सामने आया खिलाडियों की उपेक्षा का दर्द, बजट में टूर्नामेंट को मिले बढ़ावा

नागपुर. कुछ खेलों पर सरकार पानी की तरह पैसा बहाती है, लेकिन कुछ ऐसे भी खेल हैं जिन पर सरकार ध्यान नहीं देती। खेल बजट को अंतिम प्राथमिकता दी जाती है, खिलाडिय़ों की जनसंख्या के आधार पर बजट में प्रावधान नहीं है।
शुक्रवार को दैनिक भास्कर कार्यालय में खेल बजट को लेकर खेल संगठनों की उम्मीद व समस्याओं पर चर्चा की गई। चर्चा के दौरान खेल क्षेत्रों के जानकारों ने टूर्नामेंट के माध्यम से खिलाडिय़ों को प्रोत्साहन देने व खेल सामग्रियों से कर को कम करने की मांग की।
बड़ी समस्या
विदेश में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाडिय़ों के लिए सरकार निधि उपलब्ध नहीं कराती है। इनके लिए निधि मांगे जाने पर 'नो फंड' लिखकर पेपर लौटा दिया जाता है। ऐसे में खिलाड़ी का पूरा खर्च परिवार वाले व खेल संस्थानों को ही उठाना पड़ता है।
सरकार की ओर से खिलाडिय़ों के लिए विशेष निधि देने की सार्वजनिक तौर पर घोषणा तो होती है, लेकिन वित्त मंत्रालय से उसे जारी नहीं किया जाता है, इससे खिलाडिय़ों का मनोबल कम होता है।
यहां तो राष्टï्रीय व अंतरराष्टï्रीय स्तर के खिलाडिय़ों को नेता बड़ी राशि से पुरस्कृत करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर जाकर खिलाडिय़ों के उत्थान के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।
योजनाएं नहीं
मिनिस्ट्री ऑफ यूथ अफेयर्स एंड स्पोटर्स के तहत खिलाडिय़ों के लिए 33 योजनाएं बनाई गई, जिसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। ग्वालियर की एलएनयूपीई ने अब तक भारत के खिलाडिय़ों के खान-पान को गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए अंतिम रिपोर्ट नहीं दी है। केंद्र सरकार को खेल के लिए बजट बढ़ाना चाहिए, ताकि राज्य व स्थानीय सरकारें भी इसमें बढ़ोतरी कर सकें।
भारत में क्षेत्र विशेष के लिए खेल की कोई योजनाएं नहीं बनाई गई हैं। जिस कारण खेलों का विकास नहीं हो पा रहा है। अगर कोई टीम जिला या राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होती है, तो उनके रहने व खाने का इंतजाम ठीक से नहीं हो पाता है, इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।






