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बच्चों को तो बख्श दो !

 
Source: निधीश त्यागी   |   Last Updated 03:06(31/01/12)
 
 
 
 
गणतंत्र दिवस का इससे क्रूर मजाक और नहीं हो सकता था। मध्यप्रदेश के देवास जिले के सरकारी आयोजन में वहां के नगर निगम ने जिस झांकी पर इनाम जीता, उसमें आठ साल का बच्चा खुले में एक नल के नीचे आधे घंटे से ज्यादा खड़ा रहा। सिर्फ निकर पहने इस कांपते बच्चे को देखते हुए गर्म कपड़ों में हंसते हुए साहब लोग तालियां बजाते रहे। देवास के कलक्टर और एसपी उनमें शामिल थे।

बच्चे की तकलीफ देखकर मीडिया ने ऐतराज न किया होता तो पता नहीं इस बच्चे को कितनी देर नगर निगम के पानी विभाग की अद्भुत क्षमता की नुमाइश करने के लिए 13 डिग्री सेल्सियस तापमान में ठिठुरते रहना पड़ता। गणतंत्र दिवस के इस घटिया मजाक और संवेदनहीनता की इस मिसाल पर अगर अभी तक किसी को जिम्मेदार नहीं माना गया है और कोई जवाबदेही तय नहीं हुई है, तो जाहिर है कुछ बुनियादी तौर पर ही हम सबके साथ गलत है।

जैसा कि इस खबर से साफ हो जाता है, देवास की महापौर महोदया पहले ही इस वाकये से अपना पल्लू झाड़ चुकी हैं। किसी ने सोचा नहीं? किसी को गुस्सा नहीं आया? तरस भी नहीं! और तो और ऐसे वाहियात आइडिया को ईनाम से नवाजा भी गया। क्या कलक्टर, एसपी, मेयर और ईनाम देने वाले गणमान्य लोग क्या खुद इस नल के नीचे खड़े होकर देश का गणतंत्र दिवस मनाना पसंद करते?

क्या वे अपने बच्चों से ऐसा करवाते और ऐसी ही तालियां बजाते, जैसी वे इस मौके पर बजाते हुए देखे जा रहे हैं? क्या हमारा तंत्र हमारे गण की ऐसी भयानक और इनामी झांकी निकालेगा? क्या शर्म नाम की कोई चीज सरकार में बची है? अगर होती तो अब तक उस तमाशे के मजे लूटने वाले अफसर, नेता और कारिंदे इस आठ साल के बच्चे से सार्वजनिक माफी मांग चुके होते।

सास भी कभी बुआ थी
बच्चे कहीं और किसी के भी हों उनका बुरा कोई नहीं चाहता। और कोई भी शिष्ट समाज की संरचना इस बात से तय होती है कि वह अपने बच्चों से कैसा बर्ताव करता है। एक दूसरी मिसाल गुजरात के अमरेली की है, जहां एक पूर्व सांसद की मौजूदगी में दो साल के जय और जिया की सगाई करवा दी गई।

सांसद की चिंता है कि लेउवा पटेल समाज में लड़कों के मुकाबले लड़कियों का अनुपात काफी कम (750) है। कि वे दो साल के बच्चे हैं, एक बात है, तिस पर जय की मां जया की बुआ भी है. वैसे कई धर्मो और समुदायों में इस तरह की शादियों का चलन है, पर लेउवा पटेल समाज के ठेकेदार दो साल की बच्ची पर उस अनुपात को ठीक करने का ठीकरा फोड़ रहे हैं, जिसके लिए वे सब खुद जिम्मेदार हैं। एक पुरुष प्रमुख समाज पहले तो बेटियां चाहता नहीं, फिर ऊपर से अपनी गलतियों का ठीकरा बच्चियों पर फोड़ता है। और यह सब भी समुदाय की तरक्की के नाम पर।

जैसे हरियाणा में ऑनर किलिंग को लेकर सियासी हस्तियों में सन्नाटा है, शायद अमरेली में भी होगा। जया जब बड़ी होगी, और जब उसकी जय से सगाई शादी में बदल जाएगी, तब क्या वह बेटी पैदा करना चाहेगी, जिसका बचपन, आÊादी, नियति और तकदीर दो साल की उम्र में ही तय कर दी जाएगी। दो साल की बच्ची तो जानती भी नहीं होगी कि उसकी सगाई हो गई है।

और जब वह जान जाएगी, तो क्या वह एक सामान्य जीवन जी पाएगी? क्या वह भी छह करोड़ लोगों में शामिल होगी, जिन्हें अपने गुजरात पर गर्व है? लेउवा पटेल समाज पता नहीं किस परम्परा, किस मजबूरी और किस बहाने से इस मÊाक को संजीदगी से लेने पर तुला हुआ है। जो समाज अपनी दो साल के बच्चों को ज्यादतियों से नहीं बचा सकता, पता नहीं अपनी तरक्की और खुशहाली का रास्ता कैसे बना पाएगा।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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