भास्कर संवाददातात्न उज्जैन
गणतंत्र दिवस पर सिंहस्थ योजना के तहत शिप्रा किनारे बड़े पुल के पास प्रस्तावित कबीरदास घाट के भूमिपूजन कार्यक्रम के पहले ही भाजपा के एक गुट ने शिलान्यास पत्थर तोड़ दिया। बाद में राज्यमंत्री पारस जैन और अन्य अतिथियों ने भूमिपूजन की रस्म अदायगी करते हुए कुदाली चलाकर निर्माण कार्य शुरू कराया। घटना से भाजपा की गुटबाजी उजागर हो गई है। घटना को लेकर प्रदेश स्तर पर हलचल हुई है। मामला शिलान्यास पत्थर पर पूर्व सांसद थावरचंद गेहलोत का नाम अंकित नहीं करने का बताया जाता है।
विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा के सामने नेताओं के बीच गुटबाजी नई समस्या बनती जा रही है। गणतंत्र दिवस (गुरुवार) को सिंहस्थ योजना के तहत शिप्रा किनारे बड़े पुल के पास प्रस्तावित कबीरदास घाट का शिलान्यास कार्यक्रम रखा था। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 2010 में कबीर प्रकटोत्सव में इसकी घोषणा की थी। कबीर प्रकटोत्सव पूर्व सांसद थावरचंद गेहलोत का मंच माना जाता है। गेहलोत के प्रस्ताव पर ही मुख्यमंत्री ने सिंहस्थ योजना में घाट बनाने की घोषणा की थी, इसलिए शिलान्यास कार्यक्रम में सिंहस्थ समिति के सचिव निगमायुक्त महेशचंद्र चौधरी ने इस मौके पर गेहलोत को भी आमंत्रित किया था। कार्यक्रम शुरू होने के पहले कुछ लोग कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे और शिलान्यास पत्थर तोड़ दिया। वे शिलान्यास पत्थर पर थावरचंद गेहलोत का नाम नहीं होने पर आपत्ति ले रहे थे। उनके जाने के बाद राज्यमंत्री पारस जैन, पूर्व सांसद डॉ. सत्यनारायण जटिया और अन्य अतिथि आए और भूमिपूजन की रस्म पूरी की।
ऐसे गहराया विवाद
कबीरदास घाट का प्रस्ताव गेहलोत ने दिया था इसलिए जब इसके भूमिपूजन कार्यक्रम की सूचना मिली तो उनके समर्थकों ने मौके पर जाकर देखा। शिलान्यास पत्थर पर गेहलोत का नाम नहीं होने पर उन्होंने आक्रोश जताया तथा गेहलोत को कार्यक्रम में नहीं आने का आग्रह किया। सूत्रों का कहना है कि बुधवार को भी गेहलोत के नाम को लेकर विवाद की स्थिति बनी थी लेकिन चर्चा के बाद तय हो गया था कि शिलान्यास पत्थर पर गेहलोत का नाम बाद में अंकित कर दिया जाएगा लेकिन गुरुवार को नजारा बदल गया। थावरचंद गेहलोत के शब्दों में- मैं कार्यक्रम में आ रहा था तभी कुछ फोन आए, जिन्होंने कार्यक्रम में नहीं आने का आग्रह किया। मैने इस पर नगर निगम अध्यक्ष सोनू गेहलोत से बात की और खाक चौक में हम मिले भी क्योंकि हमें साथ-साथ कार्यक्रम में जाना था। जब फोन आने लगे तो मैंने गेहलोत से कहा कि विवाद की स्थिति नहीं बने, इसलिए मैं कार्यक्रम में नहीं जाना चाहता। इसके बाद मैं इंदौर रवाना हो गया। रास्ते में भी अनेक फोन आए और बताया किसी ने शिलान्यास पत्थर तोड़ दिया है। मैंने पारसजी से भी बात की। वे तब तक कार्यक्रम स्थल पर नहीं पहुंचे थे।
यश की लड़ाई
भाजपा में थावरचंद गेहलोत और डॉ. सत्यनारायण जटिया गुट के बीच संसदीय सीट को लेकर खींचतान पिछले चुनाव से ही चल रही है। अपनी पकड़ बनाने के लिए डॉ. जटिया संत रविदास के नाम का सहारा लेते रहे हैं। गेहलोत ने उज्जैन में अपनी जगह बनाने के लिए संत कबीर प्रकटोत्सव की नींव रखी। (दोनों उत्सवों को राज्य शासन की आर्थिक मदद मिलती है।) यही कारण है कि गेहलोत गुट संत कबीर घाट पर अपना हक मान रहा है और इसके शिलान्यास पत्थर पर गेहलोत का नाम नहीं होने से विरोध पर उतारू हो गया।
॥नासमझ कार्यकर्ताओं की हरकत है। इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। पार्टी का पारिवारिक मामला है।
पारस जैन, राज्यमंत्री
॥गेहलोत को सिंहस्थ समिति सचिव निगमायुक्त ने आमंत्रित किया था। उन्होंने आने की स्वीकृति भी दे दी थी। विवाद जैसी कोई बात नहीं थी।
सोनू गेहलोत, अध्यक्ष, निगम परिषद
॥कबीर प्रकटोत्सव के मंच से सीएम ने कबीर घाट की घोषणा की थी। यदि कार्यक्रम से कबीर प्रकटोत्सव आयोजन समिति को भी जोड़ लेते तो शायद ऐसी घटना नहीं होती। यह कहना गलत है कि शिलान्यास पत्थर मेरे समर्थकों ने तोड़ा है।
थावरचंद गेहलोत, पूर्व सांसद