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निर्धन कौन

अशोक प्रजापति | Jul 20, 2012, 09:25AM IST
 
 

एक बार एक जंगल में एक यात्री जा रहा था। रास्ते में उसे एक सोने का सिक्का मिला। वह सोचने लगा कि ‘ये सिक्का मेरा तो है ही नहीं, इसे क्या करूं लेकर? ..जाने किस बेचारे का ये सिक्का यहां गिर गया है। अब न तो इसे रख ही सकता हूं और न ही फेंक सकता हूं, आखिर सोना जो है।’

यही सब सोचता हुआ वो यात्री आगे बढ़ा चला जा रहा था। रास्ते में माला जपते हुए एक साधु महाराज उसे मिले। उसने सोचा ‘क्यों न इस सिक्के को साधु को ही दे दिया जाए।’

यात्री ने जब वह सिक्का साधु को दिया तो सोने के सिक्के को देखकर साधु ने आश्चर्य से कहा- ‘भाई! यह सिक्का हमारे जैसे साधुओं के लिए नहीं है। इसे तो किसी गरीब को दे दो ताकि वह अपना पेट भर सके।’

साधु की बात बात मानकर यात्री आगे चला तो उसने देखा कि किसी राजा की सेना चला जा रही है। इतनी बड़ी सेना को देखकर वह सोचने लगा कि Êारूर कोई बात रही होगी, जो राजा अपनी सेना को लिए जा रहा है। उसने एक सैनिक से पूछा कि- ‘भाई! यह राजा इतनी बड़ी सेना को कहां लिए जा रहा है?’

‘यह राजा डोंगर सिंह हैं, जो पड़ोसी देश पर आक्रमण करके उसे लूटने जा रहे हैं।’ उसने जवाब दिया।

यात्री राजा के रथ के करीब जा पहुंचा और सोने का सिक्का उसकी ओर बढ़ाया हुए कहा- ‘लीजिए महाराज! आप इसे रख लीजिए।’

‘ऐसा क्यों?’

‘महाराज! एक साधु ने कहा था कि जो सबसे Êयादा गरीब दिखे उसे ये सिक्का दे देना।’ ‘मैं राजा हूं, राजा। मैं तुझे गरीब लगता हूं?’‘महाराज! यदि आप अमीर होते तो दूसरे देश को लूटने के लिए इतनी बड़ी सेना लेकर क्यों जाते?’

यात्री की बात राजा के समझ में आई तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। यात्री को धन्यवाद देते हुए उसने सेना को वापस लौटने का आदेश दिया।
 
 
 

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