नागपुर/भिवापुर. नागपुर में खराब मौसम के कारण मिर्ची आधे दामों में बिक रही है। पुरानी मिर्ची के खरीदार नहीं मिलने से भाव 50 प्रतिशत घट गए हैं। उसी प्रकार गीली मिर्ची के भी बुरे हाल हैं। बाहरगांव से आने वाली हरी मिर्ची खराब मौसम के कारण नागपुर आते-आते आधा माल खराब हो रहा है। इससे व्यापारियों और किसानों को घाटा उठाना पड़ रहा है।
मिर्ची व्यवसायी राजेश गोयल ने बताया कि कलमना मंडी में इन दिनों मध्यप्रदेश के खंडवा, बेड़ीया और धामलोध से नई मिर्ची की आवक हो रही है। उसी प्रकार राजुरा से 500 बोरी चिखली-बुलढाना से 2000 बोरी, भिवापुर-मांढल से 1000 बोरी माल आ रहा है। बेमौसम बरसात और खराब मौसम के कारण मिर्ची के माल को बचाए रखना व्यापारियों के लिए संभव नहीं हो पा रहा है।
इसलिए जिस भाव में मिले उस भाव में व्यापारी बेच रहे हैं। श्री गोयल ने बताया कि जो चपाटा मिर्ची पहले 120-140 रु. किलो बिक रही थी, वह अब 70 रु. में बिक रही है। उसी प्रकार फटकी 52 से 55 रु. से घटकर 30 से 32 रु. पर आ गयी है।
नागपुर के महात्मा फुले मार्केट में हरी मिर्ची अच्छी क्वालिटी वाली 10 से 12 रुपये किलो बिक रही है। पहले यह 30 से 35 रुपये किलो बिक रही थी। उधर हमारे भिवापुर संवाददाता ने बताया किपिछले कुछ दिनों से मौसम में आये बदलाव से गिली मिरची के भाव में भारी गिरावट आयी है।
मिरची का भाव प्रति क्विंटल 200 से 240 रु. घटने से मिरची उत्पादक किसान आर्थिक संकट में हैं। तहसील में पिछले वर्ष 14 उप हेक्टर में मिरची की रोपाई की गई थी। इस वर्ष रोपाई का क्षेत्र बढ़ कर 2775 हेक्टर तक पहुंच गया। लगातार सोयाबीन के फसल पर इल्लियों के प्रकोप से किसानों ने मिरची का सहारा लिया था, लेकिन इस वर्ष मौसम ने करवट बदलकर किसानों को सोचने पर मजबूर किया।
शुरू में गिली मिरची (डोडा) 1200 रु. क्विंटल बिका, लेकिन मौसम में आये बदलाव से आज गिली मिरची (डोडा) 950 से 1000 रु. प्रति क्विंटल बिक रही है। अकाली वर्षा तथा बादल से घिरे वातावरण से किसानों के मिरची को भारी नुकसान पहुंचा है। अधिक उत्पादन के लालच से किसान ज्यादा उत्पाद देने वाले महंगे बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नई जाति के प्रमाणित बीजों से फसलों पर नये-नये रोगों की निर्मिती हो रही है। टकाय्या, बुरशी, चुरडा आदि रोगों के आक्रमणों से उत्पादन घटते नजर आ रहा है।
बेमौसम बरसात से लाल मिरची (डोडा) खरीदी करनेवाले व्यापारी भी कतराते नजर आ रहे हैं। इसका कारण वर्षा से मिरची का सड़ना बताया गया है। पिछले दो सालों से मिरची को अच्छा भाव मिल रहा था। परिणाम स्वरूप किसान मिरची की ओर आकर्षित हुए हैं। विडंबना है कि जिस तरह संतरा, गेहूं, धान, सोयाबीन आदि फसलों के डूबने से सरकार आर्थिक मदद करती है, लेकिन मिरची उत्पादकों को ऐसी मदद नहीं मिलती।
बदलता मौसम, भाव में चढ़-उतार, इल्लियों का प्रकोप, उत्पादकों पर होने वाला अन्याय आदि से किसान ब्लैक सीड की ओर आकर्षित हुआ है। परिणाम स्वरूप भिवापुरी मिरची लुप्त होने के कगार पर है।