भोपाल. 3 दिसंबर 1984 की ठंडी रात। दुकान बंद करने के बाद मैं अभी-अभी घर आया था। पत्नी ने कहा 'ऐ जी खाना खालो..सुबह भी ऐसे ही बिना खाए चले गए थे।' मैं खाना खाने बैठा ही था कि अचानक लोगों के चीखने की आवाजें सुनाई दीं, ऐसा लगा जैसे उन्हें कोई जान से मारने के लिए दौड़ा हो। मैं खाना छोड़कर घर की छत पर गया।
मेरे सामने जो मंजर था, उसे देखने के बाद किसी के भी रोंगटे खड़े होना लाजिमी था। मैने देखा कि स्त्री-पुरूष और बच्चे बदहवास होकर इधर-उधर भाग रहे थे। मैने चिल्लाकर पूछा, 'क्या हुआ, आप सब कहां जा रहे हो?' तब उनमें से किसी की आवाज सुनाई दी कि यूनियन कार्बाइड से जहरीली गैस निकल रही है और शहर के सभी लोग एक-एक कर मरते जा रहे हैं। आप भी अपनी जान बचाइए और भागिए।
पुराने भोपाल में 'पूड़ी' की दुकान चलाने वाले और मौत की उस रात अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों की सेवा करने वाले 80 साल के श्याम बाबू अग्रवाल इस वाकये को बताते वक्त अपने आंसू रोक नहीं पाते हैं।
उस काली रात को और क्या-क्या हुआ..एक जांबाज ने मौत से लड़कर लोगों की कैसे मदद की..स्लाइड्स के जरिए जानिए लाइव हकीकत...