कहावत नहीं हकीकत, इतवारी रेलवे स्टेशन पर सरेआम दिखता है ये नजारा

नागपुर। पूरा काम, अधूरा दाम। कहावत नहीं एक हकीकत है, जिसे इतवारी रेलवे स्टेशन पर सरेआम देखा जा सकता है।
मालक व अधिकारियों की सांठगांठ से मथाड़ी मजदूरों के हजारों का हक रोज हजम हो रहा है। पर मजबूरी है, इन्हें काम करने के बाद भी अधूरी रोजी लेकर चुप बैठना पड़ रहा है।
अगर मान लें कि एक माथाड़ी मजदूर 50 बोरियां ढो रहा है, तो उसे वास्तव में 25 बोरियों को ढोने का ही दाम मिलता है। ऊपर से परिसर में बुनियादी सुविधा तक नसीब नहीं।
इन दिनों यहां मजदूरों द्वारा सीमेंट की बोरियां ढोने का काम चल रहा है। कुछ मजदूरों ने बताया कि उन्हें एक बोरी के पीछे 3 रूपए मजदूरी दी जाती है। हालांकि सीमेंट कंपनियों के ठेकेदारों का कहाना है, कि वह हर मजदूरों के पीछे 6 रुपए देते हैं। मजदूरों को आधी मजदूरी, संबंधित संघ को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है।
18 हजार होते है, रोज हजम : इतवारी स्टेशन पर काम करनेवाले मथाडी मजदूरों की रोज 18 हजार की रोजी हजम हो जाती है। परिसर में 120 मजदूर काम करते हैं। प्रति मजदूर यदि 50 बोरियां रोज ढोता है तो उसे 3 सौ रुपए मिलने चाहिए। लेकिन मिलते सिर्फ 150 रुपए हैं।
रोजी-रोटी भी किस्मत के भरोसे : रैक से लोडिंग व अनलोडिंग करने का काम करनेवाले इन माथाडी संघ के मजदूरों को अधूरी मजदूरी भी किस्मत के भरोसे होती है। जिस दिन काम मिला उस दिन रोजी वरना खाली हाथ घर लौटना पड़ता है।
एक मजदूर ने बताया कि 20-20 दिनों तक काम नहीं मिलता है। जब रैक आती है, तो 12-12 घंटे काम करना पड़ता है। लेकिन रैक न आने पर कई दिनों तक रोजी भी नसीब नहीं होती है। ऐसे में परिवार का उदरनिर्वाह मुश्किल हो जाता है।
सु्विधाओं को तरस रहे मजदूर : गुड शेड में काम करनेवाले 120 मजदूरों को अधूरी रोजी मिलने के साथ बुनियादी सुविधा से भी वंचित रहना पड़ रहा है। परिवार पालने की जिम्मेदारी विपरीत परिस्थिति में भी काम करने के लिए मजबूर कर रही है।
ये मजदूर रेल प्रशासन की ओर से काम नहीं करते हैं, लेकिन काम रेलवे के परिसर में करने से बुनियादी सुविधा उपलब्ध करने की जिम्मेदारी रेल प्रशासन की बनती है।
टंकी की नहीं होती सफाई : परिसर में मजदूरों को पानी पीने के लिए टंकी से जोडे नल की व्यवस्था कराई है। लेकिन इस टंकी को गत कई महिनों से साफ नहीं किया है। नल के इर्द-गिर्द गंदगी फैली है। फर्श चिकनाहटभरी होने से कोई पानी पीने जाता है तो फिसलकर गिरने की आशंका बनी रहती है।
शौचालय भी नहीं : यहां काम करनेवाले मजदूरों के काम का समय निश्चित नहीं है, जब ज्यादा काम रहा तो मजदूर 12 घंटों से ज्यादा समय परिसर में मौजूद रहते हैं।
ऐसे में बुनियादी सुविधा के नाम पर परिसर में शौचालय की व्यवस्था जरूर रहनी चाहिए। लेकिन यह व्यवस्था नहीं रहने से मजदूरों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। खुले में लघुशंका करने से परिसर में गंदगी बढ़ रही है।
शेड की नहीं व्यवस्था : गुड शेड में जब भी काम रहेगा मजदूरों की उपस्थिति रहेगी। इस बात को संबंधित प्रशासन भलीभांति जानता है। बावजूद इसके मजदूरों की सुविधा के लिए कोई खास इंतजाम नहीं।
शेड व रैक के बीच में करीब दस से पंद्रह मीटर की दूरी है। ऐसे में रैक से सामान शेड में लाने के बीच दस मीटर तक मजदूरों को खुले आसमान में आना पड़ता है। बारिश हो या कड़ी धूप, मजदूरों को काम के समय सब कुछ सहना पड़ता है।
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