सॉफ्टवेयर हाईटेक, पुलिस घुटने टेक
Source: दीपेश शर्मा | Last Updated 04:19(08/01/12)
इंदौर .कहा जाता है कि अपराधी कितना ही शातिर क्यों न हो, मौके पर सबूत छोड़ ही देता है। पुलिस का काम इन सबूतों की पहचान कर अपराधी तक पहुंचना होता है, लेकिन इंदौर के खाकी वाले इस मामले में पीछे हैं। अन्य सबूत जुटाना तो दूर फिंगर प्रिंट को ही तवज्जो नहीं दी जाती। चोरी की वारदात (जिसमें अपराधी के फिंगर प्रिंट मौके पर मिलने की संभावना सबसे ज्यादा होती है) की जांच के लिए पुलिस के पास उन्नत सॉफ्टवेयर भी हैं लेकिन फिंगर प्रिंट लेने के लिए जिले में एक ही एक्सपर्ट है। थाने वालों के पास फिंगर प्रिंट तलाशने के लिए किट है, परंतु उसे हासिल करने की ट्रेनिंग ही नहीं दी गई।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के सर्वे में पिछले पांच साल से बदनाम हो रहे इंदौर शहर में हर साल करीब 18 हजार अपराध दर्ज होते हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले चोरी के (करीब दो हजार) होते हैं। आरोपी को पकड़कर उसे चोर साबित करने का सबसे पुख्ता सबूत घटनास्थल पर मिले फिंगर प्रिंट होते हैं। चोरी के मामले में अपराधियों के फिंगर प्रिंट मिलने की संभावना भी सबसे ज्यादा होती है। इंदौर पुलिस के फिंगर प्रिंट सेल में ऑटोमैटिक फिंगर प्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एफिस) 21 दिसंबर 2004 से स्थापित है। इसमें प्रदेश के ढाई लाख व जिले के 46 हजार आरोपियों के फिंगर प्रिंट के रिकॉर्ड हैं। सिर्फ एक क्लिक पर पुलिस को पता चल सकता है कि किसी चोरी में कोई पुराना अपराधी तो शामिल नहीं है। उल्लेखनीय है कि चोरी के खुलासे के लगभग 90 प्रतिशत मामलों में पुराने चोर ही निकलते हैं।
समय पर भी नहीं बुलाती पुलिस- कई बार पुलिस एक्सपर्ट को समय पर घटनास्थल पर नहीं बुलाती। ऐसे में बाहरी लोगों के मौके पर पहुंचने से फिंगर प्रिंट मिट जाते हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण शालीमार टाउनशिप में शराब व्यवसायी श्रीभगवान जायसवाल के यहां हुई 25 लाख की चोरी का है। यहां फिंगर प्रिंट की टीम को एक दिन बाद बुलाया गया, तब तक परिजन व बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश से फिंगर प्रिंट मिट गए। पुलिस ने संदिग्ध तो पकड़े लेकिन फिंगर प्रिंट नहीं मिलने से खुलासे में परेशानी आ रही है।
थाने वाले सिर्फ देख सकते हैं- सभी थानों में पुलिस को जो किट दी गई है उससे वे थाने में बंद अपराधियों के फिंगर प्रिंट लेकर मिलान के लिए भेज सकते हैं। हालांकि किसी घटनास्थल से फिंगर प्रिंट कैसे उठाना है, यह उन्हें नहीं आता। वे किसी घटनास्थल पर सिर्फ यह पता लगा सकते हैं कि वहां फिंगर प्रिंट हैं या नहीं। प्रिंट मिल जाए तो उन्हें एक्सपर्ट को बुलाना ही पड़ता है।
‘ ट्रेनिंग काफी नहीं, पद भरने चाहिए’
॥हर थाने के कम से कम एक सिपाही को फिंगर प्रिंट लेना सिखाया जाता है। उपलब्ध किट से वह अपराधियों के फिंगर प्रिंट लेकर सर्च के लिए एक्सपर्ट के पास भेज सकता है लेकिन घटनास्थल से चांस प्रिंट लेना सावधानीपूर्ण काम है। जरा सी लापरवाही से प्रिंट नष्ट हो सकते हैं। सिपाही की ट्रेनिंग सिर्फ नौ महीने की होती है जिसमें इतनी कार्यकुशलता लाना संभव नहीं। प्रदेश में फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट के 174 खाली पद भरे जाना चाहिए।
ए. सांई मनोहर, एसएसपी इंदौर