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कृष्ण की तरह जियो जिंदगी

चण्डीदत्त शुक्ल | Aug 13, 2012, 12:20PM IST
 
 

जिंदगी के मायने तलाशते हुए कभी आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि कोई व्यक्ति पूर्ण व्यक्तित्व कब बन जाता है? एक मामूली से शख्स के मुकम्मल शख्सियत बनने की यात्रा को गौर से देखिए। आप पाएंगे कि सुख-दुख, उतार-चढ़ाव, हंसी-निराशा और प्रेम द्वेष जैसे कितने ही झंझावात से जूझते हुए किसी की पूरी जिंदगी बनती है, बुनी जाती है। हम बार-बार कहते रहे हैं कि जीवन का मतलब सांसों का आना-जाना नहीं होता। जब तक जिंदगी में उद्देश्य नहीं होता, नजरिया साथ नहीं चलता, तब तक जीवन का कोई अर्थ नहीं बनता। जिंदगी असल मायने में क्या है, यह बात जाननी हो तो कृष्ण को पढ़िए, कृष्ण को समझिए। आप कहेंगे कि कृष्ण देवता हैं, उनके बारे में क्या कहा जाए! नहीं, ऐसा मान लेना किसी एक संदर्भ में तो सही हो सकता है, लेकिन गोविंद की पूर्ण व्याख्या यह नहीं है।

कृष्ण संपूर्णता का नाम हैं। कृष्ण मनुष्य हैं। देवता हैं। स्पष्ट हैं। रहस्य हैं। योगिराज हैं। गृहस्थ हैं। संत हैं। योद्धा हैं। चिंतक हैं। संन्यासी हैं। लिप्त हैं। निर्लिप्त हैं। शिशु हैं तो संकट में हैं। किशोर हैं तो युद्ध कर रहे हैं। युवा हैं तो महाभारत की दिशा तय कर रहे हैं। देव होने के बावजूद चमत्कार नहीं करते। सच तो यह है कि कृष्ण केवल कर्म करते हैं। कर्म पर ही विश्वास करते हैं और इसी की सीख देते हैं।

जिंदगी की मुकम्मल परिभाषा समझने के लिए कृष्ण भाव को परखने और उसमें अंतर्निहित संदेश को कार्य-व्यवहार में उतारने की बेहद जरूरत है। आइए, कृष्ण चरित्र और उनके व्यक्तित्व को शुरुआत से समझने की कोशिश करते हैं। एक शिशु, जिसके जन्म से पहले उसकी हत्या की बिसात बिछाई जा चुकी है। जन्म लेने के तुरंत बाद उसे जैविक माता-पिता से दूर कर दिया गया। पलना-बढ़ना एक ऐसे घर में, जहां कोई रक्त संबंध नहीं है। बचपन में ही कितनी ही साजिशों से जूझना पड़ा। एक तरह से कृष्ण की पूरी शख्सियत से युद्ध करते हुए ही सुदृढ़ होती है। कंस से लड़ाई इतनी आसान नहीं थी। पहले उसके भेजे दुष्ट आक्रमणकारियों से युद्ध, फिर इंद्र को चुनौती और अंतत: कंस का संहार। कृष्ण के पूरे व्यक्तित्व की एक खास बात को हम बार-बार देखते हैं, वह यह है कि वे माया-मोह के बंधनों से अलग हैं। कंस उनका संबंधी था और महाभारत के समय कौरवपांडव, दोनों निकट के रिश्ते के, लेकिन कृष्ण यह जानते हैं कि धर्म की रक्षा करने के लिए संबंधों के जाल में फंसने की जगह कर्तव्य की पुकार सुनना आवश्यक है।

अगर इसी तथ्य को अपने जीवन में उतारना हो तो संदेश स्पष्ट है — किसी भी गलत बात को स्वीकार न करें। भले ही वह बात, आदेश या नीति बड़ी से बड़ी ओर से क्यों न आई हो! दूसरा संदेश यह है कि अपने कर्तव्य के आड़े कितना ही निकट का व्यक्ति क्यों न हो — उसे राह का रोड़ा न बनने दें। यहां व्यक्ति का मतलब दूसरे का होना ही आवश्यक नहीं है। यदि अपने मन का अहंकार भी अच्छे काम में बाधा बन रहा हो तो उसका भी शमन किया जाना चाहिए।

अक्सर लोग कृष्ण के बारे में कहते हैं कि वे बहुत-सी पत्नियों के पति और एक बड़े कुटुंब के अगुआ थे। बहुधा यह बात आलोचना की तरह कही जाती है, लेकिन एक विशिष्ट अर्थ को ग्रहण नहीं किया जाता। कृष्ण का नेतृत्व, उनके अंदर निहित संतुलन की शक्ति को ही दरअसल रेखांकित किया जाना चाहिए। हम योगी, भोक्ता, नेता, सेनानी, विद्वान, चिंतक और निर्णायक होने के गुण अगर व्यक्तित्व में समाहित कर पाएं तो न सिर्फ संसार को जी सकेंगे, बल्कि जीवन के होने का मतलब भी बूझ सकेंगे। ऐसा होने पर ही जीवन का उद्देश्य निर्धारित होगा।


कृष्ण संपूर्णता का नाम हैं। कृष्ण मनुष्य हैं। देवता हैं। स्पष्ट हैं। रहस्य हैं। योगिराज हैं। गृहस्थ हैं। संत हैं। योद्धा हैं। चिंतक हैं। संन्यासी हैं। लिप्त हैं। निर्लिप्त हैं। शिशु हैं तो संकट में हैं। किशोर हैं तो युद्ध कर रहे हैं। युवा हैं तो महाभारत की दिशा तय कर रहे हैं।
 
 
 

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