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आयकर विभाग ने शुरू की जांच, गडकरी की मुश्किलें बढ़ीं

Bhaskar News | Oct 26, 2012, 02:57AM IST
 
 


मुंबई. भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की कंपनी पूर्ति पावर एंड शुगर लि. (पीपीएसएल) खिलाफ के जांच शुरू हो चुकी है।


 


कंपनी मामलों के मंत्रालय के बाद आयकर विभाग ने भी कंपनी को मिले पैसे और उनके स्रोत की पड़ताल शुरू कर दी है। पूछताछ के लिए गडकरी को भी बुलाया जा सकता है।


 


आयकर विभाग के एक अधिकारी ने गुरुवार को बताया कि जांच के लिए विभाग की मुंबई और पुणे विंग को लगाया गया है। पीपीएसएल में पैसा लगाने वाली 18 कंपनियों के कागजात खंगाले जा रहे हैं। शुरुआती जांच में पता चला है कि पैसे के लिए बंद पड़ी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया।


 



जांच रिपोर्ट एक माह में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (सीबीडीटी) को सौंप दी जाएगी। मंगलवार को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी को गडकरी पर लगे आरोपों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है। कंपनी मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली ने इसकी जानकारी दी थी।


 



पूछताछ के लिए पैसा लगाने वाली कंपनियों से जुड़े लोगों को बुलाया गया है। जरूरत पडऩे पर नितिन गडकरी को भी बुलाया जाएगा। मीडिया में आई खबर के मुताबिक पूर्ति ग्रुप को आइडियल रोड बिल्डर्स (आईआरबी) ने 164 करोड़ रुपए का कर्ज दिया था। आईआरबी के पास पीपीएसएल का सबसे अधिक शेयर भी है।


 



आरोप है कि 1995 से 1999 के बीच जब गडकरी महाराष्ट्र के पीडब्ल्यूडी मंत्री थे आईआरबी ने सबसे अधिक ठेके पाए। पीपीएसएल में निवेश करने वाली कंपनियों में से कई के डायरेक्टर गडकरी के ड्राइवर, मुनीम, ज्योतिषी, बेकरी कर्मचारी आदि थे। कंपनियों के पते भी फर्जी पाए गए हैं।


 


 


इधर कृपाशंकर भी फंसे
 
 
बांबे हाईकोर्ट ने मानवाधिकार आयोग को मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह पर पुलिस के साथ सांठगांठ करके एक सामाजिक कार्यकर्ता को प्रताड़ित करने व उसकी 100 करोड़ रुपए की संपत्ति हथियाने के आरोपों की जांच करने को कहा है। 
 
 
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बांद्रा कोर्ट के मुख्य महानगरीय दंडाधिकारी को इस पूरे मामले की जांच कर दो सप्ताह में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।  न्यायमूर्ति वीएम कानडे व न्यायमूर्ति प्रमोद कोदे की खंडपीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता तुलसीदास नायर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया। 
 
 
राज्य के कई मंत्री भी उलझे हैं बोगस कंपनियों के गोरखधंधे में 
 
 
 
बोगस कंपनियां बनाकर काले धन को सफेद करने के गोरखधंधे में प्रदेश के कई दिग्गज मंत्री व सभी प्रमुख पार्टियों के नेता शामिल हैं। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार अगर इस मामले की गहराई से जांच की गई तो कई हजार करोड़ के कालेधन का पता चल सकेगा। पूर्ति समूह में बोगस कंपनियों के निवेश के आरोप में भाजपा अध्यक्ष नितीन गडकरी फिलहाल विवाद में हैं।
 
 
 
अब तक की जांच से यह बात सामने आई है कि मुंबई की झूठे पतों वाली कंपनियों ने पूर्ति में निवेश किया और इन कंपनियों में पूर्ति समूह के ड्राइवर व कर्मचारी भी शामिल हैं। सबसे पहले शेकाप के नेता जयंत पाटील ने जल संसाधन मंत्री सुनील तटकरे पर सैकड़ों बोगस कंपनियां बनाकर रायगढ़ जिले में जमीन खरीदने के आरोप लगाए थे।
 
