विवाद के बाद पुणे के 'महल' में नहीं रहेंगी राष्ट्रपति

मुंबई. अपने रिटायरमेंट के बाद राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील पुणे में बन रहे आवास में नहीं रहेंगी। सेना की जमीन पर बन रहे आवास पर विवाद और लगातार आ रही ‘गलत’ खबरों से आहत राष्ट्रपति ने इस मामले को शांत करने के लिए पुणे में रहने का फैसला ही टाल दिया है।
शुक्रवार को राष्ट्रपति कार्यालय से जारी बयान के अनुसार, नए फैसले से पूरे मामले को शांत करने में मदद मिलेगी। राष्ट्रपति के इस नए आवास को युद्ध में शहीद हुए जवानों की विधवाओं को मिलने वाले घरों से भी जोड़ा गया था।
बयान के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों से प्रस्तावित आवास पर हो रहे बवाल से राष्ट्रपति काफी आहत हुई हैं। संवैधानिक पद पर रहने की वजह से राष्ट्रपति ने इस बेवजह उठाए गए मामले में कुछ नहीं कहने का फैसला किया था।
लेकिन राष्ट्रपति सचिवालय से आधिकारिक सफाई आने के बावजूद मामला उछलता रहा है। यही वजह है कि राष्ट्रपति ने रिटायरमेंटट के बाद नए घर में नहीं जाने की इच्छा जताई है। राष्ट्रपति ने उम्मीद जताई है कि ‘इस फैसले के बाद मामला शांत हो जाएगा।’ हालांकि बयान में जुलाई में रिटायर होने वाली राष्ट्रपति के नए आवास का कोई जिक्र नहीं किया गया है।
हाल में पुणे के रहने वाले रिटायर्ड कर्नल सुरेश पाटील ने अपनी स्वयंसेवी संस्था की ओर से बयान में कहा था कि सरकार राष्ट्रपति को रिटायरमेंट के बाद शहर में 2.6 लाख स्क्वेयर फीट की जमीन दे रही है।
उन्होंने दावा किया था कि ब्रिटिशकाल के दो बंगलों को तोड़कर राष्ट्रपति के लिए 4,500 स्क्वेयर फीट में भवन का निर्माण किया जा रहा है। हालांकि राष्ट्रपति कार्यालय ने इन सभी आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि नए निवास का निर्माण नियमों के तहत हो रहा है।
इससे पहले भी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के कार्यकाल में कई विवाद उठते रहे हैं। मसलन, उनके विदेश दौरों पर सवाल उठाए गए। अखबारों में दो साल पहले गोवा के तट पर स्विम-सूट में घूम रहे महिलाओं के बीच उनकी तस्वीर पर भी खूब विवाद हुआ था।
राष्ट्रपति ने किया दैनिक भास्कर का खास जिक्र
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने युद्ध में शहीद हुए जवानों की विधवाओं के साथ अपनी संवेदनशीलता और नजदीकी जताने के लिए दैनिक भास्कर का खास जिक्र किया है।
9 मार्च, 2005 को दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में छपे लेख का जिक्र करते हुए कहा है कि सेना ने अपने मुख्यालय के लिए शहीदों की विधवाओं के होस्टल व पुनर्वास केंद्र को लेने का फैसला किया था।
राजस्थान में राज्यपाल के रूप में उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया था। राज्यपाल के रूप में उन्होंने यह मामला तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समक्ष भी उठाया।
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