इस महिला ने कैसे मार गिराए लश्कर के आतंकी

इंदौर। ये कहानी है रुखसाना कौसर की। वही रुखसाना जिसने जम्मू-कश्मीर के राजौरी में अपने घर में घुसे लश्कर-ए-तोइबा के आतंकियों को उन्हीं की एके४७ से मार गिराया। गणतंत्र दिवस के मौके पर अपनी मां के साथ इंदौर आईं रुखसाना से बातचीत- रुखसाना कहती हैं- 'बात 27 सितंबर 2009 की है। शाम के कुहासे में मैं अपनी अम्मी रशीदा बेगम, अब्बू नूर अहमद और भाईजान एहज़ाज़ अहमद के साथ घर में ही थी। पांच आतंकी धड़धड़ाते घुसे। अम्मी और अब्बू को दरिंदगी से पीटने लगे। मुझे लगा वे सिर्फ दहशत दिखाने आए हैं। मगर हालात बिगड़ते दिखे। पास ही एक कुल्हाड़ी पड़ी थी। मन में थोड़ा खौफ आया। मगर फिर आतंकियों को देखा। दहशत बर्दाश्त नहीं हुई। बिना कुछ सोचे कुल्हाड़ी उठाकर उन पर टूट पड़ी।
एक आतंकी एके 47 तान देने की तैयारी में दिखा। वह लश्कर-ए-तोइबा का कमांडर था। उस पर भी कुल्हाड़ी से वार किया। जानती थी कि अगर वह फिर संभला तो हम जिंदा नहीं बचेंगे। पूरी हिम्मत जुटाई, खौफ को किनारे रखा। एके47 छीनी। ट्रिगर तलाशा और दाग दिया। तेज़, बहुत तेज़ आवाज़ हुई। ...दो आतंकी मर चुके थे।
शुक्रवार को अपना स्वीट्स पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रुखसाना ने कहा, 'तब मैं 19 की थी। वह वाकया कभी नहीं भूल पाऊंगी। अब तक आतंकियों से धमकी मिल रही है। लश्कर ने मेरे सिर पर पांच लाख का इनाम भी रखा है। हर पल संगीनों के साये में गुजरता है। मगर हिम्मत कम नहीं होती।
रुखसाना बताती हैं- 'हुकूमत ने भी पहल की। आठ लाख रुपए का मुआवज़ा मंजूर किया। मगर अब तक ढाई लाख रुपए ही मिले। तीन हजार रुपए महीने की कांस्टेबल की नौकरी भी मिली। केबीसी में जाने का मौका मिला। रकम जीती। उससे भी ज्यादा खुशी अमिताभ बच्चन से मिलने में हुई। मेरे शौहर भी पुलिस में हैं। भाई भी पुलिस की ट्रेनिंग ले रहा है। दो बेटियां हैं। उन्हें भी पुलिस में ही भेजने का सपना है।







