फर्जी गरीबों के नाम सूची से हटाए जाएं : हाईकोर्ट
Source: Dainik Bhaskar News | Last Updated 07:08(10/02/12)
ग्वालियर। हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने गुरुवार को विदिशा समेत ग्वालियर-चंबल संभाग के कलेक्टरों को आदेश दिया है कि वे अपने जिलों में फर्जी बीपीएल कार्डो की जांच कराकर इन्हें रद्द करने की कार्रवाई करें। न्यायालय ने प्रदेश में लाखों टन अनाज भंडारगृहों में रखे-रखे खराब हो जाने की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र व मध्य प्रदेश की सरकार को आदेश दिया कि वे संयुक्त रूप से ऐसी नीति बनाएं जिससे वास्तविक बीपीएल कार्डधारक ही खाद्यान्न पा सकें और अनाज नष्ट होने से रोका जा सके। न्यायालय ने इस संबंध में दायर की गई जनहित याचिका को समाज के लिए बेहतर मानते हुए केंद्र सरकार पर 15 हजार रुपए की कॉस्ट (मुकदमे का व्यय) भी लगाई है।
न्यायमूर्ति एसके गंगेले और न्यायमूर्ति जीडी सक्सेना की बेंच ने पूर्व उप महाधिवक्ता अमिप्रबल सोलंकी की डेढ़ साल पहले दायर इस याचिका पर 17 जनवरी को फैसला सुरक्षित कर लिया था। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि सामाजिक, आर्थिक और जाति आधारित जनगणना से प्राप्त आंकड़ों की समीक्षा व तुलनात्मक अध्ययन कर बीपीएल कार्डधारकों की सूची तैयार की जाए। गरीबों की संख्या के अनुसार खाद्यान्न का कोटा तय किया जाए तथा इसका आवंटन निर्धारित करने के लिए ताजा सर्वेक्षण के आंकड़ों का उपयोग किया जाए, न कि पुराने का। केंद्र मध्यप्रदेश सरकार के उस प्रस्ताव पर जल्द निर्णय ले, जिसमें प्रदेश के भंडारगृहों में जमा अतिरिक्त अनाज को गरीबों में बांटने की अनुमति मांगी गई है।
पूर्व उपमहाधिवक्ता सोलंकी ने 10 अगस्त 2010 को जनहित याचिका दायर कर इसमें कहा था कि पूरे भारत में बीपीएल कार्डधारकों को प्रतिमाह न्यूनतम 35 किलोग्राम अनाज दिया जाता है, लेकिन मध्यप्रदेश में सिर्फ 20 किलोग्राम दिया जा रहा है। प्रदेश के अनाज भंडारगृहों में उचित देखरेख के अभाव में लाखों टन अनाज हर साल सड़ जाता है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि केंद्र मध्यप्रदेश के लिए लगभग 42 लाख बीपीएल कार्डधारकों के लिए खाद्यान्न कोटा आवंटन करती है, जबकि प्रदेश सरकार आवंटित कोटे का अनाज लगभग 62 लाख बीपीएल कार्डधारकों में बांट रही है। इस तरह 20 लाख फर्जी एवं अपात्र बीपीएल कार्डधारक हैं, जो जरूरतमंदों का हक मार रहे हैं।
प्रदेश सरकार ने अपने जवाब में कहा था कि केंद्र ने सन् 2001 के बाद प्रदेश में गरीबों की संख्या के आंकड़ों को अपडेट नहीं किया। बार-बार कहे जाने के बाद भी केंद्र ने न तो खाद्यान्न कोटे में बढ़ोतरी की, न ही भंडारगृहों में रखे अतिरिक्त अनाज को बांटने की अनुमति दी। इस कारण निर्धारित कोटे से कम अनाज ही गरीबों को बांटा जा रहा है।
कॉस्ट की राशि
न्यायालय ने इस जनहित याचिका को सामाजिक हित का बेहतर उदाहरण मानते हुए कॉस्ट (मुकदमे का व्यय) की राशि 15 हजार रुपए याची अमिप्रबल सोलंकी को देने का केंद्र सरकार को आदेश दिया है। श्री सोलंकी ने इस राशि को जरूरतमंदों को कानूनी सहायता देने के लिए किसी संस्था को दान देने की घोषणा की है।
कॉस्ट की राशि या तो केंद्र सीधे याची को देकर न्यायालय को सूचित कर सकता है, या हाईकोर्ट रजिस्ट्रार के पास जमा करा सकता है। राशि जमा होने पर कोर्ट याची को कॉस्ट की राशि का भुगतान कर देती है।