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पुलिस ही बन गई थी आईपीएस नरेंद्र की दुश्मन?

अभिषेक शर्मा | Apr 09, 2012, 07:48AM IST
 
 


 

भोपाल. जिस बानमौर पुलिस थाने पर आईपीएस अफसर नरेंद्र कुमार बैठे थे, उसकी बाउंड्रीवॉल के लिए रेत और पत्थर उन्हीं ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से वसूला जा रहा था, जिन्होंने नरेंद्र कुमार को कुचल डाला। यह वसूली भी थाना प्रभारी सीबीएस रघुवंशी करते थे, जिनके नरेंद्र कुमार के साथ संबंधों की पड़ताल सीबीआई जांच का मुख्य बिंदु है।



 

डीबी स्टार टीम ने मामले से जुड़ी कई घटनाओं की पैरेलल इन्वेस्टीगेशन की तो निकला कि आईपीएस नरेंद्र कुमार को अपने ही अधीनस्थों का पर्याप्त सहयोग नहीं मिला। सीबीआई की टीम ने गत 15 व 16 मार्च को टीआई रघुवंशी तथा थाने के अन्य स्टाफ से अकेले में घंटों बातचीत की। हालांकि सीबीआई की टीम ने मीडिया से बात नहीं की, लेकिन थाने में मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों ने नाम न छापने के अनुरोध पर बताया कि सीबीआई की टीम जांच में लगातार यह जानने की कोशिश कर रही है कि एसडीओपी और थाना प्रभारी के संबंध किस तरह के थे?



 

नरेंद्र कुमार के साथ जो भी हुआ उसकी जांच सीबीआई कर रही है। लेकिन लोग जो कह रहे हैं, उससे प्रदेश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई सवाल उठ रहे हैं?



 

वायरलैस मैसेज पर भी...



 

मनोज ट्रैक्टर को भगाते हुए थाने से 700 मीटर दूर राजे पेट्रोल पंप तक ले जाता है। पीछे पुलिस की गाड़ी को आता देख, मनोज ट्रैक्टर को बीच सड़क से काटता है तथा डिवाइडर के ऊपर से निकालते हुए दूसरी रोड पर यू टर्न ले लेता है। मनोज ट्रैक्टर भगाता है और कुछ कदम की दूरी पर स्थित राजे वेयर हाउस की तरफ कच्ची रोड पर मोड़ लेता है।



 

नरेंद्र कुमार टैक्टर को मुख्य सड़क पर ही रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह नहीं रुकता। फिर वे 40 फीट दूर तक दौड़ लगाते हुए ट्रॉली पर चढ़ जाते हैं। इसके बाद ट्रॉली का एक पहिया गड्ढे में फंस जाता है और इसी जद्दोजहद के बीच ये घटना हो जाती है। इस दौरान एसडीओपी के साथ सिर्फ दो आरक्षक राजकुमार और किशन ही रहते हैं, जो उनकी मदद को आगे आने के बजाय दूर खड़े रहते हैं। इतना ही नहीं बार-बार सूचना देने के बाद भी थाना प्रभारी नहीं आते हैं।



 

थाने पर रुकती थीं ट्रॉलियां फिर मनोज ने क्यों नहीं रोकी



 

वहीं बानमौर के कुछ स्थानीय लोगों का भी कहना है कि बानमौर थाने के सामने से गुजरने वाली रेत व पत्थर की ट्रॉलियां थाने पर रुकती थीं। इन ट्रॉलियों पर लदे सामान में से कुछ पुलिसकर्मी उतरवा लेते थे। इसकी वजह थी थाने की २क्क् मीटर की बाउंड्रीवॉल का निर्माण। इसके लिए शासन ने बाकायदा १.99 लाख रुपए मंजूर किए थे, लेकिन नगद सामान मंगवाने के बजाय थाने वाले सामने से गुजरने वाली ट्रॉलियों को रोक कर उनसे ही पत्थर व रेत उतरवा लेते थे। यह बात नरेंद्र कुमार को नापसंद थी।



 

इत्तेफाक से घटना वाले दिन भी जब थाने के सामने से ट्रैक्टर गुजरा, तो एसडीओपी नरेंद्र कुमार ने उसे रुकने का इशारा किया। लेकिन चालक मनोज ने ट्रैक्टर रोकने के बजाय और तेज चलाकर भागने की कोशिश की। इस पर नरेंद्र कुमार को कुछ संदेह हुआ तो उन्होंने उसका पीछा किया। इसके बाद काफी देर तक चोर-सिपाही का खेल चलता रहा, लेकिन बानमौर थाने की पुलिस ने उनकी मदद करना तो दूर, उनके आदेशों तक को अनसुना कर दिया। लोगों का कहना है कि अगर उस दिन स्थानीय पुलिस समय रहते अलर्ट हो जाती तो शायद नरेंद्र कुमार की जान बच सकती थी?



 

ऐसे हुआ बानमौर टीआई रघुवंशी का पर्दाफाश



 

डीबी स्टार टीम की पड़ताल में पता चला कि इस हादसे से थोड़ी देर पहले ही ‘भगीता का पुरा’ में एक समुदाय विशेष के लोगों के बीच झगड़ा हुआ था। इसकी सूचना देने पीड़ित थाने पहुंचे तो थाना प्रभारी रघुवंशी नहीं मिले। तब पीड़ितों ने फोन पर नरेंद्र कुमार को सूचना दी। उन्होंने टीआई को मौके पर पहुंचने के आदेश दिए तथा खुद भी पहुंच गए। लेकिन रघुवंशी नहीं पहुंचे। इसके बाद थाने पर लौटने के कुछ देर बाद ही थाना प्रभारी फिर गायब हो गए, जबकि एसडीओपी थाने पर ही मौजूद रहे।



 

एसडीओपी का आदेश नहीं माना



 

कुछ देर बाद थाने के सामने से पत्थरों से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली क्रमांक एमपी 06 जे.ए. 3112 गुजरती है, जिसे नरेंद्र कुमार रुकने का इशारा करते हैं। चालक मनोज गुर्जर ट्रैक्टर को नहीं रोकता है तथा स्पीड बढ़ाकर आगे निकल जाता है। इसके बाद नरेंद्र कुमार अपने दो आरक्षकों राजकुमार व किशन को लेकर ट्रैक्टर का पीछा करते हैं तथा वायरलैस पर थाना प्रभारी को भी फोर्स के साथ आने को कहते हैं।



 

थाना प्रभारी व एसडीओपी के संबंध थे तनावपूर्ण



 

सीबीएस रघुवंशी तथा नरेंद्र कुमार के संबंध तनावपूर्ण थे। इसकी वजह एसडीओपी की ईमानदारी थी। उन्होंने आते ही पत्थर व रेत का अवैध कारोबार बंद करा दिया था। इन धंधों से बानमौर थाने को डेढ़ लाख रु. प्रतिमाह मिलते थे। थाने की बाउंड्रीवॉल के निर्माण में जो भी पत्थर लगा है, वह खरीदा नहीं गया बल्कि ट्रॉलियों को जबरिया रुकवाकर उतरवाए जाते थे।
-भारत सिंह गुर्जर, उपाध्यक्ष, नगर पंचायत, बानमौर
 
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