उससे कई सवाल पूछने हैं
रेणु खंतवाल
| Jul 12, 2012, 12:40PM IST

आपकी नजर में अध्यात्म की शक्ति क्या है?
वही तो सब कुछ है। अध्यात्म के बारे में जानने के बाद आदमी अपने आपको, परिवार को, मोहल्ले के लोगों को अच्छी भावना से देखता है, अच्छा व्यवहार करता है। जो लोग आध्यात्मिक होते हैं, उन्हें पता है कि मानवता क्या होती है! अध्यात्म को जीवन में उतारने के बाद इंसान, इंसान की कद्र करने लगता है, चाहे वह, गरीब हो या अमीर।
कभी ऐसा लगा कि आपकी ज़िन्दगी का खास उद्देश्य है?
लगा कि संगीत के क्षेत्र में कुछ करता रहूं। संगीत ही मेरा वर्तमान है और भविष्य भी। संगीत जीवन है। मुझे संगीत के क्षेत्र में ही साधना करनी है। अगले जन्म में इंसान बनने का मौका मिले तो संगीत के क्षेत्र में ही रहना चाहूंगा।
पुनर्जन्म में यकीन करते हैं?
हां, क्यों नहीं! इंसान पैदा होता है, मरता है और फिर पैदा होता है। अगर मरने के बाद कोई पैदा ही न होता तो इतनी जनसंया कैसे होती!
कभी भगवान के दर्शन हो जाएं तो क्या सवाल पूछेंगे?
सबसे पहले तो यह पूछूंगा कि आप कहां रहते हैं? कैसे रहते हैं और क्यों रहते हैं? आप यह सब कैसे देखते हैं कि एक आदमी, दूसरे आदमी को मार रहा है। नईनवेली दुल्हन को दहेज के लिए मार दिया जाता है। लड़कियों को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है, तब आप कहां होते हैं? और यदि आप हैं तो मुझसे क्यों नहीं मिलते? छिपते क्यों हैं, सामने आते क्यों नहीं? मुझे आपकी बहुत जरूरत है। मुझे आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं, कई सवाल पूछने हैं।
सच्ची खुशी के क्या मायने हैं?
सच्ची खुशी वह होती है, जब इंसान के सपने सच होते हैं। ऐसे पल ज़िन्दगी में बहुत आनंद देते हैं। सच्ची खुशी तब भी महसूस होती है, जब पूरा परिवार साथ बैठा होता है। उस समय इंसान बाकी सब कुछ भूल जाता है, बस परिवार के साथ रम जाता है।
सुकून कब महसूस करते हैं?
जब बांसुरी हाथ में लेता हूं। पहले पांच मिनट नर्वस रहता हूं। पांच मिनट बाद मैं कहां हूं, क्या कर रहा हूं, कौन मुझे सुन रहा है, कौन देख रहा है, मैं किसे देख रहा हूं — कुछ पता नहीं रहता। आंखें बंद हो जाती हैं और बस एक नशा बचा रहता है। एक बात मैंने महसूस की है कि मेरे और श्रोताओं के बीच में कोई न कोई होता है। कोई सुपर पावर — वे कृष्ण हो सकते हैं या अजरुन भी। कोई न कोई शक्ति जरूर रहती है।
इस बीच शक्ति की भूमिका क्या रहती है?
वह वॉच करती है कि मुझमें कितनी भक्ति है, कितना लगाव है? ठीक उसी प्रकार, जैसे एक गुरु बैठकर शिष्य को देखता है। वह श्रोताओं को भी देखता रहता है। जब मुझे यह महसूस होता है कि शक्ति को अच्छा लगा, वह खुश हुई, तब लगता है कि सब ठीक है और तसल्ली मिल जाती है।
जीवन को किस तरह परिभाषित करेंगे?
मेरी ज़िन्दगी इतनी ज्यादा खूबसूरत रही है कि शायद ही किसी की रही हो। हमें हमारे परिवार की तरफ से भी पूरी छूट मिली। हमारे विद्यार्थी, गुरुमां सभी ने हमें आजाद छोड़ दिया। मैंने कभी किसी तरफ से कोई परेशानी महसूस नहीं की। यह कृपा भगवान की तरफ से भी रही। मैंने जो चाहा, वह मिला। जो चाह रहा हूं, वह मिल रहा है।
जब भी दुविधा की स्थिति में होते हैं तो किस की बात सुनते हैं?
गुरु मां के सिवाय किसी की बात नहीं सुनता। अब भी वे मुझे डांटती हैं, खूब चिल्लाती भी हैं। कहती हैं, ‘क्यों घूमता रहता है, कभी इधर, कभी उधर। क्या करेगा पैसा कमाकर? दो रोटी ही तो खाएगा!’ इतना प्यार करती हैं वह मुझसे। और कौन कर सकता है मुझसे ऐसी बातें, मां के सिवाय।
कभी पीछे मुड़कर देखा है?
पीछे देखना बहुत गलत होता है। इसे मैं सही नहीं मानता। हमेशा आगे देखना चाहिए। पीछे मुड़कर देखोगे तो पीछे ही रह जाओगे। पीछे देखकर मिलेगा भी क्या? अगर कुछ देख लिया तो उससे दुख ही होगा। सामने देखकर चलना चाहिए कि अब आगे कहां, किस ओर जाना है! पीछे देखते हुए आगे चलेंगे तो गिरने का डर लगा रहता है।
पद्म भूषण पं. हरि प्रसाद चौरसिया प्रसिद्ध बांसुरी वादक हैं। उन्होंने पं. शिव कुमार शर्मा के साथ कई फिल्मों में संगीत भी दिया है।
मुलाकात : रेणु खंतवाल








