इन्होंने उतार फेंके अपने सारे कपड़े, लेकिन इनका मकसद न्यूड होना नहीं था!

मुंबई. किसी अन्याय या अत्याचार के विरोध के लिए आमरण अनशन, हड़ताल या आंदोलन का सहारा लेना शायद अब पुराना तरीका हो चुका है. इस तरीके को अपना कर नेता या समाजसेवक तो बना जा सकता है लेकिन सेलेब्रिटी बनने के लिए शायद न्यूड होना ही सबसे अच्छा तरीका है. ये तरीका किसी को भी रातोंरात न सिर्फ सुर्ख़ियों में ला देता है बल्कि उस मुद्दे को भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना देता है.
2 जुलाई 2012 को को अमेरिकी शहर लॉस एंजेलिस में एक भारतीय मॉडल शर्लिन चोपड़ा ने अपने सारे कपड़े उतार दिए. दरअसल उनके न्यूड होने का मकसद दुनिया की सबसे मशहूर एडल्ट मैगजीन 'प्लेबॉय' के लिए फोटोशूट कराना था. ऐसा करते ही वह भारत की पहली महिला मॉडल बन गई जिन्हें प्लेबॉय के कवर पेज पर आने का मौका मिला. कल उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर अपनी सेमीन्यूड तस्वीरें फिर से जारी की. शायद वो नहीं चाहतीं कि लोग उन्हें भूल जायें.
इससे पहले दिल्ली की एक एक्टिविस्ट और अब अभिनेत्री बन चुकी कविता राधेश्याम ने भी जानवरों के बचाव के लिए न्यूड फोटोशूट कराया और इसके साथ ही सुर्ख़ियों में आ गईं. मुंबई में ही एक अन्य मॉडल गहना वशिष्ठ ने तिरंगे को अपने निजी अंगों पर लपेट कर फोटोशूट कराया. अभी दो दिन पहले मुंबई में टैक्सी किराए में वृद्धि के खिलाफ एक मॉडल रीमा शर्मा ने न्यूड हो इसका विरोध किया. टैक्सी किराए घटे या नहीं लेकिन रीमा की लोकप्रियता का ग्राफ एकाएक आसमान छू गया. किसी मुद्दे के समर्थन या विरोध के लिए न्यूड होने के इस तरीके पर आप क्या सोचते हैं?
क्या सिर्फ नैतिकता, मूल्यों या परंपराओं की दुहाई देकर इनकी आलोचना कर देना ही काफी है? आखिर क्यों हमारे समाज में इस तरह का चलन तेजी से बढ़ रहा है. क्या इसे सिर्फ गलत या अश्लील कह कर खारिज कर देना ही पर्याप्त है या इस चलन के मूल वजह को समझने के लिए इसकी गहरी पड़ताल की जनि चाहिए? अपने विचार नीचे दिए कमेन्ट बॉक्स में जरुर शेयर करें.
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