चैनल के साथ भी इंटर्नशिप पूरी की। मीडिया से जुड़ना और खबरों में डूबकर काम करना मेरी पसंद का जीवन बदल देने वाला अनुभव था, जो मुझे लंदन तक लेकर आया। पढ़ाई पूरी होने के बाद मैंने स्काय न्यूज चैनल में बतौर न्यूज प्रॉड्यूसर काम शुरू किया।

उम्मीदों का आसमान

लंदन में सब ठीक चल रहा था कि अचानक एक दिन डैड मुझसे मिलने आए। हम साथ बैठकर बातें कर रहे थे और तभी उन्होंने पूछा कि तुम आगे और क्या करना चाहती हो? क्या तुम भारत लौटना चाहती हो, क्योंकि वहां तुम्हें पूरी करने के लिए कई बड़ी जिम्मेदारियां हैं? मैं हैरान हुई हालांकि इकलौती संतान होने के नाते मुझे इस बात का एहसास था कि एक दिन पसंद और जिम्मेदारियों में से किसी एक को चुनने की चुनौती सामने जरूर आएगी। मुझे थोड़ा वक्त लगा और मैंने समझ लिया कि वाकई मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारियां हैं और डैड ने मेरे लिए एक बड़ा कैनवास खाली छोड़ रखा है। इसे मेरा विशेषाधिकार ही कहा जाना चाहिए कि मुझे भारत में काम करने के लिए एक तैयार प्लेटफॉर्म मिल रहा था, अब यह मुझ पर था कि मैं कैसे उसे आगे ले जाती हूं। काफी सोच-समझने के बाद मैंने पाया कि मेरी तैयारी अभी पूरी नहीं है कि भारत जाकर सीधे तौर पर डैड के साथ जुड़ जाऊं। यहीं से मुझे बिजनेस मैनेजमेंट सीखने की प्रेरणा मिली और वह भी मेरी पसंद के सजेक्ट्स में।

1996 से लेकर 1998 के दो साल के दौरान मैंने अमेरिका के केलॉग्स स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से सोशल इंटरप्राइज एंड स्ट्रेटजी में एमबीए पूरा किया। यह इसलिए भी जरूरी था कि डैड ने आईटी के साथ एजुकेशन सेक्टर में उतरने का फैसला कर लिया था। 1996 में इसकी शुरुआत चेन्नई में मेरे दादाजी के नाम से शुरू किए गए एसएसएन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से हुई। यह मेरे लिए अच्छा मौका था कि मैं एक नए वेंचर को अपनी आंखों के सामने शुरू होते देख रही थी, क्योंकि एचसीएल की स्थापना मेरे जन्म से पहले हो गई थी। मुझे बिजनेस स्कूल में सब कुछ बहुत जल्दी सीखना था, क्योंकि मेरे लिए एक बड़ा काम भारत में इंतजार कर रहा था। मैंने तय किया कि पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे पढ़ाई के क्षेत्र में ही नई कारोबारी संभावनाओं को उद्यम बनाना है। बहुत जल्दी ही यह सपना मेरी पसंद बन गया और मुझे महसूस होने लगा कि मैं बहुत कुछ करने के लिए बहुत कुछ सीख रही हूं।

नया कदम, विद्याज्ञान

विदेश में पढ़ाई करने के ये मायने नहीं होते कि हम भारत की स्थितियों-परिस्थितियों को नकार कर विदेशों में ऐसा होता है। वैसा होता है, का गुणगान करें। रोशनी ने इसी सत्य को समझा और उन्होंने उस क्ष़ेत्र को ज्यादा महत्व दिया, जहां एक का नहीं सबका भला होता है। मसलन, शिक्षा के क्ष़ेत्र में उनकी नई पहल को देश-दुनिया में बेहद सराहा गया है। अपने नए काम के बारे में रोशनी कहती हैं, अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को जांचने के बाद मैंने पाया कि यदि मैं इसी काम को नए आइडियाज के साथ आगे ले जाऊं तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

कुछ कर दिखाने के इसी जज्बे के साथ रोशनी ने अपने प्रयासों और पिता के सहयोग से बुलंदशहर में अपनी तरह के एक अनोखे स्कूल विद्याज्ञान की नींव डाली। राज्य सरकार के सहयोग से अगस्त 2009 में स्थापित यह स्कूल एक ऐसा क्रांतिकारी उपक्रम है, जो पिछड़े जिलों के मेधावी, लेकिन गरीब बच्चों को उच्च स्तर की शिक्षा मुत में उपलध कराता है। इस स्कूल में हर एक जिले से कक्षा छठी से ऊपर के ऐसे होनहार बच्चों को चुना जाता है, जो बहुत अच्छा पढ़ना चाहते हैं, लेकिन अपने माता-पिता के सक्षम नहीं होने से अंधेरे में खो जाते हैं। इन्हीं बच्चों को भविष्य के चमकते सितारे बनाने का बीड़ा रोशनी ने उठाया है। सिर्फ तीन साल में उन्होंने यूपी के तमाम 71 जिलों को अपना लक्ष्य बना लिया है। विद्याज्ञान की शाखाएं बढ़ रही हैं और तीन हॉस्टल्स के साथ यह करीब 4200 गरीब बच्चों के भविष्य को संवार रहा है। रोशनी ने प्रदेश में ही शिव नडार यूनिवर्सिटी की स्थापना के साथ शहरी बच्चों के लिए भी स्कूल शुरू किए हैं। नोएडा और गुड़गांव में अपने पिता के नाम पर शुरू हुए ये स्कूल अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं के साथ देश को सक्षम युवा पीढ़ी देने में समर्थ हंै। 2020 तक रोशनी की योजना देशभर में ऐसे 25 स्कूल शुरू करने की है।


सक्सेस फ़ॉर्मूला है प्लान बी

मैंने अपने पिता से सीखा है कि हर योजना का एक विकल्प हमेशा तैयार रखो। यदि आपके पास किसी काम को करने का प्लान ए है तो साथ ही साथ प्लान बी भी तैयार रखना चाहिए। आईटी क्षेत्र में तो इसके बहुत ज्यादा मायने हैं। मैं किसी काम की प्लानिंग करके अपने पिता के पास जाती हूं और उनसे कहती हूं कि यह प्लान है तो वे सबसे पहला सवाल करते हैं कि प्लान बी क्या है। वे पूछते हैं कि बैकअप क्या है? बैकअप या प्लान बी से उनका मतलब होता है एक टिकाऊ, बिल्कुल प्लान ए की जगह लेने वाला प्लान बी, कोई ऐसी योजना नहीं जिसे तुरतफुरत कामचलाऊ कहा जाए और आगे चलकर बेकार साबित हो।
 
 
 

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