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इंदौर के कॉलेज को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री रामदौस फंसे
Dainik Bhaskar News
| Apr 28, 2012, 03:34AM IST

आरोप है कि कॉलेज में पर्याप्त और आवश्यक सुविधाओं का अभाव होते हुए भी रामदौस ने उसे मान्यता दिलवाई। कोर्ट चार्जशीट पर 16 मई को संज्ञान लेगी और सीबीआई को निर्देश दिए हैं कि वह चार्जशीट के साथ सभी आवश्यक दस्तावेज रिकॉर्ड में लाएं। पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के खिलाफ यह पहली चार्जशीट है।
चार्जशीट में कहा गया है कि रामदौस और अन्य आरोपियों ने मेडिकल कॉलेज को दूसरे वर्ष में दाखिले की अनुमति दी, जबकि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने बार-बार सिफारिश करते हुए कहा कि कालेज के पास पर्याप्त संकाय और चिकित्सीय सामग्री नहीं। अपने आरोपों को पुख्ता बनाने के लिए जांच एजेंसी ने 117 गवाह बनाए हैं। चार्जशीट में 218 दस्तावेज शामिल हैं।
इनके खिलाफ है चार्जशीट- पटियाला हाऊस के सीबीआई स्पेशल जज तलवंत सिंह के समक्ष रामदौस के अलावा केवीएस राव (कैबिनेट सेक्रेटेरिएट में निदेशक), सुदर्शन कुमार (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में सेक्शन ऑफिसर), डॉ जेएस धूपिया (सफदरजंग अस्पताल में पैथोलॉजी विभाग के प्रमुख), डा. दीपेंद्र कुमार गुप्ता (रुधिर विज्ञान विभाग के प्रमुख, सफदरजंग अस्पताल), सुरेश सिंह भदौरिया (चेयरमैन, इंडेक्स मेड़िकल कालेज एंड रिसर्च सेंटर, इंदौर), डा. एसके टोंगिया (कालेज के पूर्व डीन), डा. केके सक्सेना (कालेज के निदेशक) तथा नितिन गोथवाल और डा. पवन भांबानी के खिलाफ 36 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है।
सीबीआई ने रामदौस, राव, सुदर्शन और सफदरजंग अस्पताल के दो डाक्टरों पर आपराधिक षडयंत्र रचने और भ्रष्टाचार निरोधक कानून के विभिन्न प्रावधानों के तहत आरोप लगाए हैं। जबकि भदौरिया और अन्य चार लोगों के खिालफ जालसाजी, धोखाधड़ी और अन्य आरोप लगाए गए हैं।
क्या कहती है चार्जशीट
रामदॉस और अन्य आरोपियों ने प्र्याप्त सुविधाओं की कमी वाले कालेज को मान्यता दिलवाने के लिए साजिश रची। सीबीआई के अनुसार, राव, सुदर्शन और धूपिया के खिलाफ सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक अनुमति ली जानी थी। तीन आरोपियों के खिलाफ अनुमति ले ली गई है। राव के खिलाफ अनुमति ली जानी अभी बाकी है। राव तक स्वास्थ्य मंत्रालय में उप सचिव पद पर थे, इसलिए सभी फाइलें उनके पास आती थीं।
भदौरिया ने रामदॉस, राव और कुमार के साथ मिल केद्र की तरफ से भेजी गई कमेटी के सदस्य गुप्ता और धूपिया से पक्ष में रिपोर्ट लिखवा ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक्जीक्यूटिव कमेटी और एमसीआई के निरीक्षक ने ऐसा करने से मान कर दिया था। जांच एजेंसी ने कहा है कि इसके लिए अधिकारियों ने घूस भी ली।
जांच एजेसी ने बताया है कि मयंक वेलफेयर सोयायटी 1996 में बनी थी। इसने वर्ष 2005 में मेडिकल कालेज खोलने का प्रस्ताव दिया था। इसके लिए भदौरिया को विभिन्न एजेंसियों से आवश्यक लाइजनिंग करने को कहा गया। 28 सितंबर 2007 को रामदॉस की अनुमति मिल गई और इंदौर में कालेज खोल गया। इसकी दोबारा से इजाजत लेने के लिए एमसीआई ने अपनी टीम भेजी। उसने फैकलटी और सीटों में कमियां पाई और अनुशंसा अवधि बढ़ाने से मना कर दिया, लेकिन रामदॉस ने धूपिया और केएस गुप्ता की अगुवाई में कमेटी बनाई और उससे पक्ष में काम करवाया।
