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छोटी उम्र, बड़े कारनामे

सुमन परमार | Nov 18, 2012, 00:08AM IST
छोटी उम्र, बड़े कारनामे

हम सभी ख्वाहिश रखते हैं कि हमारे परिवार के बच्चे बड़े होकर कुछ खास बनें, लेकिन कुछ बच्चे बचपन में ही इतने 'बड़े हो जाते हैं कि बड़े-बड़े भी उनका मुकाबला न कर पाएं। विलक्षण प्रतिभा रखने वाले ऐसे ही नन्हें उस्तादों पर सुमन परमार की रिपोर्ट



होटल ताज, मुंबई में 4 साल का एक बच्चा अपनी टॉय ट्रेन में घूम-घूम कर कला जगत के दिग्गजों और पत्रकारों से गंभीर चर्चा कर रहा है। उन्हें बता रहा है कि फलां पेंटिंग में बादलों ने किस तरह आसमान को घेर लिया है। मन में सवाल उठना लाजिमी है कि यह बच्चा कला के बारे में इतना ज्ञान कहां से पा गया। बहरहाल, अब फर्ज कीजिए कि 7 साल की उम्र वाला बच्चा अपने से 1 साल बड़ी बच्ची की सर्जरी कर आपस में जुड़ी उसकी दो उंगलियों को सफलतापूर्वक अलग कर देता है। कहानी खत्म नहीं हुई। अगर आपसे कहा जाए कि 10 साल की एक बच्ची गणित के उन सवालों के  जवाब चुटकियों में देती है, जिनके आगे अच्छे-अच्छे पानी भरें, तो आप क्या कहेंगे? यह न कोई फिल्मी कहानी है और न ये बच्चे फिल्मी किरदार हैं। ये इसी दुनिया के हैं और इनकी काबिलियत जांची-परखी है। ऐसा लगता है कि इतनी कम उम्र में अलग-अलग तरह के कारनामों को अंजाम देते इन नौनिहालों पर ईश्वर ने विशेष अनुकंपा की है।



दरअसल, इन बच्चों का दिमाग अपनी उम्र से ज्यादा तेज चलता है। यह किसी एक या एक से अधिक क्षेत्र में बहुत आगे होते हैं। कोई बच्चा गणित में बहुत तेज होता है, तो कोई पियानो बहुत अच्छा बजाता है। ऐसे बच्चे असाधारण प्रतिभा से संपन्न होते हैं। उनकी मौलिकता उन्हें अपनी फील्ड का जीनियस बनाती है। अंग्रेजी में इनके लिए चाइल्ड प्रोडजी शब्द का प्रयोग किया जाता है। बोलचाल में हम इन्हें विरले कहते हैं।



मध्य प्रदेश के नीमच में रहने वाले 4 साल के शौर्य महनोत दुनिया के सबसे कम उम्र का एब्सट्रैक्ट पेंटर हैं। देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट और पेंटर आर के लक्ष्मण ने जब इस नन्हें उस्ताद के बारे में सुना, तो फौरन अपने घर आने का न्योता दिया। वे बच्चे की पेंटिंग से इस कदर प्रभावित हुए कि उसके साथ ही पेंटिंग बनाने लगे। जुलाई में इनकी साझा पेंटिंग प्रदर्शनी लगाई गई। छोटा पाब्लो नाम से चर्चित शौर्य भले बातचीत करने के लिए अभी बहुत छोटा हो, लेकिन उनका पेंटिंग ब्रश सारी कहानी कहता है। उनके पिता आदित्य महनोत कहते हैं, 'जब वह 3 साल का था, तो घर में रखे ब्रश और कलर से एक पेंटिंग बनाई। वह इतनी खूबसूरत थी कि हम सभी चौंक गए। उसे और पेंटिंग बनाने के लिए प्रेरित किया। उसकी पेंटिंग फेसबुक पर डाली, तो खूब वाहवाही मिली। इसके बाद ताज पैलेस के चैम्बर्स टेरेस में शौर्य की पहली प्रदर्शनी लगी।Ó चूहों की तस्वीर बनाकर वह खुश होते हैं, वहीं कभी किसी पेंटिंग के मनपसंद न बनने पर कहते हैं, 'यह कल वाली पेंटिंग से अच्छी नहीं बनी।Ó केन्द्रीय विद्यालय, नीमच में पहली क्लास में पढऩे वाले शौर्य को फोटोग्राफी करना, कार्टून देखना, चॉकलेट खाना और बादलों को कैनवस पर उतारना बहुत पसंद है।
बचपन में कमाल दिखाने वाले शौर्य अकेले नहीं हैं, लेकिन क्या अद्भुत प्रतिभा रखने वाले बच्चों की जिंदगी आम रह पाती है? सबसे युवा फिल्म डायरेक्टर के रूप में गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉड्र्स में नाम दर्ज कराने वाले किशन श्रीकांत की जिंदगी आम बच्चों जैसी ही है। 16 वर्षीय इस किशोर ने 9 साल की उम्र में फुटपाथ फिल्म का डायरेक्शन किया। जिसमें उन्होंने जैकी श्रॉफ और सौरभ शुक्ला जैसे दिग्गज कलाकारों को निर्देशित किया। सौरभ शुक्ला का कहना है, 'उसे देखकर हैरानी होती है, लेकिन उसके काम को लेकर कोई शक नहीं कर सकता। यह सब बेकार की बात है कि ऐसा करने से वह अपने बचपन को नहीं जी पा रहा। दरअसल, वह वही कर रहा है जो उसे पसंद है।Ó इस फिल्म ने 2006 में राष्ट्रीय पुरस्कार समेत कई सम्मान बटोरे। बंगलुरु के श्रीकांत को भले लोग सेलेब्रिटी मानें, लेकिन स्कूल में बदमाशी करने पर उन्हें भी बेंच पर खड़ा होना पड़ता है और देर से सोने पर मां की डांट पड़ती है। उनकी मां शैलजा श्रीकांत का कहना है, 'वह फिल्मों की वजह से स्कूल बंक करता है, फिर भी 93 फीसदी अंक लाता है।Ó ऐसा कैसे? श्रीकांत ने बताया, 'मैं जो भी पढ़ता हूं, उसे विजुअलाइज करता हूं, इसलिए चीजें आसानी से याद रहती हैं।Ó उनकी क्लासटीचर एम ए पद्मा कहती हंै, 'कोई भी प्रोजेक्ट वह बाकी बच्चों से ज्यादा अच्छी तरह करता है। पहले वह खुद को बाकी बच्चों से अलग मानता था, लेकिन अब ऐसा
नहीं है।Ó दोस्तों के लिए वह कोई सेलिब्रिटी नहीं हैं।



