इंदौर। वन अधिकारियों की नासमझी की सजा एक आदिवासी 35 दिन से जेल में भुगत रहा है। 4 नवंबर को टांडा (धार) निवासी इडा पिता कुंवरसिंह जंगल से बिल्ली का लावारिस बच्चा उठाकर घर ले गया था। धार डीएफओ, एसडीओ और रेंजर तेंदुए और बिल्ली के बच्चे में अंतर नहीं कर पाए और आरोपी को गंभीर अपराध का दोषी बताकर कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने उसे जेल भेज दिया। जबकि बिल्ली का बच्चा रखने पर विभाग आमतौर पर गौर नहीं करता। फिर भी उसे आरोपी मानता है तो मौके पर ही जुर्माना कर छोड़ देता। इडा को जेल भेजने के बाद अफसरों को भान हुआ कि यह बच्चा वास्तव में तेंदुए है या नहीं?
हालांकि जांच में वह बिल्ली का बच्चा निकला और उसकी मौत भी हो गई। अफसरों को इतनी जल्दी थी कि उन्होंने इडा को शैड्यूल वन (विलुप्तप्राय जंगली जानवर) जानवर को अवैध तरीके से रखने का आरोपी बनाकर वन्य प्राणी अधिनियम 1972 की धारा 51, 50, 39, 9 और 2 के तहत केस दर्ज कर लिया। इस श्रेणी के जानवर को रखना, मारना, तकलीफ पहुंचाना गैर जमानती अपराध है। इसमें कम से कम तीन साल और अधिकतम सात साल की सजा व 25 हजार रु. तक जुर्माना भी हो सकता है।