50 छात्रों के लिए भी नहीं थी इंडेक्स में सुविधा
- सितंबर 2008 में एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) ने अपनी इंस्पेक्शन टीम की रिपोर्ट के आधार पर बोर्ड मीटिंग में निर्णय लिया कि इंडेक्स मेडिकल कॉलेज की मान्यता नहीं रहनी चाहिए। ऐसा ही निर्णय रुहेलखंड मेडिकल कॉलेज (बरेली) के लिए भी था।
- कमेटी ने पाया कि कॉलेज में फेकल्टी की 30% और क्लीनिकल सुविधाओं की 60% कमी है। एमसीआई के तत्कालीन सचिव रिटायर्ड कर्नल डॉ. एआरएन शीतलवाड़ ने मंत्रालय को बताया कि कॉलेज के पास 50 छात्रों को पढ़ाने लायक भी सुविधा नहीं।
- एमसीआई ने कॉलेज की मान्यता रोक ली, मामला सुप्रीम कोर्ट गया, कोर्ट ने 26 सितंबर 2008 तक सरकार को फिर से इंस्पेक्शन कराने और रिपोर्ट के आधार पर निर्णय के लिए निर्देशित किया।
- एमसीआई ने 8, 9 और 27 मई, 27 अगस्त 2008 को कॉलेज का निरीक्षण किया और पाया कि कॉलेज में सुविधाएं ही नहीं है।
- सरकार ने सफदरजंग अस्पताल के डॉ. डी.के. गुप्ता व डॉ. जे.एस. धूपिया की टीम बनाई। टीम ने 25 सितंबर को कॉलेज के निरीक्षण में सभी सुविधाएं सही होना बताया। कॉलेज को 26 सितं. को क्लीन चिट मिली।
- सरकार का झूठ तब सामने आया जब अक्टूबर- 08 में एमसीआई द्वारा फिर किए गए निरीक्षण में खामियां जस की तस पाई गईं।
- इस मामले में सीबीआई ने 16 अप्रैल 2011 को कॉलेज के डायरेक्टर एस.एस. भदौरिया को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया। उन पर आरोप था कि टीम द्वार कॉलेज में इंस्पेक्शन के दौरान उन्होंने 40 डॉक्टरों की फर्जी हस्ताक्षर से उपस्थिति दिखा दी।
सरकार को पॉवर ही नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने विविध निर्णयों में कहा था कि मेडिकल कॉलेजों में सीट बढ़ाने, कॉलेजों को मंजूरी देने आदि निर्णय एमसीआई के सुझावों पर ही किए जा सकते हैं। इस आदेश के संदर्भ में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री रामदौस द्वारा इंडेक्स को मान्यता देने का निर्णय कटघरे में आ गया।
डिग्री की वैधता बरकरार
एमसीआई बोर्ड के सदस्य रहे डॉ. नाहर कहते हैं कि साल 2007-08 की बैच को लेकर यह विवाद है। बैच में प्रवेश लेने वाले सौ छात्र बीते साल पास होकर चले गए। इससे उनकी डिग्री की वैधता पर खतरा नहीं आएगा। साथ ही वर्तमान में पढ़ रहे छात्रों पर भी इस केस का प्रभाव नहीं होगा।
कारण है कि कॉलेज की मान्यता खत्म करने के लिए एमसीआई में बकायादा प्रस्ताव आता है और इस पर केंद्र सरकार गजट नोटिफिकेशन कर मान्यता समाप्त घोषित करती है, लेकिन फिलहाल एमसीआई और केंद्र सरकार के पास इसका आधार नहीं है। यह निर्णय कॉलेज की वर्तमान स्थिति को देखकर ही लिए जाते हैं।
कॉलेज में थी कमियां
एमसीआई की बोर्ड मीटिंग में 2007-08 में यह मामला आया था। कॉलेज की रिपोर्ट में खामियां थीं, इसलिए बोर्ड ने मान्यता देने से इनकार कर दिया था।
- डॉ. एन नाहर, तत्कालीन एमसीआई बोर्ड सदस्य
सही काम किया
हमने गलत काम नहीं किया, कॉलेज को मंजूरी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार से मिली थी। लेन-देन का मामला नहीं है। गड़बड़ होती तो कॉलेज में सीटें नहीं बढ़ती, न ही हमें कभी पीजी कोर्स की मान्यता मिलती।
-एसएस भदौरिया, डायरेक्टर इंडेक्स कॉलेज





