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कोई कुछ भी कहे, अमेरिका ने खुद को किया सुरक्षित

 
Source: नेशनल न्यूज रूम   |   Last Updated 00:25(11/09/11)
 
 
 
 
9/11 : दस साल में कैसे बदली दुनिया और जिंदगी, बता रहे हैं देश के प्रमुख विशेषज्ञ।

भास्कर एक्सपर्ट पैनल

अमेरिका : पैसों में चौपट लेकिन सुरक्षा चाक-चौबंद

(नरेश चंद्रा, अमेरिका में पूर्व राजदूत)

9/11 के बाद अमेरिका में जिंदगी ही बदल गई। वहां के स्वच्छंद समाज को इस घटना से धक्का लगा। अमेरिका सख्त हुआ। आतंकवाद से निपटने के लिए पैट्रियाटिक एक्ट, पुलिस रिफार्म और ग्वांटानामो-बे जैसे कदम उठाए। भारी खर्च किया। यहां तक कि उसकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई, लेकिन देश की सुरक्षा चाकचौबंद कर दी गई।

दुनिया के देशों खासकर खाड़ी देशों के साथ रक्षा संबंध बदले। इस लड़ाई ने बाकी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों को पास-पास ला दिया। तानाशाह सत्ता वाले खाड़ी देशों में हाल के दौरान हुई बगावत ने आतंक के खिलाफ लड़ाई में नई उम्मीद तो जगाई है।

लेकिन सारा दारोमदार यहां की भावी सरकारों पर होगा कि वे किस तरह इस चुनौती से निपटती हैं। भारत में आतंकवाद पड़ौसी मुल्कों की वजह से है। पिछले दस सालों में आतंक से निपटने की हमारी नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। आतंक से निपटने के मुद्दे पर अमेरिका और हमारी तैयारी की कोई तुलना नहीं है।

दुनिया मानने लगी कि पाक में ही है आतंक की धुरी

(जी. पार्थसारथी, पाकिस्तान में पूर्व राजदूत)

9/11 की घटना ने आतंक के प्रति दुनिया के नजरिए को बदलकर रख दिया। उससे पहले भारत आतंक के मुद्दे पर पाकिस्तान पर कोई आरोप लगाता था, तो दुनिया उसे द्विपक्षीय मसला बताती थी। अब इस विषय का दायरा बड़ा हो गया है। दुनिया ने माना कि यह किसी एक देश की समस्या नहीं है।

अमेरिका ने अफगान युद्ध के दौरान भारत के दावे और आरोपों की सच्चई को स्वीकारा। ओसामा की मौत के बाद कहा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई अलकायदा से मिली हुई है। अमेरिका ने इस बात की भरपूर कोशिश की कि आतंक के खिलाफ लड़ाई को इस्लाम के खिलाफ लड़ाई न माना जाए।

हालांकि, इस बारे में काफी प्रोपोगेंडा किया गया। लेकिन इसके उलट खाड़ी देशों में शिया-सुन्नी के बीच टकराव और बढ़ गया। आतंक की चुनौती से निपटने के लिए भारत की नीति बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। हम अब भी परंपरागत रास्ते पर ही चल रहे हैं।

पाकिस्तान की साजिशों का शिकार होता रहा भारत

(अफसर करीम, रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)

9/11 से पहले अमेरिका को उम्मीद नहीं थी कि कोई विदेशी ताकत उस पर इस तरह से हमला कर सकती है। उसकी सारी तैयारी प्रत्यक्ष युद्ध को लेकर थी। आतंकियों के आत्मघाती हमले अमेरिका की आंखें खोल दीं। उसने अफगानिस्तान को पहला टारगेट बनाया।

मुशर्रफ से दो टूक पूछा कि वह आतंक के खिलाफ लड़ाई में उसके साथ हैं या नहीं। मुशर्रफ को धमकी दी गई कि यदि वे इनकार करेंगे तो उनके देश को भी दुश्मन समझा जाएगा। देर से ही सही अमेरिका ने ओसामा को खत्म करके ही दम लिया। इस दौरान यूरोप ने भी अपनी सुरक्षा बढ़ाई।

लेकिन इसके उलट 9/11 के बाद भारत में हालात बदतर हुए हैं। पाकिस्तान सेना आतंकियों को अपनी बेशकीमती संपत्ति मानती है, जिसे वह जरूरत पड़ने पर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करती है।

उनके मंसूबे पूरे करने के लिए भारत में ही बड़े-बड़े आतंकी संगठन तैयार हो गए हैं। जो बड़ी-बड़ी आतंकी वारदातों को अंजाम देते हैं। हम इन आतंकियों का नेटवर्क तोड़ने में नाकाम रहे हैं।

(चीन को मिला फायदा, बन बैठा बड़ी आर्थिक ताकत)

मारूफ रजा, रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ

9/11 के बाद अमेरिका ने आतंक के खिलाफ कथित ‘ग्लोबल वॉर’ शुरू किया। लेकिन यह लड़ाई अकेले अमेरिका और उसके कुछ सहयोगियों की निजी लड़ाई होकर रह गई। क्योंकि इसमें भारत जैसे देशों की समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। यह मान्यता और मजबूत हुई कि इराक, अफगानिस्तान और अब लीबिया के खिलाफ युद्ध अमेरिका ने निजी हितों की खातिर शुरू किए।

वह खुद को सुरक्षित करना चाहता है और दुनिया के भंडारों से तेल और गैस हासिल करना चाहता है। हालांकि, उसके कई कदम उस पर भारी पड़े। उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर हुई। उस पर विदेशी कर्ज बढ़ा। उसकी इस कमजोरी का चीन ने फायदा उठाया और खुद को मजबूत कर लिया।

आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था में चीन की हिस्सेदारी दो ट्रिलियन डॉलर की है। अमेरिका पूर्व में पाकिस्तान को शरण देता रहा, लेकिन अब वह भी कहने लगा है कि दुनिया में पाकिस्तान ही आतंक का गढ़ है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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