 
बाद में इसी मुद्दे को भाजपा के किरीट सोमैया ने भी उठाया और उन्होंने तटकरे के साथ सार्वजनिक निर्माण मंत्री छगन भुजबल की शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो से कर डाली। बाद में किरीट ने केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों को भी इसकी जांच करने को कहा। मुंबई हाईकोर्ट में भी इससे जुड़ा मामला  दायर किया गया है। 
 
 
वित्त क्षेत्र के सूत्रों के अनुसार बोगस कंपनियों के गोरखधंधे में राष्ट्रवादी, कांग्रेस, शिवसेना व भाजपा के नेता बड़े पैमाने पर शामिल हैं। राज्य के कई वरिष्ठ मंत्री भी इस काम में शामिल हैं। इन कंपनियों के जरिए ये मंत्री अपने कारोबार में पैसा लगाते हैं। 
 
 
वैसे बोगस कंपनियों का उपयोग क ोयले के कारोबार में धड़ल्ले से होता रहा पर बाद में नेताओं ने भ्रष्टाचार से हासिल किए धन को सुरक्षित करने के लिए इस रास्ते को अपनाया।
 
 
एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बोगस क ंपनियों का यह धंधा काले धन को सफेद करने के लिए ही किया जाता है। इसका अघोषित मुख्यालय कोलकता है। इसके बाद हैदराबाद व मुंबई का नंबर आता है।
 
 
व्यापारियों के अलावा अक्सर नेताओं को इसकी जरूरत पड़ती है। भ्रष्टाचार की रकम को ठिकाने लगाने के लिए नेताओं को सीए की सलाह की जरूरत पड़ती है। तब सभी को बोगस कंपनी बनाकर पैसा सफेद करने का यह रास्ता बताया जाता है। तटकरे पर आरोप है कि उन्होंने सैकड़ों कंपनियां बनाकर जमीन खरीदी।
 
 
एक वित्त विशेषज्ञ ने भास्कर को बताया कि 1995 से पहले महाराष्ट्र में कांग्रेस के कई नेता बोगस कंपनी के जरिए कालेधन को सफेद करते थे।
 
 
फिर जब शिवसेना व भाजपा गठबंधन सत्ता में आया तो कांग्रेस के ही नेताओं से मार्गदर्शन लेकर उन्होंने यह तरीका अपनाया। शिवसेना के कुछ दिग्गज नेताओं ने तो कांग्रेसी नेताओं के सीए की सेवाएं लेकर यह काम किया। हर बोगस कंपनी निवेश के आंकड़े के आधार पर नेताओं को बेच दी जाती है। 
 
 
जानकार सीए बताते हैं कि इस गोरखधंधे में अक्सर तीन-चार कंपनियों की श्रंंखला होती है जिसके जरिए पैसा सफेद किया जाता है।  मान लीजिए अगर नागपुर की कंपनी में एक करोड़ का निवेश लाना है तो मुंबई की किसी कंपनी के शेयर प्रीमियम में खरीदे जाते हैं।
 
 
 
दस रुपए के शेयर सौ रुपए में खरीदे जाते हैं। इसके पीछे रायपुर या कोलकाता की एक कंपनी होती है जो बोगस होती है। फिर दो साल बाद शेयर वापस कम दाम में दे दिए जाते हैं। 
 
 
पहले यह गोरखधंधा करना आसान होता था लेकिन पांच छह साल पहले रजिस्ट्रार आफ कंपनीज में दर्ज सभी कंपनियों का ब्योरा इंटरनेट पर उपलब्ध होने के बाद जानकारी हासिल करना आसान हो गया है।
 
 
इस साल के बजट में इस तरीके से कंपनी बनाने पर रोक लग गई है। साफ है कि अगर दो लाख करोड़ के कर्ज में डूबी महाराष्ट्र सरकार के मंत्रियों व नेताओं के कारोबार की गहराई से पड़ताल की जाए तो कई हजार करोड़ के कालेधन का पर्दाफाश हो सकेगा।
 
 
 

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