पर्यटकों का लुभा रहा खेकरानाला बांध परिसर

सावनेर। यहां से 30 किमी की दूर स्थित खेकरानाला बांध परिसर पर्यटकों के लिये आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। प्रकृति की गोद में बसे इस बांध से तहसील की 3,810 हेक्टर जमीन की सिंचाई हो रही है। वहीं बांध के बाजू का परिसर व हरी घनी पहाड़ियों ने क्षेत्र की सुंदरता को चार चांद लगा दिये हैं।
1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शरदचंद्र पवार के हाथों उद्घाटित यह बांध राजेगांव ग्राम व सोनपुर, बिचवा, सिरोंजी के थोड़े हिस्से को पुनर्वसित कर बनाया गया था। बांध की मुख्य दीवार मिट्टी की हैं। जहां 26.134 दलघमी पानी संग्रहित करने की क्षमता हैं।
बांध की कुल लंबाई 300 मीटर है व ऊंचाई 22.5 मीटर है। सिंचाई के लिये एक गेट व पानी की निकासी के लिये 12.65 मीटर के चार मोटर चलित गेट हैं। इस बांध से बडेगांव, कोच्छी, बावनगांव, रामडोंगरी, हिंगना, खुबाला, खैरी, ढ़कारा, कोथुलना, किरणापुर, वाघोली, चिचोली, नीमतलाई, टेंभूरडोह, उमरी व सावली आदि महत्वपूर्ण ग्रामों की खेती को सिंचित किया जाता है।
अवकाश के दिन उठाते हैं प्रकृति का लुत्फ
क्षेत्र के तत्कालीन विधायक रणजीत देशमुख ने सरकार को अनुरोध कर बांध निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह क्षेत्र पहाड़ियों के बीच घिरा होने व बांध में हमेशा पर्याप्त पानी होने से यह क्षेत्र काफी मनमोहक है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा नागपुर व अन्य जगह से भी सालभर पर्यटकों का यहां आना लगा रहता है। यहां पर सिंचाई विभाग व एमटीडीसी के रेस्ट हाऊस हैं। जिसमें भोजन की भी सुविधा है। अवकाश के दिनों में यहां पर परिवार आकर प्रकृति का लुत्फ उठाते हैं।
कुछ वर्षो से यहां प्रेमी युगलों की चहल-पहल ज्यादा दिखाई दे रही है, जो यहां के सिंचाई विभाग के लिये सिरदर्द बनी हुई है, लेकिन बांध के बाजू में ही वन विभाग का जंगल होने से वह इन्हें रोक नहीं पाते। विभाग की मनाही के बावजूद यहां युवा वर्ग के जोखिम भरे कारनामें हमेशा शुरू रहते है जिससे कई बार पर्यटकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।
उदासीनता से बन रहा प्रेमालाप स्थल
इस क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र में तब्दील करने में प्रशासन काफी उदासीन दिखाई दे रहा है। इस क्षेत्र पर कुदरत की काफी मेहरनजर है। यहा थोड़ा विकास करने पर यह जिले का सर्वोत्कृष्ट पर्यटनस्थल बन सकता है, लेकिन प्रशासन के उदासीन रवैये के कारण क्षेत्र में कोई विकास नहीं हो रहा है। प्रशासन की उदासीनता का ही नतीजा है कि आज यह क्षेत्र केवल युवाओं के प्रेमालाप करने की जगह बनकर रह गई है।
रास्ता खराब, बिजली गुल
सरकार भी इस बांध के प्रति उदासीन दिखाई देती है। बडेगांव तक तो रास्ता ठीक है, लेकिन उससे आगे का रास्ता ज्यादा खराब होने से यहां से गुजरना टेढ़ी खीर है। खराब रास्ते की सबसे ज्यादा तकलीफ यहां के कर्मचारियों को बारिश के दिनों मे उठानी पड़ती है। रात में बांध का जलस्तर बढ़ जाने पर या आपात स्थिति में कर्मचारियों को बड़ी मशक्कत कर बांध तक पहुंचना पड़ता है। बांध के गेट को क्रियान्वित करने के लिए मराविमं व्दारा यहां पहुंचाई गयी बिजली हमेशा गुल रहती है। इसलिये यहां जनरेटर की व्यवस्था की गयी है।






