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बिखर गया श्वेतक्रांति का सपना, आठ साल में ही खत्म हुआ सबकुछ!

हेमंत डोर्लीकर | Dec 12, 2012, 06:34AM IST
 
 


गड़चिरोली. जिले के आदिवासी पिछड़े किसानों का जीवनस्तर ऊंचा उठाने के लिए विदर्भ विकास पैकेज के माध्यम से वर्ष 2004 में .संजोया गया श्वेतक्रांति का सपना 8 वर्ष बाद टूटता नजर आ रहा है।   

 

किसान व सरकार की समान हिस्सेदारी में संकरित गाय देकर दूध उत्पादन बढ़ाकर किसानों की आर्थिक उन्नति का प्रयास जनप्रतिनिधि, सरकार, प्रशासन व स्वयं किसानों की उदासीनता के चलते धरा का धरा रह गया।


वर्ष 2004 में राज्य सरकार के पशुसंवर्धन व दुग्ध विकास मंत्रालय ने विदर्भ में दूध की किल्लत को देखते हुए दूध उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर, गड़चिरोली, नागपुर, वर्धा समेत पश्चिम विदर्भ में विदर्भ विकास पैकेज घोषित किया।

 

इसमें गड़चिरोली जिले के 2500 से अधिक किसानों को आधी कीमत में अधिक दूध देनेवाली संकरित गाय देने का ऐलान किया था। तब गाय की अधिकतम कीमत 14000 रुपए आंकी गई थी। जिसका आधा यानी 7000 रुपए दुग्ध विकास विभाग किसानों को देनेवाला था।

 

2004 में आरंभ की गई इस योजना में 2012 बीत जाने के बाद भी शतप्रतिशत गाय वितरण का लक्ष्य पूर्ण नहीं हो पाया है। सबसे बड़ा कारण है नागरिकों की उदासीनता।  भंडारा व नागपुर से 85 हजार लीटर दूध प्रमुखता से गड़चिरोली, वड़सा, चामोर्शी, आष्टी, आलापल्ली, अहेरी में आता है। 1 लाख 85 हजार लीटर दूध की पूरी तरह से किल्लत है।

 

जिसके कारण जिले की आधे से अधिक जनसंख्या दूध से वंचित है। जिले के दुग्ध विकास विभाग में पिछले कई वर्षों से दुग्ध विकास अधिकारी ही नहीं है। जिले के गड़चिरोली का पारडी व अहेरी का आलापल्ली दुध शीतकरण केंद्र बंद है। सहकारी दूध उत्पादक संस्थाओं की हालत खस्ता है।


117 संस्थाओं में से 62 का पंजीयन रद्द हुआ है। बची 55 संस्थाएं जैसे- तैसे शुरू हैं। इनमें 40 बंद होने की कगार पर है तो 15 में से 9 संस्थाएं ऑक्सीजन पर है वहीं केवल 6 संस्थाओं के माध्यम से 300 से 350 लीटर दूध का संकलन हो रहा है। 

 

जिला पशुसंवर्धन आयुक्तालय के आंकड़े बताते हैं कि जिले के 14620 शहरी व 1,40,605 ग्रामीण ऐसे कुल 1,55,225 परिवारों में 7 लाख 18 हजार 9 पशुधन  हैं। इनकी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए 144 चिकित्सालय बनाए गए हैं। लेकिन डाक्टरों के अभाव में अधिकतम अस्पताल बंद हैं।  19 वीं पशुगणना में  20 प्रतिशत पशुधन कम होने के संकेत मिल रहे हैं।


वर्ष 2008 -09 में कनेरी व आरमोरी में 50-50 लाख की निधि से दो सहकारी दुग्ध उत्पादन संस्थाएं आरंभ हुई। जिनका प्रत्यक्ष कार्य जनवरी 12 में आरंभ हुआ व 6 माह के भीतर ही ये संस्थाएं बंद पड़ गई। अ जिले के समुचित दुधारू पशुधन से 25 हजार से अधिक दूध उत्पादन नहीं हो रहा है।  यही कारण है कि श्वेतक्रांति का सपना टूट गया है। 

 

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