अगर आपको है ऐसी परेशानी, तो समझें जिंदगी का दायरा सिमट रहा है!

नागपुर। हर सुबह उपराजधानी के कई चौक मजदूर चौक के रूप में तब्दील हो जाते हैं। कतार में खड़े पुरुष-स्त्री मजदूर संभावित काम पाने के लिए लपक पड़ते हैं। यह उनकी दिनचर्या का अंग है, लेकिन एक और भी महत्वपूर्ण काम वे पहले से कर चुके होते हैं।
खुराक के अनुसार, वे अपने पास गुटखे, बीड़ी आदि तलब के सामान रख लेते हैं। मानेवाड़ा उप डाकघर, सक्करदरा पुलिया के आस-पास, महल स्थित महाकल्याणोश्वर मंदिर के समीप पान-टपरियां सुबह ही खुल जाती हैं।
उनका धंधा बेहद चोखा है। देर रात थोक में खरीदी, सुबह खुदरा में बिक्री। बताने वाले तो यहां तक बता रहे हैं कि ये थोक में गुटखा खरीदने नहीं जाते, बल्कि बेचने वाले खुद देर रात पहुंच जाते हैं।
इनसे बातें की गईं तो तलब के अलग-अलग रूप दिखाई पड़े। किसी ने कहा कि खाए बगैर काम जमता ही नहीं, तो किसी ने कहा कि बगैर खाए दिन बेकार हो जाता है। क्यों? इसका पता नहीं।
जबकि होता उल्टा है। इसके अत्यधिक सेवन से पाचन तंत्र प्रभावित हो जाता है। मगर अति निर्धन श्रेणी के इन लोगों को यह वरदान लगता है, क्योंकि इसके सेवन से उनकी भूख घट जाती है।
यहां खड़ी महिलाओं ने बेबाक कहा कि मरना होता तो कब के मर गए होते। यह तो हमारी आदत में कब से शामिल है, खुद हमें भी पता नहीं। तकरीबन 24 से 34 वर्ष की महिलाओं के मुंह से यह सुनकर ही रोंगटे खड़े हो गए कि घर में अगर पति पी कर आता है तो हमारे गुटखे के सेवन में क्या बुराई है?
पति और पत्नी दोनों ही कमाने निकलते। दोनों ही कमाई में से प्रतिदिन 6 से 8 पाऊच अपने खर्चे के हिस्से में जोड़ लेते हैं। पुरुष और महिला दोनों ही मजदूरों से पूछा गया कि वे कितने पाऊच खरीदते हैं। बदरंग दांतों से खीसे निपोरते हुए उन्होंने कहा-जितनी रोटी, कम से कम उतने पाऊच तो होने ही चाहिए।
सिमट रही जिंदगी
चार उंगलियां भीतर चली जाएं, इतना मुंह खुलना चाहिए। गुटखे के सेवन से दो उंगलियों की भी गुंजाइश मुश्किल से ही रह पाती है। मुंह का सिमटता दायरा जिंदगी के सिमटते जाने का संकेत है। -डा.खामगांवकर, मेयो हास्पिटल
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