श्रीकांत को अपने दोस्तों के साथ घूमना, गोलगप्पे खाना बेहद पसंद है। महज 8 साल की उम्र में एडिटिंग सॉफ्टवेयर, कोरल ड्रॉ, एडोब फोटोशॉप सीख चुके श्रीकांत बढिय़ा एक्टर भी हैं।



छोटी-सी उम्र में बड़े मुकाम तक पहुंचे बच्चों को दिक्कत भी होती है। माता-पिता समेत समाज का दबाव कई बार मुश्किलें खड़ी कर देता है। साथ ही ऐसे जीनियस बच्चों के छोटे भाई-बहनों से भी इसी तरह की उम्मीद रहती है, जो सही नहीं है। इससे बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। जानी-मानी मनोवैज्ञानिक अरुणा बू्रटा का कहना है, 'मां-बाप बच्चे को खास होने का अहसाास दिलाते रहते हैं और यह उसकी आदत बन जाती है।



19 वर्षीय डॉ. अकृत जसवाल 7 बरस की उम्र से सर्जरी कर रहे हैं। उनका आईक्यू १४६ है, जो उनकी उम्र के बच्चों के लिए असंभव है। हिमाचल के छोटे से गांव में पैदा हुए अकृत बचपन में ही अस्पतालों में घूम-घूमकर डॉक्टरों से सवाल पूछा करते थे। अकृत दुनिया के सबसे युवा डॉक्टर हैं, पर अकृत जैसे विलक्षण बच्चों को बहुत बार उनके आसपास के लोग भी नहीं समझ पाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दीपक पेंटल का कहना है, 'बच्चा अगर 95-99 प्रतिशत नंबर लाता है तो हम चांैक जाते हैं। ऐसे बच्चों के साथ अधिक कुशल व्यवहार करने की जरूरत है। कुछ ऐसा ही कहना है बच्चों की शिक्षा पर काम करने वाले भोपाल की शिक्षाविद् अंजलि नरोहा का, 'हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति में ऐसे बच्चों को बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं। हमारी उम्मीदें उनसे बढ़ जाती हंै कि वह हर फील्ड में जीनियस हों। ऐसे में बहुत-से बच्चे हताश होते हैं। कभी-कभी मां-बाप भी बच्चे को समझ नहीं पाते।



ऐसे खास बच्चों के साथ शिक्षकों को भी खास मेहनत करनी पड़ती है। 13 वर्षीय मेंटल कैलकुलेटर प्रियांशी सोमानी  भी  ऐसे ही बच्चों में शामिल हैं। अजमेर के मेयो कॉलेज गल्र्स स्कूल में 9वीं की इस छात्रा की टीचर उमा वांचू का कहना है, 'उसके साथ थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, क्योंकि उसका दिमाग बहुत तेज चलता है।Ó  मेंटल स्क्वेयर रूट की वल्र्ड रिकॉर्ड होल्डर और मेंटल कैलकुलेशन 2010 की इस विजेता की मां अंजू सोमानी का कहना है, 'हर बच्चे में कुछ खास होता है। जरूरत है उसे पहचानने की। प्रियांशी की रुचि गणित में थी, सो हमने पूरी मदद दी।Ó उनके पिता सत्येन मानते हैं कि बच्चों को खास बनाना हमारे हाथों में है। उन्होंने कहा, 'बच्चे को नहीं पता होता कि वह आम है या खास। उसे इसका अहसास दिलाने वाले हम हैं।



दरअसल कभी-कभी हम इन्हें इतना महान बना देते हैं कि इन्हें अपने से अलग मानने लगते हैं। यहीं हमें समझने की जरूरत है कि हर बच्चा अपने आप में अलग होता है और सबके अंदर खास गुण होते हैं। इनमें वे गुण थोड़े ज्यादा हैं, पर हैं तो यह बच्चे ही।

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